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जीवन धारा: विज्ञान और तकनीक 'अंधेरे में मोमबत्ती' की तरह है, जलाने के लिए नैतिकता और सही सोच की जरूरत
Sat, 28 Feb 2026 07:53 AM IST
Pavan
कार्ल सेगन
कार्ल सेगन
Published by: Pavan
Updated Sat, 28 Feb 2026 07:53 AM IST
सार
तकनीक हमारी आंखें और हाथ हैं, जिनसे हम अरबों मील दूर तक देख और मंगल की मिट्टी को छू सकते हैं। विज्ञान व तकनीक 'अंधेरे में एक मोमबत्ती' की तरह है, जिसे जलाने के लिए नैतिकता व सही सोच की जरूरत होती है।
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विज्ञान और तकनीक 'अंधेरे में मोमबत्ती' की तरह
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
तकनीक हमारी आंखें और हाथ हैं, जिनसे हम अरबों मील दूर तक देख और मंगल की मिट्टी को छू सकते हैं। विज्ञान व तकनीक 'अंधेरे में एक मोमबत्ती' की तरह है, जिसे जलाने के लिए नैतिकता व सही सोच की जरूरत होती है। तकनीक केवल निर्जीव मशीनों, तारों या सर्किट का समूह नहीं है, बल्कि यह हमारी जैविक दुर्बलताओं और सितारों तक पहुंचने की अनंत इच्छाओं के बीच एक मजबूत पुल का निर्माण करती है। इस पुल पर चलकर ही हम न केवल अंतरिक्ष की दूरियों को मापते हैं, बल्कि अपने भीतर छिपी संभावनाओं को भी तलाशते हैं।
कई लोग खगोल विज्ञान को केवल ग्रहों की गणना करने तक ही सीमित मानते हैं, पर मेरा मानना है कि यह इन्सान को विनम्र बनाने और उसके चरित्र को निखारने का एक सशक्त माध्यम भी है। जब हम ब्रह्मांड की विशालता को देखते हैं, तो हमारा संकुचित दृष्टिकोण स्वतः ही विस्तृत होने लगता है। जैसे किसी अंधेरे कमरे में सूरज की एक छोटी-सी किरण प्रवेश करती है, तब उसमें धूल के छोटे-छोटे कण चमकते हुए दिखाई देते हैं।
ठीक उसी तरह, असीमित अंतरिक्ष के गहरे कालेपन के बीच से देखने पर हमारी विशाल लगने वाली पृथ्वी भी सिर्फ एक नन्हा-सा चमकता हुआ सितारा या धूल का एक छोटा-सा कण मात्र प्रतीत होती है। हमारी दुनिया की यह धुंधली व सूक्ष्म तस्वीर दरअसल मानवीय अहंकार का सबसे बड़ा और जीवित सबूत है। यह दृश्य हमें उस गहरी सच्चाई से रूबरू कराता है कि यही छोटा-सा ग्रह हमारा एकमात्र घर है और इस ब्रह्मांड में हमारे पास भागकर जाने के लिए कोई दूसरी जगह उपलब्ध नहीं है। अतः, हमारी सबसे पहली और प्राथमिक जिम्मेदारी इसकी रक्षा करना ही है।
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हमारा अस्तित्व इस बात पर टिका है कि हम अपनी तकनीकी शक्ति का इस्तेमाल नफरत के लिए करते हैं या मानवता के कल्याण के लिए। अंतरिक्ष यान और प्रोब हमारी इंद्रियों का ही विस्तार हैं। वे हमारी आंखें हैं, जो अरबों मील दूर देख सकती हैं और हमारे हाथ हैं, जो मंगल की मिट्टी को छू सकते हैं। वास्तव में, विज्ञान व तकनीक तो 'अंधेरे में एक मोमबत्ती' की तरह है, जिसे जलाने के लिए नैतिकता और सही सोच की जरूरत होती है। यदि कोई समाज तकनीक का उपभोग तो करता है, पर उसके पीछे के वैज्ञानिक तर्क व करुणा के आधार को नहीं समझता, तो वह अनजाने में ही विनाश की ओर बढ़ रहा है।
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कई लोग खगोल विज्ञान को केवल ग्रहों की गणना करने तक ही सीमित मानते हैं, पर मेरा मानना है कि यह इन्सान को विनम्र बनाने और उसके चरित्र को निखारने का एक सशक्त माध्यम भी है। जब हम ब्रह्मांड की विशालता को देखते हैं, तो हमारा संकुचित दृष्टिकोण स्वतः ही विस्तृत होने लगता है। जैसे किसी अंधेरे कमरे में सूरज की एक छोटी-सी किरण प्रवेश करती है, तब उसमें धूल के छोटे-छोटे कण चमकते हुए दिखाई देते हैं।
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ठीक उसी तरह, असीमित अंतरिक्ष के गहरे कालेपन के बीच से देखने पर हमारी विशाल लगने वाली पृथ्वी भी सिर्फ एक नन्हा-सा चमकता हुआ सितारा या धूल का एक छोटा-सा कण मात्र प्रतीत होती है। हमारी दुनिया की यह धुंधली व सूक्ष्म तस्वीर दरअसल मानवीय अहंकार का सबसे बड़ा और जीवित सबूत है। यह दृश्य हमें उस गहरी सच्चाई से रूबरू कराता है कि यही छोटा-सा ग्रह हमारा एकमात्र घर है और इस ब्रह्मांड में हमारे पास भागकर जाने के लिए कोई दूसरी जगह उपलब्ध नहीं है। अतः, हमारी सबसे पहली और प्राथमिक जिम्मेदारी इसकी रक्षा करना ही है।
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हमारा अस्तित्व इस बात पर टिका है कि हम अपनी तकनीकी शक्ति का इस्तेमाल नफरत के लिए करते हैं या मानवता के कल्याण के लिए। अंतरिक्ष यान और प्रोब हमारी इंद्रियों का ही विस्तार हैं। वे हमारी आंखें हैं, जो अरबों मील दूर देख सकती हैं और हमारे हाथ हैं, जो मंगल की मिट्टी को छू सकते हैं। वास्तव में, विज्ञान व तकनीक तो 'अंधेरे में एक मोमबत्ती' की तरह है, जिसे जलाने के लिए नैतिकता और सही सोच की जरूरत होती है। यदि कोई समाज तकनीक का उपभोग तो करता है, पर उसके पीछे के वैज्ञानिक तर्क व करुणा के आधार को नहीं समझता, तो वह अनजाने में ही विनाश की ओर बढ़ रहा है।