फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   rural employment and unemployment in india migration in coronavirus pandemic government schemes for villages covid 19 impact on workers

कोरोना महामारी और आर्थिक संकट: गांवो में मिले रोजगार को बढ़ावा

Sat, 01 Aug 2020 12:07 PM IST
Ramesh saraf रमेश सर्राफ
Updated Sat, 01 Aug 2020 12:07 PM IST
सार

  • दूसरे प्रांतों में रोजगार को गए लोगों के अपने घरों में लौटने के कारण उनके सामने रोजगार का संकट व्याप्त हो रहा है। हालांकि केंद्र व राज्य सरकारें स्थानीय स्तर पर मनरेगा में लोगों को काम उपलब्ध करा रही हैं। मगर हर व्यक्ति मनरेगा में काम नहीं कर सकता है।
  • लोगों को शहरों से हो रही विमुखता व पलायन को देखते हुए सरकार को चाहिए कि गांवो में भी लोगों को रोजगार के साधन उपलब्ध करवाए जाएं। गांवो, कस्बों के आसपास ऐसे लघु व कुटीर उद्योग धंधे स्थापित करने चाहिए, जहां लोग काम कर अपनी जीविका चला सकें।

विज्ञापन
rural employment and unemployment in india migration in coronavirus pandemic government schemes for villages covid 19 impact on workers
भारत एक कृषि प्रधान देश माना गया है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pixabay

विस्तार

कोरोना वायरस के कहर के चलते पूरे देश का जनजीवन रुका पड़ा है। देश में बड़ी संख्या में उद्योग धंधे व अन्य व्यावसायिक गतिविधियां बंद पड़ी हैं। देश में लंबे समय के लिए हुई तालाबंदी के कारण उन लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट उत्पन्न हो गया जो बड़े शहरों के कल कारखानों में मेहनत मजदूरी कर अपना गुजारा करते थे।

विज्ञापन


चूंकि देश भर में विभिन्न कल कारखानों व अन्य संस्थानों में काम करने वाले अधिकतर लोग अस्थाई कामगार रहते हैं। इस कारण काम बंद होते ही वहां कार्यरत सभी कामगार अपने घरों को लौट गए। 
विज्ञापन

धीरे-धीरे देश में लॅाकडाउन तो हटा दिया गया। मगर मजदूरों के अभाव में बंद पड़े उद्योग-धंधे सुचारू रूप से नहीं चल पा रहे हैं।

अब उद्योग-धंधे वाले मालिक अपने यहां काम करने वाले मजदूरों को पहले से अधिक मजदूरी व विभिन्न प्रकार की अन्य सुविधाओं का लालच देकर बुला रहे हैं। मगर अधिकांश मजदूर अपने उन मालिकों के पास फिर से नहीं जाना चाहते हैं। जिन्होंंने संकट के समय में उन्हे भगवान भरोसे छोड़ दिया था।
विज्ञापन
विज्ञापन


पर प्रांतोंं से अपने घरों को लौटे मजदूर चाहते हैं कि उनको उनके प्रदेश में ही रोजगार मिल जाए। ताकि फिर कभी ऐसी स्थिति आने पर दर-बदर नहीं होना पड़े। पर प्रांतो से आने वाले बहुत से कामगार विभिन्न कार्यों में दक्ष हैं।

यदि उन्हें उनके आसपास ही कोई कार्य मिल जाए तो अपने परिवार के साथ थोड़े में भी गुजारा करने को तैयार हैं। दूसरे प्रदेशों में काम करने वाले लोगों के पास जो कुछ जमा पूंजी थी। वह भी इस दौरान खाने पीने में खर्च हो गई।
 
दूसरे प्रांतों में रोजगार को गए लोगों के अपने घरों में लौटने के कारण उनके सामने रोजगार का संकट व्याप्त हो रहा है। हालांकि केंद्र व राज्य सरकारें स्थानीय स्तर पर मनरेगा में लोगों को काम उपलब्ध करा रही हैं। मगर हर व्यक्ति मनरेगा में काम नहीं कर सकता है।

ऐसे में उसके सामने बेरोजगारी मुंह बाए खड़ी है। तालाबंदी के कारण करोड़ों की संख्या में लोगों का एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में जाना भारत के इतिहास में शायद पहली बार हुआ है। कोरोना संकट के चलते देश में करोड़ों लोग बेरोजगार भी हुए हैं।

मगर नवयुवकों में शहरीकरण की बढ़ती चकाचैंध व खेती से विमुखता के चलते गांवों से बड़ी संख्या में लोग शहरों की तरफ पलायन कर गए थे...

rural employment and unemployment in india migration in coronavirus pandemic government schemes for villages covid 19 impact on workers
कोरोना संकट के कारण शहरों में गए लोग वापस अपने मूल गांव की तरफ लौट आए- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pixabay

इससे एक बात उभर कर सामने आती है कि यदि राज्य सरकारें अपने यहां स्थानीय स्तर पर ही रोजगार की व्यवस्था कर सके तो आगे भविष्य में फिर कभी ऐसे पलायन की स्थिति का सामना देश के लोगों को नहीं करना पड़े। इसके लिए केंद्र व सभी राज्य सरकारों को गंभीरता से सोचना चाहिए। सरकारों को ऐसे उपाय करने चाहिए जिससे लोगों को रोजगार के लिए भटकना नहीं पड़े। 

भारत एक कृषि प्रधान देश माना गया है। जिसकी कभी 80 प्रतिशत आबादी गांव में निवास करती थी। मगर नवयुवकों में शहरीकरण की बढ़ती चकाचैंध व खेती से विमुखता के चलते गांवों से बड़ी संख्या में लोग शहरों की तरफ पलायन कर गए थे। इस कारण शहरो में जनसंख्या बढती गई व गांवो की घटती गई। जिस कारण शहरो में आबादी का अनुपात 20 से बढ़कर 40 प्रतिशत हो गया व गांवो की आबादी घटकर 60 प्रतिशत रह गयी थी।

मगर कोरोना संकट के कारण शहरों में गए लोग वापस अपने मूल गांव की तरफ लौट आए। इस कारण भारत आज फिर एक बार गांवों का देश बन गया है। लोगों को शहरों से हो रही विमुखता व पलायन को देखते हुए सरकार को चाहिए कि गांवो में भी लोगों को रोजगार के साधन उपलब्ध करवाए जाएं। गांवो, कस्बों के आसपास ऐसे लघु व कुटीर उद्योग धंधे स्थापित करने चाहिए, जहां लोग काम कर अपनी जीविका चला सकें।

इससे स्थानीय स्तर पर कला को भी पहचान मिलेगी व गांवों की परंपरा भी बरकरार रह सकेगी। गांवों में स्थानीय स्तर पर आज भी बहुत सी वस्तुओं का उत्पादन हो सकता है। मगर विधिवत प्रषिक्षण व बाजार तक नहीं पहुंचने के कारण उसकी सही कीमत नहीं मिल पाती है।
 
सरकार स्थानीय स्तर पर उत्पन्न होने वाली वस्तुओं का विधिवत रूप से सर्वेक्षण करवा कर उसी से संबंधित छोटे कारखाने लगाए तो गांवो में भी कम कीमत पर अच्छी गुणवत्ता वाली वस्तुएं बनाई जा सकती है। इससे अपने घरो में रहकर ही लोग सपरिवार काम कर सकेगें। इसके साथ में लोग अपना कृषि कार्य भी कर सकेगें। पूरे परिवार के लागों के एकसाथ काम करने से उनकी आमदनी भी अधिक होगी व उनको रोजगार के लिए पर प्रांतोंं में भी नहीं जाना पड़ेगा।

सरकार को पशुपालन को भी प्रोत्साहन देना चाहिए...

rural employment and unemployment in india migration in coronavirus pandemic government schemes for villages covid 19 impact on workers
सरकार को कृषि में आधुनिक तकनीकी व सुविधाएं उपलब्ध करवानी चाहिए- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : pixabay

गांवों में रोजगार को बढ़ावा देने के लिए सरकार को कृषि कार्यों को भी बढ़ावा देना चाहिए। सरकार को कृषि में आधुनिक तकनीकी व सुविधाएं उपलब्ध करवानी चाहिए। इसके साथ ही कृषि से जुड़े छोटे कुटीर उद्योग, बागवानी, पशुपालन को भी बढ़ावा देना चाहिए ताकि कामगारों को स्थानीय स्तर पर ही रोजगार उपलब्ध हो सके।

उन्नत तकनीकी व वैज्ञानिक ढंग से खेती करने से किसानों को अधिक फसल मिलेगी जिससे उनकी आय में भी बढ़ोतरी होगी। पशुपालन भी खेती के सथ ही जुड़ा हुआ है। किसान खेती के साथ पशुपालन का कार्य भी करता है। पशुपालन से उसको खेती के अलावा और अतिरिक्त आमदनी भी मिलती रहती है। 
सरकार को पशुपालन को भी प्रोत्साहन देना चाहिए। पशुपालन में नवाचार करना चाहिए तथा अच्छी नस्ल के पशुओं को बढ़ावा देना चाहिए। जिससे पशुपालन में भी लोगो के रोजगार के अवसर बढ़ सके व पशुपालन भी मुनाफे का धंधा बन सके।

आज गांवों में बड़ी संख्या में पोल्ट्री फार्म खुल रहे हैं। जिससे लोगों को रोजगार भी मिल रहा है और उनकी आय भी बढ़ रही है। उसी तरह गांव में उन्नत नस्ल के बकरी, भेड़, गाय, भैंस पालन केंद्र भी खोलने चाहिए। 

हरियाणा की मुर्रा नस्ल की भैंस सबसे अच्छी भैंस मानी जाती है। जो सबसे ज्यादा दूध देती है। सरकार को मुर्रा नस्ल की भैंस को बढ़ावा देना चाहिए। गांवोंं में पशुपालन केंद्र खोलने को बढ़ावा देकर सरकार लोगों को रोजगार उपलब्ध करवा सकती है। अच्छी नस्ल के पशुओं से लोगों को अधिक दूध प्राप्त होगा व पशुओं की अच्छी कीमत भी मिल सकेगी। 

भारत जैसे विशाल देश में सिर्फ शहरी उद्योग धंधों के भरोसे ही नहीं रहा जा सकता है। यहां रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए खेती-बाड़ी, पशुपालन जैसे कार्यों पर भी पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए। जिससे लोगों का गांवो से शहरों की तरफ जाना कम होगा। इसके साथ ही गांवों में रहने वाले लोगों की आमदनी भी बढ़ेगी जिससे उनका जीवन बेहतर हो सकेगा। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed