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सावरकर नहीं, राहुल ने मांगी माफी

Sun, 29 Dec 2019 02:41 AM IST
आसिम खान गिरीश रंजन तिवारी
गिरीश रंजन तिवारी Published by: आसिम खान Updated Sun, 29 Dec 2019 02:41 AM IST
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Rahul Gandhi apologizes Not Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (फाइल फोटो) - फोटो : SAVARKARSMARAK.COM

विनायक दामोदर सावरकर की हाल में राहुल गांधी ने खिल्ली उड़ाई थी, हालांकि सावरकर का स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान रहा। अंग्रेजों द्वारा उनके क्रूरतम उत्पीड़न का दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। उनसे अंग्रेज इतने भयभीत थे कि उन्हें कालापानी में दो जन्मों के आजीवन कारावास की सजा दी थी। उनके साथ अंडमान की जेल में हुआ जुल्म विश्व के अमानवीय जुल्मों में शुमार है। उन्हें जिस कोठरी में रखा, उसी में शौच भी करना होता था। खाने को उबले चावल का चूरा और घास व कीड़ों से युक्त सब्जी होती थी। सावरकर का मनोबल न टूटने पर उन्हें छह माह तन्हाई में, सात दिन बेड़ियों में हाथ छत से बांधकर खड़ा और दस दिन त्रिभुज के आकार के लट्ठों में पैर फैलाकर बांधकर रखा। उनसे बैल की तरह जुआ खींचकर प्रतिदिन तीस किलो तिल का तेल निकलवाया जाता। माह में अमूमन तीन कैदियों को सावरकर की नजरों के सामने फांसी देते थे। 

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इन हालातों में अनेक कैदियों ने आत्महत्या कर ली, मर गए या पागल हो गए। सावरकर को अंग्रेज तोड़ नहीं पाए। ऐसे में भी उन्होंने जेल की दीवारों में 5000 पंक्तियां कविताओं की लिखीं और याद भी रखीं। कालापानी जेल में अंग्रेजों ने किसी को पांच वर्ष से ज्यादा नहीं रखा, लेकिन सावरकर को दस वर्ष रखा, आठ साल तक परिवारजनों से नहीं मिलने दिया, इसी जेल में उनके भाई गणेश भी बंद थे, पर दोनों को एक दूसरे का पता न था। 1921 के बाद उन्हें 1926 तक रत्नागिरी जेल में और 1937 तक नजरबंदी में यानी सर्वाधिक 27 वर्ष जेल या नजरबंदी में रखा। 1910 में लंदन में सरकार विरोधी गतिविधियों के आरोप में गिरफ्तार कर जहाज से भारत लाने के दौरान वे फ्रांस के निकट कूद कर सिपाहियों की गोलियों की बौछार के बीच तैरकर फ्रांस जा पहुंचे। 
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अंग्रेजों ने अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ धोखे से फ्रांस से उन्हें गिरफ्तार किया। जेल में सावरकर की जीवटता से उनके ब्रिटिश सरकार से माफी मांगने के दुष्प्रचार की असलियत समझ आती है। इसी दुष्प्रचार को राहुल गांधी ने मान्यता देते हुए हाल में कहा था, 'मैं सावरकर नहीं, जो माफी मांगूं।' हालांकि राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट की एक फटकार पर राहुल ने माफी मांग ली थी। राहुल एजेएल घोटाले के अलावा अहमदाबाद कोर्ट से मानहानि के दो मामलों में जमानत पर हैं। राहुल की दादी इंदिरा गांधी ने सावरकर को भारत का सपूत बताते हुए उन पर डाक टिकट जारी किया। ऐसे राष्ट्रभक्त का मखौल उड़ाने का राहुल को नैतिक अधिकार नहीं था।
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अनेक तथ्य हैं कि अंग्रेजों ने सावरकर के खिलाफ दुष्प्रचार किया। उन्होंने अनेक बार माफी मांगी, तो वे सर्वाधिक अवधि तक जेल में क्यों रहे, जबकि तमाम कैदी रिहा कर दिए गए? अंडमान में उन्होंने कैदियों को आमरण अनशन न कर जीवित रह कर संघर्ष करने को कहा, वह स्वयं माफी कैसे मांग लेते। माफी मांगी थी, तो उन्हें वीर की उपाधि से क्यों नवाजा गया। सावरकर की जीवनी सावरकर इकोज फ्रॉम द फॉरगॉटन पास्ट के लेखक विक्रम संपथ ने लंदन में दस्तावेजों का विस्तृत अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला कि उन्होंने माफी नहीं मांगी, बल्कि रिहाई के लिए कानून में उपलब्ध हक के तहत अपनी पैरवी की। तमाम बड़े नेता भी अपनी सजाएं पूरी न कर ऐसे प्रावधानों से रिहा होते रहे।

इतिहासविद प्रो अजय रावत के अनुसार, सावरकर का माफी मांगना अंग्रेजों का फैलाया झूठ था, जिसकी कुछ इतिहासकारों ने भ्रामक प्रस्तुति की। इस संबंध में अंग्रेजों के खुद के बनाए पेपर्स के अलावा कोई साक्ष्य नहीं है। जेल के कठोर माहौल में वे कुछ भी लिखवा सकते थे। उन्होंने दुष्प्रचार किया, जिससे सावरकर जनमानस के हीरो न बन सकें। इसके बावजूद सावरकर की लोकप्रियता इतनी व्यापक थी कि हर पार्टी उन्हें अपने साथ शामिल करने को आतुर थी। यदि मान लें कि उन्होंने माफी मांगी भी थी, तो भी इसके लिए उनके जबर्दस्त संघर्ष और सामाजिक कार्य दरकिनार कर उन्हें दोषी, मजाक का पात्र और राजनीतिक अछूत नहीं माना जा सकता, क्योंकि इन हालातों में जिसे भी रहना पड़े, कैसे भी बाहर आना ही चाहेगा। 


बाल गंगाधर तिलक और सरदार पटेल के अभियान और विश्व युद्ध से उपजे हालातों से अंग्रेजों को उन्हें रिहा कर बाद में सेलुलर जेल को भी बंद करना पड़ा। बाद में उन्होंने युवाओं को अंग्रेजों के विरुद्ध सैन्य प्रशिक्षण के लिए नासिक में मिलिटरी स्कूल चलाया और रास बिहारी बोस और सुभाष चंद्र बोस के बीच तालमेल बनाकर आईएनए की स्थापना में भूमिका निभाई। वे जातिवाद, छुआछूत तथा रूढ़िवादी परंपराओं के खिलाफ सतत संघर्षरत रहे। उनका दुर्भाग्य रहा कि अंग्रेजों ने उन्हें साजिशन बदनाम किया, तो भारतीय नेताओं ने उनकी लोकप्रियता और स्पष्टवादिता से बौखलाकर गांधी की हत्या में दोषी ठहराने का कुचक्र रचा। हालांकि कोर्ट में आरोप झूठा साबित हुआ और सुप्रीम कोर्ट से वे बरी हुए।

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