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रिश्वत का मामला: राजस्थान में 'कैश फॉर क्वेशन' से सवालों के घेरे में जनप्रतिनिधि

Mon, 05 May 2025 07:27 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Mon, 05 May 2025 07:27 PM IST
सार

वर्ष 2023 का तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा पर मुंबई के एक बिजनेसमैन के कहने पर लोकसभा में प्रश्न पूछने के आरोप लगे थे। इस प्रकरण में महुआ मोइत्रा की सदस्यता भी चली गई थी। 

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Rajasthan MLA  Arrested For Taking Bribe For Dropping Questions In Assembly report on it
विधायक जयकृष्ण पटेल रिश्वत लेने के आरोप में घिरे। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

'कैश फॉर क्वेशन' प्रकरण भारत में नया नहीं है, लेकिन यह पहली बार है, जब राजस्थान का एक विधायक ऐसे प्रकरण में गिरफ्तार किया गया है। गंभीर बात यह है कि विधायक पर आरोप है कि उसने विधानसभा में प्रश्न लगाए हुए हैं, जो खनन से संबंधित हैं और इन प्रश्नों को वापस लेने के लिए एक कंपनी से 10 करोड़ रुपए मांगे जा रहे थे।

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कंपनी के साथ ढाई करोड़ रुपए में सौदा भी तय हो गया था, जिसमें से 20 लाख रुपए एडवांस भी लिए जा रहे थे।

बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीति इस स्तर पर पहुंच गई है? क्या संविधान की शपथ लेने वाले जनप्रतिनिधि ब्लैकमेलर या कंपनियों के टूल बने हुए हैं? आखिर राजनीति में इतनी गिरावट क्यों आ रही है? 
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वर्ष 2023 का तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा पर मुंबई के एक बिजनेसमैन के कहने पर लोकसभा में प्रश्न पूछने के आरोप लगे थे। इस प्रकरण में महुआ मोइत्रा की सदस्यता भी चली गई थी। तब भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने यहां तक कहा था कि महुआ मोइत्रा ने संसद में जो 61 प्रश्न पूछे, उसमें से 50 सुरक्षा से जुड़े हुए थे, यानी मामला बेहद गंभीर था। इससे पहले, वर्ष 2005 में भी 'कैश फॉर क्वेरी' प्रकरण में 11 सांसदों की सदस्यता चली गई थी।  
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प्रश्न पूछने की प्रक्रिया

दरअसल, विधानसभा या लोकसभा में प्रश्न पूछने की एक प्रक्रिया है। एक सदस्य सदन के नियमों के अनुसार सरकार या किसी मंत्री से संबंधित किसी विषय पर प्रश्न पूछ सकता है। सदस्य को प्रश्न की सूचना पहले देनी होती है, सदस्य तारांकित, अतारांकित, अल्पसूचित प्रश्न पूछ सकता है। तारांकित प्रश्न में मौखिक रूप से उत्तर देने की अनुमति संबंधित मंत्री को दी जाती है।


अतारांकित प्रश्न में प्रश्नों का जवाब लिखित रूप से दिया जाता है और उन्हें सदन में चर्चा के लिए नहीं रखा जाता है। अल्पसूचित प्रश्न में सदस्य को पहले से पता नहीं होता है कि प्रश्न कब पूछा जाएगा? इसके अलावा, प्रश्न निजी सदस्यों से पूछे जाते हैं, जैसे किसी विधेयक, संकल्प या सदन के कार्य से संबंधित अन्य मामले पर। 

अक्सर सरकारों पर आरोप लगता है कि सरकार सदन में प्रश्नों के उत्तर नहीं दे रही है। राजस्थान विधानसभा का ही उदाहरण लें। पिछले दिनों राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने बताया था कि विधानसभा में 10 हजार से अधिक लंबित प्रश्नों में से 95 प्रतिशत के उत्तर आए हैं। लगभग साढ़े चार हजार प्रश्न तो विगत 15वीं विधानसभा के भी लंबित थे, यानी इतनी बड़ी संख्या में प्रश्नों के उत्तर सरकार की ओर से सदस्यों को समय पर नहीं मिले। 

अब बात ‘कैश फॉर क्वेशन’ वाले राजस्थान के भारत आदिवासी पार्टी (बाप) के बागीदौरा सीट से विधायक जयकृष्ण पटेल की कर लेते हैं। उन्होंने जो प्रश्न लगाया, वो उनकी विधानसभा से संबंधित नहीं था। उन्होंने 650 किलोमीटर दूर करौली जिले में खनन को लेकर प्रश्न लगाए हैं। वैसे, सदस्यों के लिए ऐसी को बंदिश नहीं है कि वो अपनी विधानसभा से संबंधित ही प्रश्न पूछें।

सवाल यह उठता है कि खनन को लेकर एक विधायक को अपनी विधानसभा से इतनी दूर के क्षेत्र में प्रश्न लगाने की क्या आवश्यकता पड़ी? दूसरा इन प्रश्नों में ऐसी क्या बात है, जिससे एक कंपनी इतना पैसा देने के लिए राजी हो गई, यानी कुछ न कुछ दाल में काला है या कहें दाल ही काली है। 

राजस्थान, जो कि सुचिता की राजनीति के लिए जाना जाता है, वहां ऐसा वाक्या होना अचंभित करने वाला है। क्या राजनीति अपने ऐसे दौर में पहुंच गई है, जब जनप्रतिनिधि पैसे लेकर सवाल पूछ रहे हैं? कंपनी को ब्लैकमेल कर रहे हैं। कंपनी भी प्रश्नों को हटवाने के लिए सौदा कर रही है। सरकार और विपक्ष, दोनों के लिए यह परीक्षा की घड़ी है। इस प्रकरण पर गंभीर मंथन की आवश्यकता है। साथ बैठने की आवश्यकता है।

आरोप-प्रत्यारोप से बाहर निकलने की आवश्यकता है। यदि ऐसे प्रकरण की गहराई में नहीं पहुंचा गया तो जनता का विश्वास संसदीय प्रणाली से उठ सकता है। आवश्यकता पैसे लेकर प्रश्न पूछने वाले जनप्रतिनिधि पर शिकंजा कसने की है। केवल सजा देने और सदस्यता रद्द करने से का नहीं चलने वाला। ऐसे जनप्रतिनिधि के आजीवन चुनाव लड़ने पर रोक लगनी चाहिए, ताकि बाकी को सबक मिले।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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