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रामनवमी विशेष: अयोध्या में राम मंदिर और इतिहास की एक यात्रा

Wed, 29 Mar 2023 04:08 PM IST
Amiy bhushan अमिय भूषण
Updated Wed, 29 Mar 2023 04:08 PM IST
सार

निर्माण की गति देखते हुए संभावना है की जनवरी 2024 मकर संक्रांति तक मंदिर लोगों के लिए खोल दिया जाएगा। अयोध्या रामजन्मभूमि पर होने वाले रामनवमी उत्सव में ये आखिरी अस्थायी परिसर वाला आयोजन होगा। अगले वर्ष रामनवमी के समय में यहां की छटा देखते बनेगी।

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Rama Navami 2023: History of Ayodhya Ram Janmabhoomi
पौराणिक हिंदू मान्यतानुसार चैत्र नवरात्र का अंतिम दिन श्रीराम जन्म उत्सव दिवस है - फोटो : amar ujala

विस्तार

इन दिनों रामनवमी महोत्सव की तैयारियां जोरों पर है। पौराणिक हिंदू मान्यतानुसार चैत्र नवरात्र का अंतिम दिन श्रीराम जन्म उत्सव दिवस है। बात इसकी तैयारियों की करें तो वर्ष प्रतिपदा के आगमन के साथ ही यह शुरू हो जाता है। इस बीच अयोध्या अवस्थित रामजन्मभूमि मंदिर पुनर्निर्माण भी चर्चा में है। 

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निर्माण की गति देखते हुए संभावना है की जनवरी 2024 मकर संक्रांति तक मंदिर लोगों के लिए खोल दिया जाएगा। अयोध्या रामजन्मभूमि पर होने वाले रामनवमी उत्सव में ये आखिरी अस्थायी परिसर वाला आयोजन होगा। अगले वर्ष रामनवमी के समय में यहां की छटा देखते बनेगी। तब नवनिर्मित गर्भगृह में रामलला विराज चुके होंगे जिसकी तैयारियां जोरों पर है। इस मंदिर निर्माण को लेकर कई कौतूहल भी है मसलन एक ऐसा निर्माण जो अगले हजार वर्ष तक मजबूती के साथ खड़ा रहेगा।

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सूर्य की किरणें सीधे राम मूर्ति के चेहरे पर

एक ऐसी संरचना जो भारतीय स्थापत्य का एक अनुपम उदाहरण हो जहां उकेरे शिल्प भी विषमयकारी होंगे। इतना ही नही यहां पुरातन भारतीय ज्ञान के आधार पर एक विशेष रचना भी बनाई जा रही है। जहां रामजन्म की वेला में सूर्य की किरणें सीधे यहां स्थापित राम मूर्ति के चेहरे पर पड़ेगी। तब हर रामनवमी को दोपहर बारह बजे नियत समय ये संयोग यहां बना करेगा। बात व्यवस्थाओं की करे तो यहां प्रतिदिन एक लाख लोगों के दर्शन की समुचित व्यवस्था होगी।

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वहीं विशेष तिथियों पर चलने वाले परिक्रमा यात्राओं के लिए भी व्यवस्थायें बढ़ाई जा रही हैं। इन दिनों यहां लाखों की भीड़ अयोध्या नगर की तंग गलियों से होकर अपनी परिक्रमा संकल्पना पूरी करती है। ऐसे में अब जब अयोध्या का कायाकल्प हो रहा है तो लगे हाथ धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण परिक्रमा पथ का भी नवनिर्माण हो रहा है।

होंगे तीन मार्ग

यहां बीस मीटर परिधि वाले तीन मार्गों का निर्माण हो रहा है। इसमें अयोध्या के पंचकोसी और चौदहकोसी मार्ग के साथ ही चौरासी कोसी मार्ग पर भी काम चालू हुआ है। यह चौरासी कोस का क्षेत्र वास्तव में अयोध्या का सांस्कृतिक परिक्षेत्र है जिसका विशेष धार्मिक महत्व है। इसके साथ ही रामजी से जुड़ी स्मृतियों पर भी देशव्यापी काम चालू है। इन सब कारणों से देश में एक हर्ष का वातावरण बना है। वैसे जब से अयोध्या में नवनिर्माण शुरू हुआ है देश भर मे सांस्कृतिक धार्मिक चेतना का जागरण भी शुरू हुआ।

इसी कड़ी में इस वर्ष अयोध्या मे एक विशेष आयोजन भी हो रहा है। यहां श्रीराम महोत्सव के नाम से एक नौ दिवसीय उत्सव का आयोजन प्रारंभ है। जहां देशज खेल और सांस्कृतिक विधाओं का जोरदार समागम है। यहां संगीत के लोक एवं शास्त्रीय विधाओं की प्रस्तुतियां हो रही है। वही नौकायान मलखंब से लेकर कबड्डी, खो-खो एवं तलवारबाजी की स्पर्धा है। योग प्रवचन संग सुदूर केरल की युद्ध विधा कलरीपट्टू भी है।

बने और टूटे कई विश्व रिकॉर्ड

वैसे पहले भी रामनगरी मे भव्य दीपावली उत्सवों का आयोजन हुआ है। जिस अवसर पर दक्षिण कोरिया की प्रथम महिला का आना हुआ था। अयोध्या की दीपावली ने तब से अब तक अपने ही बनाये कई विश्व रिकॉर्ड तोड़े है। इस बीच अयोध्या नगरी के कायाकल्प से लेकर राम परिपथ पर सरकार कहीं आगे बढ़ चुकी है।

प्रधानमंत्री मोदी अयोध्या से जनकपुर नेपाल तक की अपनी यात्राओं द्वारा अपनी प्राथमिकताओं से अवगत करा चुके है। इस बीच दुनिया भर में हुए हालिया कुछेक पुरातात्विक खोजों मे रामायणकालीन अवशेषों का भी मिलना एक सुखद अनुभूति है। इटली और ईरान में पत्थरों पर उकेरी पुरातन राम चरित्र गाथा मिली है। वही मध्य अमेरिका के घने जंगलों में अवस्थित होंडुरास मे रामभक्त हनुमान का प्रस्तर प्रतिमा प्राप्त हुआ है।

जबकि भारतीय पुराविदों की एक टोली को इराक के बेलुला घाटी मे इनसे जुड़ा एक भित्तिचित्र प्राप्त हुआ है। यह चित्र रामायण के प्रसंगों पर आधारित है। अब भारत के मंदिर ही नही दक्षिण पूर्वी एशियाई देश भी अपने रामायण आधारित पहचान बताने मे गर्व की अनुभूति करते हैं। कोरियाई प्रायद्वीप के लोग अयोध्या को अपना नानी का घर बताते है। दरअसल, कोरिया के पितृपुरुष राजा सूरो का विवाह अयोध्या की राजकुमारी श्रीरत्ना से हुआ था। जिनकी स्मृतियों में एक निर्माण हालिया शासन में अयोध्या के सरयू तट पर किया गया है।

Rama Navami 2023: History of Ayodhya Ram Janmabhoomi
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की एक पहल प्रशंसनीय है। - फोटो : amar ujala

वहीं राम उपाधि से विभूषित थाई राज परिवार की प्रतिनिधि राजकुमारी महाचक्री सिरिंनधोर्न भारत की आध्यात्मिक यात्राओं पर आती रहती हैं। थाईलैंड मे वो भारत की सांस्कृतिक प्रतिनिधि के समान है। जबकि एशिया महाद्वीप का इकलौते ईसाई पहचान वाला देश फिलीपींस भी अपने इस अतीत को लेकर आग्रही है। तभी तो यहां हुए आसियान शिखर सम्मेलन की शुरुआत स्थानीय रामलीला के मंचन से हुई। इस कार्यक्रम मे प्रधानमंत्री मोदी से लेकर अमेरिका राष्ट्रपति तक मौजूद थे। किंतु सभी जगह एक सी परिस्थितियां नही है। प्रमाणों के बावजूद भी पाश्चात्य विद्वान राम के सांस्कृतिक प्रभाव को अब तक स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। दरअसल, उन्हें गलत सिद्ध होने का भय है।  वास्तव में दुनिया भर के देशों के भारतीय जुड़ाव वाले अतीत से इन्हें आपत्ति है। 

मुख्यमंत्री योगी की ये पहल प्रशंसनीय

ऐसे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की एक पहल प्रशंसनीय है। उनकी सरकार पश्चिम एशिया से लेकर सुदूर दक्षिण अमेरिका तक प्राप्त हुए साक्ष्यों के प्रमाणीकरण की दिशा में काम कर रही है। इसको लेकर उत्तर प्रदेश कला संस्कृति विभाग एवं अयोध्या शोध संस्थान सक्रिय है। ऐसे प्रयास इन देशों संग भारत के रिश्तों में नया अध्याय जोड़ सकते है। 

तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक थाती विरासत के प्रति प्रेम ने इस राममय संस्कृति के लिए कही अधिक अनुकूलतायें पैदा की है। ऐसा ही एक प्रयास इस वर्ष रामनवमी पर स्वामी रामदेव कर रहे हैं इस दिन राष्ट्र, धर्म और संस्कृति के जागरण एवं प्रचार संकल्पनाओं के साथ सौ युवा संन्यास ग्रहण करेंगे। इस पावन दिवस के लिए ये एक नया सार्थक चलन है। ऐसे मे संस्कृति प्रेमी नेतृत्व का होना किसी अतिरिक्त मुनाफे सा है। किंतु अब भी कुछके और प्रयासों की जरूरत है। 

ऐसा ही एक प्रयास अयोध्या से जनकपुर और अयोध्या से श्रीलंका तक हुई प्रभु श्रीराम की दोनों महत्वपूर्ण यात्रा के पड़ाव स्थलों के प्रचार एवं विकास को लेकर भी होना चाहिये। वास्तविक तौर पर राम के आदर्श, मूल्य एवं चरित्र निर्माण की कहानी इन दो यात्राओं से संबद्ध है। इनमे से अधिकांश स्थल अब भी संवारे जाने की प्रतीक्षा में है। इसकी शुरुआत राम की प्रिया देवी सीता के पावन जन्मभूमि सीतामढ़ी बिहार से हो सकती है। आखिर आद्य कवि बाल्मीकि के शब्दों में रामायण राम की मर्यादा और सीता के महान चरित्र के महत्व का ही तो ग्रंथ है। 

अगर ऐसे प्रयास प्रयोग होते रहे तो निश्चित ही आगामी वर्षों में राम जन्मोत्सव भी अपनी कथा और लीलाओं की तरह विश्वव्यापी होगा। वैसे भी सहयोग सहचर्य सह अस्तित्व और सांस्कृतिक समन्वय वाली ये संस्कृति अपने ज्ञान गुण स्वभाव नाते पुनः विश्व संचार की ओर अग्रसर है। भारतीय संस्कृति परंपरा अध्येता

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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