यादों में अलोकेश लाहिड़ी यानी बप्पी दा: मेलोडी,डिस्को और फ्यूजन के सुनहरे दौर के जादूगर
केवल डिस्को या डांस के गाने ही नहीं, बहुत खूबसूरत मेलोडियस सांग्स भी बप्पी दा की देन हैं। सत्तर के दशक की फिल्मों में सैयां बिना घर सूना, माना हो तुम बेहद हसीं, ज़िद न करो, जैसे उनके गाने तो हमेशा याद रहेंगे ही। मिथुन चक्रवर्ती, गोविंदा और मनीषा कोइराला के उस युग में हम टीन एजर्स की सपनीली दुनिया के कई गीत भी बप्पी दा के इशारों पर रचे गए।
केवल डिस्को या डांस के गाने ही नहीं, बहुत खूबसूरत मेलोडियस सांग्स भी बप्पी दा की देन हैं। सत्तर के दशक की फिल्मों में सैयां बिना घर सूना, माना हो तुम बेहद हसीं, ज़िद न करो, जैसे उनके गाने तो हमेशा याद रहेंगे ही। मिथुन चक्रवर्ती, गोविंदा और मनीषा कोइराला के उस युग में हम टीन एजर्स की सपनीली दुनिया के कई गीत भी बप्पी दा के इशारों पर रचे गए।
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हिंदी सिनेमा गानों के बिना अधूरा रहा है, हमेशा से। गाने या संगीत एक ऐसी डोर है जो भाषा और सरहद से परे लोगों को जोड़ती है। आजकल की छोड़ दीजिए तो आज से 15 साल पहले तक ज्यादातर गानों के गायकों को लोग चेहरे से कम ही पहचानते थे।
कुछ गायक जो ज्यादा फेमस हो गए उनके भी नाम ही अधिक चर्चा में रहा करते थे लेकिन इन सबके बीच बप्पी लाहिड़ी एक ऐसा नाम रहा जिसे लोगों ने उनके गीतों से ज्यादा उनके अपीयरेंस से पहचाना और यह क्रेज आज भी जारी है।
अभी कुछ महीनों पहले तक उनका पब्लिक अपीयरेंस वैसा ही भव्य था जैसा पहले रहा करता था। हालांकि बीमारी ने उनके शरीर को कमजोर कर दिया था लेकिन मन से वे वैसे ही मनमौजी बप्पी दा थे और हमेशा उसी रूप में लोगों के जेहन में हमेशा रहेंगे।
कई सारे मीम्स और जोक्स उनके पहने जाने वाले जेवरों और सोने को लेकर बने। लेकिन इन सबसे इतर उनके कम्पोज किए गाने उनके पहने सोने से भी ज्यादा कीमती बन गए। वो गाने जब भी बजेंगे एक पूरी पीढ़ी के क्रेज को बयां करेंगे। बप्पी का दा का यह क्रेज आने वाली कई पीढ़ियों तक बना रहेगा।
वो जाते हुए 80 के दशक की विदाई का समय था और तब हमारे घर में टीवी तो था लेकिन केबल कनेक्शन नहीं हुआ करता था। केबल पर उस दौर में लगभग हर रात उस जमाने की नई फिल्में आया करती थीं। जाहिर था कि वो फिल्में हम नहीं देख सकते थे। लेकिन हां उन फिल्मों के गाने सुनने की पूरी छूट थी। ये गाने ट्रांजिस्टर पर तो बजते ही थे, घर में रखे टेप रिकॉर्डर पर भी नए गानों के कैसेट्स लगाकर सुना जाता था।
इसी तरह पहली बार मैंने सुना 'आय एम अ डिस्को डांसर।' ये पहली बार था जब हमने इस अनोखी आवाज और रिदम को सुना था। हम किशोरावस्था की ओर बढ़ते बच्चों के लिए ये शरीर और आत्मा सबको रिदम में ला देने वाला सरप्राइज था। डिस्को के उस सरप्राइज ने हमें बेवजह सेलिब्रेट करने के कई मौके दिए। जन्मदिन पर, पिकनिक पर, किसी की शादी में हर मौके पर डिस्को की वो धुन हमारे दिलों-दिमाग पर हावी रहती।
फिर आया दौर 90 के दशक का जब हम मिडिल क्लास में आए। हम गर्ल्स स्कूल में पढ़ा करते थे और स्कूल के दिनों में जब अध्यक्ष पद आदि के चुनाव होते तो पहली शर्त होती थी प्रत्याशी का डांस करके दिखाना। ये उस समय की जनता यानी स्कूल की छात्राओं की बहुत ही भोली सी मांग हुआ करती थी। डांस की इस शर्त को पूरा करते बप्पी दा के पेपी सांग्स। एक छोटे से कैसेट प्लेयर में कैसेट लगाकर डांस सिर्फ प्रत्याशी शुरू करता था लेकिन आधे गाने तक आते आते पूरी क्लास उस डांस में कूद पड़ती।
केवल डिस्को या डांस के गाने ही नहीं, बहुत खूबसूरत मेलोडियस सांग्स भी बप्पी दा की देन हैं। सत्तर के दशक की फिल्मों में सैयां बिना घर सूना, माना हो तुम बेहद हसीं, ज़िद न करो, जैसे उनके गाने तो हमेशा याद रहेंगे ही। मिथुन चक्रवर्ती, गोविंदा और मनीषा कोइराला के उस युग में हम टीन एजर्स की सपनीली दुनिया के कई गीत भी बप्पी दा के इशारों पर रचे गए। ये वो गीत थे जो 90 के दशक को बॉलीवुड की कई खूबसूरत जोड़ियों और मेलोडी से भरपूर यादों का तोहफा दे गए।
बाद में पता चला कि बप्पी लाहिड़ी एक ऐसे परिवार से थे जहां संगीत रगों में बहता था। उनके माता पिता दोनों नियमित रियाज करने वाले गुणीजन थे और यही विरासत बप्पी दा को भी मिली।
हिंदी फिल्मों के इतर उनके बनाए और कुछ गाए गए गाने उनकी मातृ भाषा बंगाली में भी मौजूद हैं जो उतने ही मीठे और मधुर हैं। गानों को खुद आवाज देने के अलावा बप्पी दा खुद तबले से लेकर पियानो, ड्रम, गिटार, बॉंगो और सेक्सोफोन जैसे वाद्यों का भी बेहतरीन इस्तेमाल करने के लिए जाने जाते थे।
बप्पी दा ने म्यूजिक को एक पूरी पीढ़ी की नई आइडेंटिटी के रूप में दिया। उनके म्यूजिक में पारंपरिक मेलोडी के साथ नएपन का फ्यूजन था जो तुरंत जुबान पर चढ़ जाया करता था और यह असर आने वाली कई पीढ़ियों तक रहेगा।