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भारत रंग महोत्सव का 25वां संस्करण: केंद्र में एनएसडी से अलग आकार लेता "सारंग"

Sat, 14 Feb 2026 12:11 PM IST
Ashish Kumar Anshu आशीष कुमार 'अंशु'
Updated Sat, 14 Feb 2026 12:11 PM IST
सार

डॉ. अमित आर्य ने बंद पड़े ‘सारंग’ महोत्सव को फिर से जीवित किया। इसे एनएसडी के भारत रंग महोत्सव (भारंगम) के 25वें संस्करण के साथ जोड़ा गया। फरवरी 2026 में आयोजित चार दिवसीय उत्सव ने सुपवा को राष्ट्रीय पटल पर ला खड़ा किया।

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Sarang Festival Grand conclusion of a splendid festival of music, acting
भारत रंग महोत्सव (भारंगम) का 25वां संस्करण - फोटो : आशीष कुमार 'अंशु'

विस्तार

दिल्ली का भगवान दास रोड लंबे समय से परफॉर्मिंग और विजुअल आर्ट्स का पवित्र तीर्थ रहा है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) यहां एक विशाल बरगद की तरह खड़ा है। इसकी छांव में आने वाले कई संस्थान या तो सूख गए या अपनी अलग पहचान नहीं बना पाए। लेकिन अब 85 किलोमीटर दूर रोहतक में दादा लख्मी चंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ परफॉर्मिंग एंड विजुअल आर्ट्स (डीएलसी सुपवा) धीरे-धीरे अपनी जड़ें मजबूत कर रहा है। यह सिर्फ एक यूनिवर्सिटी नहीं, बल्कि हरियाणा में कला के लोकतंत्रीकरण की एक नई कहानी है।

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अतीत की कड़वी सच्चाई और नई शुरुआत की जरूरत

2014 में अस्तित्व में आए इस विश्वविद्यालय को ‘कला साधना परम दैवतम्’ का मंत्र मिला था, लेकिन शुरुआती वर्षों में प्रशासनिक कुप्रबंधन, संकाय की कमी और उपकरणों की अपर्याप्तता ने इसे जकड़ रखा। फिल्म और टेलीविजन विभाग के छात्रों को वर्षों इंतजार करना पड़ा-कई बैच प्रभावित हुए, विरोध प्रदर्शन हुए।
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2016 से 2024 तक का दौर छात्रों के लिए निराशा और संघर्ष का रहा, लेकिन यही वह बिंदु है जहां से सच्चा परिवर्तन शुरू होता है। जब संस्थान सबसे निचले स्तर पर होता है, तब एक मजबूत नेतृत्व उसे ऊपर उठा सकता है।
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अमित आर्य: एक पत्रकार से कुलपति तक का सफर

2025 में डॉ. अमित आर्य के छठे कुलपति बनने के साथ ही हवा बदली। एक अनुभवी पत्रकार और मीडिया रणनीतिकार के रूप में उन्होंने समझा कि कला सिर्फ सिखाई नहीं जाती- उसे जिया जाता है, मनाया जाता है और फैलाया जाता है।

अप्रैल 2025 में हरियाणा सरकार ने सुपवा को राज्य की अन्य यूनिवर्सिटीज में फिल्म मेकिंग कोर्स शुरू करने का मेंटर बनाने की जिम्मेदारी सौंपी। पंचकूला और गुरुग्राम में फिल्म सिटी की योजनाएं शुरू हुईं। ये कदम दिखाते हैं कि अब कला को सिर्फ परिसर तक सीमित नहीं रखा जा रहा- इसे राज्यव्यापी आंदोलन बनाया जा रहा है।

‘सारंग’ का पुनर्जन्म: एनएसडी के साथ साझेदारी का जादू

सबसे दिलचस्प बदलाव तब आया जब डॉ. आर्य ने बंद पड़े ‘सारंग’ महोत्सव को फिर से जीवित किया। इसे एनएसडी के भारत रंग महोत्सव (भारंगम) के 25वें संस्करण के साथ जोड़ा गया। फरवरी 2026 में आयोजित चार दिवसीय उत्सव ने सुपवा को राष्ट्रीय पटल पर ला खड़ा किया।

मुख्यमंत्री नायब सैनी ने शुभकामनाएं भेजीं और आने वाले आयोजनों में शामिल होने की इच्छा जताई-यह छोटी बात नहीं है।

महोत्सव में असम का सत्रिया नृत्य, दिल्ली के पार्थ हजारिका ग्रुप की ‘सत्त्रिया की आत्मा’, सुधीर रेखरी का बैंड, श्रीलंका का प्रयोगात्मक नाटक ‘कोलम्बा हाथे थोराना’सब कुछ था, लेकिन सबसे यादगार रहा समापन: पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने अवधी गीतों से मंच को गुदगुदाया और कहा, “यहां आकर लगा जैसे एनएसडी पहुंच गई हूं।

कुलपति ने कला का बीज बोया है और उसकी रखवाली भी कर रहे हैं।” मेघना मलिक, मालिनी अवस्थी के साथ नाचने से खुद को रोक नहीं पाईं। यह था मालिनी अवस्थी के स्वर का जादू। जिस जादू में सिर्फ मेघना नहीं बल्कि दर्शक दीर्घा में बैठा पूरा जेन जी समूह झूम रहा था।

श्रीवर्धन त्रिवेदी ने रंगमंच को ‘संपूर्ण विद्या’ कहा। सुपवा के 50 छात्रों ने कथक, भरतनाट्यम, भंगड़ा, कव्वाली जैसी प्रस्तुतियां दीं।

Sarang Festival Grand conclusion of a splendid festival of music, acting
‘सारंग’ की लौ जली - फोटो : आशीष कुमार 'अंशु'

क्यों है यह बदलाव महत्वपूर्ण?

सुपवा अब एनएसडी का विकल्प नहीं बन रहा-बल्कि एक पूरक और लोकतांत्रिक विकल्प बन रहा है। दिल्ली-एनसीआर के बाहर, हरियाणा के युवाओं के लिए कला सीखना अब आसान और सुलभ हो रहा है।

डॉ. आर्य का रोडमैप स्पष्ट है: नियमित बड़े आयोजन, मेंटरशिप, फिल्म सिटी जैसी इंफ्रास्ट्रक्चर और छात्र-केंद्रित सुधार।यह सिर्फ एक यूनिवर्सिटी का उत्थान नहीं है-यह क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने की कोशिश है। जहां एनएसडी दिल्ली-केंद्रित रहा, वहीं सुपवा हरियाणा की मिट्टी से जुड़कर, ग्रामीण-शहरी दोनों प्रतिभाओं को जगह दे रहा है।

मालिनी अवस्थी के शब्दों में, ग्रामीण महिलाओं के गीतों में सहज अभिनय ही असली कला है-सुपवा इसी सहजता को संस्थागत रूप दे रहा है।

आगे की राह: उम्मीदों का पुल

सुपवा की यह यात्रा अभी शुरू हुई है। चुनौतियां बाकी हैं-संकाय की कमी, फंडिंग, निरंतरता। लेकिन नेतृत्व अगर मजबूत हो, छात्र उत्साही हों और सरकार सहयोगी, तो यह बरगद नहीं- एक नया वटवृक्ष बन सकता है, जिसकी छांव में सैकड़ों कलाकार पनपें।

हरियाणा में कला की नई सुबह हो रही है। ‘सारंग’ की लौ जली है-अब इसे बुझने नहीं देना है। यह समय है कि हम सब इस बदलाव का हिस्सा बनें, क्योंकि कला सिर्फ मनोरंजन नहीं- यह समाज को जोड़ने, समझने और बेहतर बनाने का माध्यम है। सुपवा उस दिशा में पहला मजबूत कदम है।




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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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