संविधान दिवस विशेष: महिलाओं का सुरक्षा कवच 'भारतीय संविधान'
समाज में व्याप्त रूढ़िवादी विचारधाराओं के कारण महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ा है। इस लड़ाई में उनके पास जो सबसे बड़ा हथियार हमारा संविधान रहा है। संविधान दिवस के मौके पर आइए इस मुद्दे पर प्रकाश डालते हैं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
Constitution Day 2024 : वर्तमान युग महिलाओं का है। महिलाएं हर क्षेत्र में भारत की कामयाबी का आयरन पिलर बन रहीं हैं। लेकिन हम सब जानते हैं हमेशा से ऐसा नहीं रहा। महिलाओं के संद्यर्ष का अपना पूरा इतिहास है। उनका सशक्तिकरण से समर्पण तक का लेखा-जोखा इतिहास में दर्ज है। भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष साथ महिला स्वतंत्रता की जंग जारी रही। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय संविधान महिलाओं का सुरक्षा कवच बना, यदि यह कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति न होगी।
आज भी भारत की अनगिनत महिलाएं इस बात से अनजान है कि भारतीय संविधान के निर्माण की जिम्मेदारियों को पूरा करने में भारत की 15 विदुषी महिलाएं भी शामिल थी। इनमें से ज्यादातर महिलाओं ने स्वतंत्रता संद्यर्ष और भारत की समस्याओं को बेहद नजदीक से देखा और महसूस किया। साथ ही स्वतंत्रता आन्दोलनों में महिला आन्दोलन को न केवल आकार दिया बल्कि पितृसत्तात्मक समाज की चुनौतियों से भी मुकाबला किया।
भारतीय समाज की आधी आबादी को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए मजबूत कदम उठाए। भारत के संविधान निर्माताओं की कोशिश थी कि भारतीय संविधान के निर्माण में महिलाओं के अधिकारों का विशेष ध्यान रखा जाए इसलिए भारतीय संविधान के निर्माण में 15 विदुषी महिलाओं को संविधान सभा की सदस्य के तौर पर शामिल किया गया, जिनका भारत के गौरवशाली संविधान के निर्माण में अहम् योगदान रहा। इनके द्वारा न केवल महिला अधिकारों की वकालत की गई बल्कि एक सशक्त प्रगतिशील संविधान का निर्माण हो सके इस बात का भी विशेष ध्यान रखा गया।
इन विदुषी महिलाओं में सरोजनी नायडू, अम्मू स्वामीनाथन, एनी मैस्करीन, दक्षिणायनी वेलायुधन, दुर्गाबाई देशमुख, बेगम एजाज़ रसूल, हंसा जीवराज मेहता, कमला चौधरी, लीला रॉय, मालती चौधरी, पूर्णिमा बनर्जी, राजकुमारी अमृत कौर, रेणुका रे, विजयलक्ष्मी पंडित, सुचेता कृपालानी आदि प्रमुख थीं। जिन्होंने महिला समानता, स्वतंत्रता, शिक्षा, स्वास्थ्य, एवं महिलाओं के कल्याण से जुडे मुददों की वकालत की। साथ ही संविधान निर्माताओं के द्वारा महिलाओं के अधिकारों को ध्यान रखते हुए एक ऐसा संवैधानिक दस्तावेज तैयार किया जिसके द्वारा महिलाओं को सशक्त बनाया जा सके।
26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा ने संविधान के उस प्रारूप को स्वीकार किया जिसे डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की अध्यक्षता में ड्राफ्टिंग कमेटी ने तैयार किया था। 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ और भारत एक गणराज्य बना। भारत सरकार के द्वारा 2015 से 26 नवंबर के दिन को संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है। निश्चित तौर पर संविधान दिवस हर भारतीय के लिए बेहद प्रेरित करने वाला दिन है।
भारतीय संविधान में समाज की असमानता, असुरक्षा, जैसी भावना को समाप्त करने के किए गए प्रावधानों से भारत को सशक्त और अखण्ड़ भारत बनाने में अपनी अग्रणी भूमिका निभायी है। भारतीय संविधान ने महिलाओं के जीवन में क्रान्तिकारी बदलाव किए हैं। उन्हें समाज की अन्तिम पक्ति की सामान्य व्यक्तित्व नहीं अपितु समाज में बराबरी के हिस्सेदार बनाया है।
यकीनन भारतीय संविधान समाज के हर तबके को ध्यान में रखकर निर्मित किया गया था। इसे तैयार होने में 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का समय लगा। भारतीय संविधान महिलाओं को अनेकानेक अधिकार देता है जिनमें से कुछ का प्रत्येक महिला को ज्ञान होना आवश्यक है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में समानता का अधिकार और भेदभाव न करने का अधिकार, एवं अनुच्छेद 15 में जाति, धर्म, लिंग तथा जन्म स्थान आदि के आधार पर भेदभाव न करना तथा अनुच्छेद 16 में सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की गारंटी देने का प्रावधान है। अनुच्छेद 19 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अनुच्छेद 21 स्त्री एवं पुरूष दोनों को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार, अनुच्छेद 39 समान कार्य के लिए समान वेतन तथा अनुच्छेद 42 के तहत राज्य को मातृत्व राहत पर ध्यान देना आदि अनेक प्रावधानों के तहत भारतीय समाज में महिलाओं को सशक्त बनाने का कार्य बहुत पहले ही किया जा चुका है।
भारतीय संविधान महिलाओं को समान अधिकारों की गारंटी देता है, जिसमें अनुच्छेद 14, 15 और 16 के अन्तर्गत मतदान करने तथा चुनाव लड़ने का अधिकार भी शामिल है। जिसके अनुसार महिलाओं को समाज से ससद तक के अपने अधिकारों का उपयोग एवं सुरक्षा प्रदान करने का प्रावधान किया गया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243D और 243T स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करते है।
73वें और 74वें संविधान संशोधन (1992,1993) के द्वारा पंचायतों और नगर पालिकाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य कर दिया है। जिसका सीधा संबंध महिलाओं को सामाजिक-आर्थिक स्वतंत्रता के साथ सशक्तिकरण को बढ़ावा देना है। वर्तमान में महिलाओं के असमानता, असुरक्षा तथा भय का कारण महिलाओं का इन अधिकारों और विधिक सुरक्षा के बारें में सीमित शिक्षा एवं जागरूकता का अभाव महसूस होता है जिसके कारण असंख्य महिलाएं इनका लाभ नहीं उठा पाती हैं। अपितु संविधान निर्माताओं के द्वारा उन्हें सशक्त करने का खाका संविधान तैयार करते समय ही बनाया जा चुका था।
यद्यपि भारत अभी भी एक पुरूष प्रधान देश की पहचान रखता है लेकिन संविधान की शक्ति भारत की महिलाओं में देखी जा सकती है। 21वीं सदी की सशक्त महिला अपने और दूसरों के अधिकारों की जंग में फतह हासिल कर रही है उसमें भारतीय संविधान के द्वारा उसे प्रदान की गयी मजबूती स्पष्ट दिखाई देती है। पं. नेहरू का कहना था कि ’आप किसी राष्ट्र में महिलाओं की स्थिति देखकर उस राष्ट्र की स्थिति बता सकते हैं।’
भारतीय समाज में ही नहीं बल्कि दुनिया के इतिहास में सबसे ज्यादा जिस समाज का शोषण किया गया वह 'महिला समाज' ही था। स्वतंत्रता के पश्चात् महिलाओं की तरक्की का आधार भारतीय संविधान बना। उन्हें शिक्षा, समानता, सुरक्षा के तमाम अधिकार देकर उनके लिए एक सुरक्षा कवच बना 'भारत का गौरवशाली संविधान।'