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राजस्थान की राजनीति: गहलोत बनाम पायलट के बीच फिर फंसा कांग्रेस आलाकमान

Sat, 26 Nov 2022 05:03 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Sat, 26 Nov 2022 05:03 PM IST
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अशोक गहलोत और सचिन पायलट - फोटो : Twitter

वैसे तो कतर में फुटबॉल का वर्ल्ड कप चल रहा है, लेकिन भारत में राजनीति का असली मैदान इस समय राजस्थान बना हुआ है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक बार फिर पूर्व उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इस बार उन्होंने पायलट के लिए 'गद्दार' शब्द का इस्तेमाल किया है। दोनों नेताओं के बीच खींचतान कोई नई बात नहीं है। विगत चार साल से राजस्थान में गहलोत बनाम पायलट देखने को मिल रहा है। अब लगता है कि बात आर-पार पर आ टिकी है।

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यहां से कुछ सवाल जो गंभीरता से उठ रहे हैं, क्या राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन होगा? क्या कांग्रेस की सरकार जाएगी? क्या कांग्रेस पार्टी टूट जाएगी? क्या राज्य में मध्यावधि चुनाव होंगे? क्योंकि जो तेवर अशोक गहलोत ने दिखाए हैं, उससे साफ है कि उन्होंने सीधी-सीधी चुनौती आलाकमान (गांधी परिवार) को दी है।

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गहलोत बनाम सचिन पायलट

आज के घटनाक्रम से पहले दोनों नेताओं के बीच तल्खी के इतिहास को जानना जरूरी है। अशोक गहलोत के नेतृत्व में जब वर्ष 2013 में राजस्थान विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने लड़ा गया था, तब पार्टी 21 सीटों पर सिमट गई थी। राज्य में बेहद कमजोर कांग्रेस की कमान तब के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने युवा साथी सचिन पायलट को सौंपी थी। पायलट के प्रदेश अध्यक्ष रहते ही कांग्रेस ने वर्ष 2018 में सत्ता में वापसी की। उस समय यह कयास जोर-शोर से लगे थे कि मुख्यमंत्री की कुर्सी सचिन पायलट को मिलेगी, लेकिन हुआ उल्टा। वरिष्ठता और अनुभव के नाम पर अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाया गया। पायलट को उप मुख्यमंत्री की कुर्सी दी गई और प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व साथ में बनाए रखा गया। 

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मुख्यमंत्री की कुर्सी ना मिलने की टीस निश्चित रूप से सचिन पायलट को रही। मई 2019 में लोकसभा चुनाव के नतीजे आए और कांग्रेस राजस्थान में सभी 25 सीटें हार गई। यहां तक मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सुपुत्र वैभव गहलोत को जोधपुर में करारी शिकस्त मिली। उस समय सचिन पायलट को आस जागी कि अब शायद आलाकमान उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप देगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नाराज पायलट जून 2020 में कोरोना महामारी के दौरान 19 विधायकों को लेकर लापता हो गए। राजस्थान में कांग्रेस सरकार बचेगी या नहीं, यह संकट गहरा गया।


कांग्रेस को अपने और समर्थक निर्दलीय विधायकों को होटल में शिफ्ट करना पड़ा। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने राजनीतिक कौशल से सरकार बचा ली, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने दोनों नेताओं के बीच खाई को और गहरा कर दिया। उस दौरान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पायलट को नाकारा और निकम्मा तक कहा। पायलट और उनके समर्थक विधायकों से सरकार तथा संगठन के दायित्व छीन लिए गए।

पायलट की पुनः वापसी हुई, लेकिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और मजबूत नेता बनकर उभरे। पूरे प्रकरण में केवल पायलट का मौन उनके पक्ष में गया। हालांकि, पायलट गुट के हेमाराम चौधरी, रमेश मीणा, विश्वेंद्र सिंह जैसे विधायकों को पुनः मंत्री बना दिया गया, लेकिन पायलट को कुछ नहीं मिला। कुछ दिनों की शांति के बाद राजस्थान में फिर कयास लगाए जाने लगे कि सत्ता परिवर्तन होगा, कुर्सी पायलट को मिलेगी। हालांकि, राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत ने ऐसा कोई अवसर नहीं छोड़ा, जहां उन्होंने पायलट को पटखनी न दी हो। फिर भी अशोक गहलोत को दिन-रात मुख्यमंत्री की कुर्सी की चिंता सताती रही है।
 

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मुख्यमंत्री अशोक गहलोत। - फोटो : Twitter

पूरे घटनाक्रम में नया मोड़ तब आया, जब राहुल गांधी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से साफ इनकार कर दिया। अशोक गहलोत के नाम पर सहमति बनती नजर आई। एक बार को लगा कि अशोक गहलोत अब कांग्रेस की कमान संभालेंगे। गहलोत ने यह कोशिश भी की कि वो मुख्यमंत्री की कुर्सी के साथ-साथ राष्ट्रीय अध्यक्ष का दायित्व संभालते रहें। सबकुछ ठीक चल रहा था, लेकिन यहां पर सचिन पायलट मात खा गए। उनका अति उतावलापन ने उन्हें कुर्सी से फिर दूर कर दिया। उस दौरान पायलट ने ऐसे जताया, जैसे अशोक गहलोत के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही उन्हें राजस्थान की कुर्सी मिल जाएगी। शायद आलाकमान से उन्हें आश्वासन मिला था।

यही बात घोर प्रतिद्वंद्वी अशोक गहलोत को चुभ गई। राष्ट्रीय अध्यक्ष के महत्वपूर्ण पद को ठुकरा कर अशोक गहलोत ने राजस्थान के मुख्यमंत्री की कुर्सी को सुरक्षित करना ज्यादा जरूरी समझा। उन्होंने विद्रोह कर डाला, जिसकी गांधी परिवार ने भी कल्पना नहीं की थी, क्योंकि राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा पर निकले थे और देश जोड़ने से पहले पार्टी जोड़ने को लेकर कांग्रेस निशाने पर आ गई।

फिर बदलती दिख रही हैं परिस्थितियां 

ताजा घटनाक्रम कुछ यूं बन रहा है कि सचिन पायलट लगातार प्रियंका गांधी को साधते चले आ रहे हैं। प्रियंका भाई राहुल को समझाने में जुटी हैं। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कई बार पायलट राहुल गांधी के साथ पदयात्रा कर चुके हैं। हाल में मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में पायलट एक बार फिर राहुल गांधी के मंच पर ना केवल दिखे, बल्कि प्रियंका और राहुल के साथ सोशल मीडिया पर उन्होंने फोटो तक शेयर की। इससे एक बार फिर चर्चा गर्म हुई कि कांग्रेस आलाकमान (गांधी परिवार) राजस्थान में कुछ गंभीर सोच रहा है।

चूंकि, राजस्थान में चुनाव को अब मात्र एक साल बचा है और जिस तरह अशोक गहलोत पिछले कुछ समय से चुनावी मोड में नजर आ रहे हैं, वह कतई इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि उनसे कुर्सी लेकर सचिन पायलट को दी जाए। कुल मिलाकर भारत जोड़ने निकले राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व के आगे राजस्थान का संकट आ खड़ा हुआ है। दिसंबर में भारत जोड़ो यात्रा राजस्थान में प्रवेश करेगी और कई जिलों से गुजरेगी। राहुल गांधी के राजस्थान प्रवेश से पहले अशोक गहलोत के सख्त तेवर उनके एक और विद्रोह की ओर इशारा कर रहे हैं।

राजस्थान में कांग्रेस को नए नवेले राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्किकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी, लोगों को जोड़ पाएंगे या नहीं, यह तो दिसंबर की सख्त सर्दियों में पता चलेगा। फिलहाल तो अशोक गहलोत कदम पीछे खींचते नजर नहीं आ रहे। पायलट भी सधे अंदाज में गहलोत को चुनौती दे रहे हैं। पूरे घटनाक्रम पर राज्य में मध्यावधि चुनाव की चर्चाएं तेज हुई हैं। हालांकि, सालभर पहले सत्ता का मोह कांग्रेस विधायक छोड़ेंगे या नहीं, यह यक्ष प्रश्न है। राजस्थान में हर पांच साल में सत्ता बदलने का जो चलन चला आ रहा है, उससे तो संभावना बनती है कि सरकार बच जाएगी, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जादूगर गहलोत बने रहेंगे या नए पायलट आएंगे, इस अग्निपरीक्षा से कांग्रेस आलाकमान को गुजरना ही होगा।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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