रूस-यूक्रेन युद्ध: अब गेहूं निर्यात बना भू राजनीतिक वैश्विक मुद्दा
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पिछले कुछ महीनों से रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग की वजह से विश्व की खाद्यान्न आपूर्ति श्रृंखला पटरी से उतर सी गई है। अब रूस गेहूं के निर्यात का इस्तेमाल एक भू-रणनीतिक रूप में कर रहा है। यूरोपियन यूनियन की प्रमुख उर्सला वान डेर लिएन ने कहा है कि रूस खाद्यान्न को हथियार बनाकर दुनिया की मुश्किलें बढ़ा रहा है।
उधर दावोस में विश्व के प्रमुख फाइनेंसर जार्ज सोरोस ने दावा किया है कि तीसारा विश्वयुद्व छिड़ने की आशंका अभी समाप्त नहीं हुई है। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने साफ कर दिया है कि वैश्विक खाद्य संकट सुलझाने के लिए पश्चिमी देशों को रूस पर लगे प्रतिबंध हटाना होगा। फिलहाल रूस अपने ऊपर लगे कुछ प्रतिबन्धों को हटाये जाने के बाद खाद्यान्न से लदे जहाजों को जाने की अनुमति दे रहा है।
इस वक्त यूक्रेन के बंदरगाहों पर रूसी सैनिकों का कब्जा है। पिछले करीब तीन महीनों से इन बंदरगाहों से गेहूं की आपूर्ति बंद थी। इस वजह से दुनिया की लगभग एक चौथाई से ज्यादा गेहूं की जरूरत को पूरा करने वाले देश रूस- यूक्रेन से गेहूं का निर्यात बाधित है।
यूक्रेन गेहूं-मक्का और सूरजमुखी के तेल का भी बड़ा निर्यातक देश हैं। अब तक रूस ने राजनीतिक कारणों से ही गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखा था। पर रूस के सुरक्षा परिषद के प्रमुख निकोलाई पत्रुशेव की यह चेतावनी भी अपनी जगह बरकरार है कि-यूक्रेन में युद्ध खत्म होने के अभी आसार नहीं है। उनका दावा है कि वहां युद्व तब तक जारी रहेगा- जब तक वहां से नाजीवाद खत्म नहीं हो जाता।
रूस- यूक्रेन के बीच जारी युद्ध की वजह से खाद्यान्न आपूर्ति की श्रृंखला प्रभावित हुई है। दुनिया के कई देशों में पेट्रोलियम पदार्थों और खाद्य पदार्थों की कीमतें भी आसमान छू रही हैं। विश्व व्यापार संगठन इसके लिए उन इक्कीस देशों को जिम्मेवार बता रहा जिन देशों ने खाद्य पदार्थों के निर्यात पर पाबंदी लगा रखी हैं।
विश्व व्यापार संगठन के महानिदेशक गोजी ओकोंजो को उम्मीद है आगामी जून में विश्व व्यापार संगठन की बैठक में इस मुद्दे पर गंभीरता से चर्चा होगी। शायद खाघ पदार्थों के निर्यात पर लगे प्रतिबंध हटाने के बाबत कुछ गुंजाइश बने।
भारत पर गेहूं निर्यात की पाबंदी
भारत पर भी गेहूं निर्यात से पाबंदी हटाने का दबाव जी-7 और अमेरिका समेत दुनिया के कई देश बना रहे है। हालांकि गेहूँ के निर्यात में भारत की हिस्सेदारी एक फीसद से भी कम है। फिलहाल भारत के पास इतना बफ़र स्टॉक है कि वह अपनी खाद्यान्न जरूरतों को पूरा करने के अलावा एक करोड़ टन गेहूं का निर्यात कर सकता है।
इस साल मार्च के तीसरे सप्ताह तक भारत अपने पड़ोसी देशों को लगभग सत्तर लाख टन गेहूं निर्यात कर चुका है। इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी बांग्लादेश, श्रीलंका और संयुक्त अरब अमीरात की है। भारत को गरीब अन्न कल्याण योजना के तहत अस्सी करोड़ लोगों के पेट भरने की चिंता भी है और अपने पड़ोसी देशों के साथ गेहूं निर्यात के समझौते को भी बरकरार रखना है। वैसे विश्व बाजार में गेहूं के पचहत्तर फीसद से अधिक निर्यात में-रूस-यूक्रेन, अमरीका, कनाडा, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और अर्जेटीना की भागीदारी है।
गेहूं की पैदावार में कमी
भारत में इस साल पिछले साल के मुकाबले लगभग इकतीस लाख टन गेहूं की पैदावार कम हुई है। इसकी एक बड़ी वजह पिछले एक सौ बाइस साल के मुकाबले इस साल मार्च-अप्रैल महीने में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचना है। इस साल 'हिटवेव' की वजह से गेहूँ दाने कम पुष्ट हुए। उन्नत किस्म के गेहूं के बीज की खोज के बाद ही कई देश गेहूं उत्पादन में आत्म निर्भर हुए और निर्यातक बनें।
उन्नत गेहूं के प्रजाति की खोज का भी एक दिलचस्प इतिहास है। अमरीका में जब रूजवेल्ट राष्ट्रपति चुने गए थे, उस वक्त एक अमरीकी प्रतिनिधि मंडल मेक्सिको के राजा के राज्याभिषेक कार्क्रम में भाग लेने मेक्सिको गया। उस वक्त मक्के के अत्यधिक उत्पादन से बंजर हो चुकी जमीन पर गेहूं की पैदावार बढ़ाने के लिए अमरीका के सहयोग की जरूरत मेक्सिको को महसूस हुई।
अमरीका- मेक्सिको को गेहूँ की पदावर बढ़ाने की परियोजना पर सहयोग देने के लिए राजी हो गया। अमेरिका इस परियोजना को आगे बढ़ने के लिए रॉकफेलर योजना के तहत मदद की पेशकश किया। इस योजना को पूरा करने के लिए एल्विन स्टेकमेन जिम्मेदारी दी गयी। स्टेकमेन ने अपने पुराने छात्र नॉर्मन बोरलॉग को इस परियोजना में शामिल किया।
गेहूं की उन्नत प्रजाति की खोज
कृषि वैज्ञानिक नार्मन बोरलॉग के प्रयास से सन् 1959 में गेहूं की उन्नत प्रजाति की खोज सम्भव हुई। उस वक्त भी बोरलॉग के गुरु एल्विन स्टेकमेन गेहूँ के भू- राजनीतिक इस्तेमाल के खतरे को भाप गए थे। उन्हें आश्चर्य इस बात को लेकर हुआ कि अमरीका की इस परियोजना को मेक्सिको ने इतनी जल्दी स्वीकार कैसे किया?
बहरहाल इस परियोजना को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी स्टेकमेन ने नार्मन बोरलॉग को इस उम्मीद के साथ सौंपा कि तमाम कठिनाइयों के बावजूद बोरलॉग इस परियोजना को 'मिशनरी जिल' से पूरा करेगें। इस प्रोजेक्ट को कितनी मेहनत करके बोरलॉग ने पूरा किया।
इसका विस्तृत विवरण सुषमा नैथानी की हाल ही में 'नेशनल बुक ट्रस्ट' से प्रकाशित पुस्तक- "अन्न कहां से आता है " में भी उपलब्ध है। एक कृषि वैज्ञानिक के साथ-साथ मिनसेटा विश्वविद्यालय के पहलवान रहे बोरलॉग सन् 1944 में मेक्सिको पहुंचे।
'शटल ब्रीडिंग' प्रक्रिया
दो साल के अंदर मेक्सिको के दो भिन्न जलवायु वाले इलाके में 'शटल ब्रीडिंग' के जरिए जो मुकाम वे हासिल किए। उससे उनके प्रतिद्वंद्वी कृषि वैज्ञानिकों में भी ईष्या पैदा होने लगी। वे बोरलॉग को हतोत्साहित करने के उद्देश्य से 'शटल ब्रीडिंग' को समय और संसाधनों की बर्बादी करार रहे थे। बोरलॉग ने अपना प्रयोग रोकने के बजाय अपने इस्तीफे की पेशकश कर दिया। पर स्थानीय किसान बोरलॉग के इस प्रयोग की उपयोगिता और व्यवहारिकता से प्रसन्न थे। वे बोरलॉग के साथ खड़े थे।
दरअसल बोरलॉग जिस जगह अपना प्रयोग शुरू किए-वहां नवम्बर-दिसंबर में गेहूं की बुआई हो जाती थी। अप्रैल-मई तक फसल कट जाती थी। वहीं सेंट्रल मेक्सिको में गेहूं अप्रैल-मई में बोया जाता था और फसल की कटाई अक्टूबर-नवम्बर तक हो जाती थी।
बोरलॉग की 'शटल ब्रीडिंग' योजना से मैदानी और पहाड़ी इलाके में गेहूँ के अच्छी पैदावार की संभावना बढ़ती गई।इस वजह से मेक्सिको जो उन्नति प्रजाति के गेहूँ के खोज के पहले अपने जरूरत का करीब पचपन फीसद आयात करता था।
यह भी एक अजीबोगरीब घटना है कि जो अमरीका आज भारत पर गेहू के निर्यात पर लगे पाबंदी पर रोक हटाने के लिए दबाव बना रहा है, उसी अमरीका में गेहूं और गेहूं से बनें सामग्री पर रोक लगाने के लिए सन् 2911 से अभियान चलाया जा रहा है। प्रमुख हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर विलियम डेविस सन् 2011 में एक किताब लिखी- the wheat belly( व्हीट बेली)। इस पुस्तक में विस्तार से बताया गया है कि-मोटापा ,हृदयरोग, और डाइबिटिज जैसे बीमारियों की मुख्य वजह गेहूं और गेहूं से बने अन्य सामग्री हैं।
गेहूं और रोग का खतरा
इस वजह से इसे तत्काल अपने प्लेट से हटाने में ही भलाई है। डॉ विलयम इसके बदले 'स्माल मिलेट्स' कहें जाने वाले अनाज-मसलन ज्वार-बाजरा-मक्का और चना से मिक्स आटे की रोटी और दूसरे व्यंजन खाने की सलाह दे रहे है।
गेहूँ में पाये जाने वाले 'ग्लूटेन प्रोटीन' को सबसे खतरनाक माना जा रहा है। गेहूँ में इसकी मौजूदगी से पेट संबंधी रोगों के लिए भी जिम्मेदार बताया जा रहा है। इसके अलावा अफरा, गैस, उल्टी, माइग्रेन और जोड़ो में तकलीफ की बीमारी की मुख्य वजह भी ग्लूटेन प्रोटीन को बताया जा रहा है। पूरी दुनिया मे ग्लूटेन प्रोटीन पर रिसर्च चल रहा है।
अमेरिका में गेहूँ को लेकर एक तरह से दोहरा अभियान चल रहा है। एक तरफ गेहूँ की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए हाहाकार मची है, वहीं दूसरी तरफ गेहूँ और गेहूँ से बनें सामग्री को जितना जल्दी हो- खाने की प्लेट से अलग करने की मुहिम छिड़ी है। गेहूँ के भोजन में प्रयोग को मधुमेह-हृदय रोग-मोटापा के लिए जिम्मेदार बताया जा रहा है। अब दुनिया के सामने मुश्किल सवाल है कि- पेट की ज्वाला शांत करने और शरीर की अनेक बीमारियों से छुटकारा पाने के बीच कौन सा उपाय ज्यादा मुफीद रहेगा?
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