घर में अकेले रह रहे बुजुर्ग कितने सुरक्षित?
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उन बुजुर्ग दंपती की दोनों संतान अर्थात् बेटा व बेटी विदेश में थे। वहां उच्च शिक्षा प्राप्त करने गए थे कि वहीं के ही होकर रह गए। अब तो उनके विवाह हो गए हैं और उनकी संताने अमेरिकी नागरिक हैं। एक दो साल में महीने भर या कुछ दिनों के लिए मिलने आ जाते हैं। जब तक शारीरिक ताकत मौजूद थी यह बुजुर्ग भी अपनी संतानों के पास दो-तीन महीने रहने के लिए जाते रहे पर अब यह कर पाना असंभव हो गया था।
संताने उन्हें बार-बार कहतीं कि अपना सब कुछ ठिकाने लगाकर अब वह उनके पास आ जाएं पर, उन्हें दो-तीन महीने वहां रहने पर होने वाली बोरियत का अनुभव था इसलिए वहां वह स्थाई रूप से रहने जाने में झिझकते थे।
बुजुर्ग दंपती दोनों ही अपने समय में अच्छे पदों पर प्रतिष्ठित थे, इसलिए आर्थिक स्थिति तो बहुत संतोषजनक थी। सही समय पर एक अच्छा सुविधाजनक घर बना लिया था। आसपास ही पूर्व के परिचित रहते थे। दोनों के निकट के संबंधी भी उसी शहर में थे। बहुत अपनापन लगता। कई बार यह भी सोचते कि यदि यहीं रहना है तो क्यों न घर के व बाहर के काम निपटाने के लिए कोई सहायक रख लिया जाए। यह कोई सहायिका भी हो सकती है।
कितने सुरक्षित हैं अपने ही घर में बुजुर्ग
दिल्ली में ऐसी एजेंसियां काफी संख्या में हैं जो डोमेस्टिक हेल्प (घरेलू सहायक) अथवा बुजुर्गों की देखभाल के लिए केयरटेकर सप्लाई करती हैं। उन बुजुर्ग दंपती ने भी ऐसी ही किसी एजेंसी को अपनी आवश्यकता बताकर एक केयरटेकर ले लिया। घर के बाहर के कामों में उन्हें बहुत सुविधा हो गई। धीरे-धीरे उन बुजुर्गों का केयरटेकर पर बहुत विश्वास हो गया।
अंत में वहीं हुआ जो प्राय: आजकल इन बुजुर्गों के साथ हो रहा है। उस केयरटेकर ने अपनी प्रेमिका के साथ मिलकर बुजुर्गों की हत्या कर दी। आसपड़ोस का कोई व्यक्ति उसी दिन शाम उनसे मिलने पहुंचा तब पता चला कि उसी रात को उनकी हत्या हो चुकी है। तीन-चार दिन बाद केयरटेकर पकड़ा गया। उसकी प्रेमिका भी गिरफ्त में आई पर बुजुर्ग तो इस तरह नृशंसता से मारे गए।
क्या यह पहली घटना है या एकमात्र घटना है? शायद नहीं! खबरों में बहुत बार आता है एक बुजुर्ग पुरुष या बुजुर्ग महिला का उनके सेवक ने मर्डर कर दिया। कई बार तो यह सेवक पांच या इससे अधिक अवधि से उनके साथ काम कर रहे होते हैं, पर वह कब बदनीयत हो जाएं इसकी कोई गारंटी नहीं होती।
दिल्ली पुलिस ने पिछले दिनों यह अभियान चलाया था कि किसी भी कॉलोनी के नजदीक के थाने वाले पुलिसकर्मी अकेले रह रहें बुजुर्गों का हाल-चाल पूछने के लिए समय-समय पर उनके यहां जाते रहेंगे। इससे उनके सेवक और केयरटेकर को यह डर बना रहता है कि पुलिस की नजरों में तो हैं ही। यह अभियान अभी भी चल रहा है या नहीं इसकी जानकारी तो नहीं है पर, पुलिस द्वारा चलाया गया यह एक अच्छा अभियान था।
सुरक्षा हमारी सामूहिक जिम्मेदारी
जिस तरह से बच्चे, महिलाएं और इनकी सुरक्षा हमारी और शासन की सामाजिक जिम्मेदारी है उसी तरह बुजुर्ग भी सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। एक समय इतने सक्रिय रहने वाले और उच्च व प्रतिष्ठित पदों पर रह चुके आज उम्र के तकाजे के कारण अशक्त और मजबूर हो जाते हैं। उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। यह सही है कि वह अपनी सहायता के लिए कोई सहायक रखते हैं पर, यह सहायक बहुत वेरीफिकेशन के बाद ही रखा जाए।
बुजुर्ग सबसे पहले उसकी पूरी जानकारी थाने में दें। डोमेस्टिक हेल्प देने वाली एजेंसिया एक अति विश्वसनीय व्यक्ति को ही बुजुर्गों के यहां भेजें। आजकल सभी कॉलोनियों के रहवासी संघ होते हैं। इनके सदस्य अकेले रहने वाले बुजुर्गों के पास नियमित मिलने जाते रहें। इसमें उनकी खुशी के साथ-साथ एक मानवीय कर्तव्य भी पूरा हो जाता है। बुजुर्गों की सुरक्षा समाज का एक ऐसा शुभ कार्य है जो हमें हमारे भविष्य के प्रति भी सचेत करता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।