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यादों में प्रोफ़ेसर अली जावेद: प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन की बड़ी क्षति

Fri, 03 Sep 2021 08:59 AM IST
Vineet Tiwari विनीत तिवारी
Updated Fri, 03 Sep 2021 08:59 AM IST
सार

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद के नज़दीक एक गांव करारी में जन्मे प्रोफ़ेसर अली जावेद की स्नातक शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हुई और आगे डॉक्टरेट तक की पढ़ाई उन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से पूरी की। 

प्रोफ़ेसर अली जावेद भी 2012 से 2016 तक एफ्रो-एशियाई लेखक संगठन के अध्यक्ष रहे। उसके पहले सन 2007-2008 में वे नेशनल कौंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ़ उर्दू लैंग्वेज (एनसीपीयूएल) के निदेशक भी रहे। 

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Progressive writer and activist Ali javed passed away know his life and memories
प्रोफ़ेसर अली जावेद भी 2012 से 2016 तक एफ्रो-एशियाई लेखक संगठन के अध्यक्ष रहे। उसके पहले सन 2007-2008 में वे नेशनल कौंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ़ उर्दू लैंग्वेज (एनसीपीयूएल) के निदेशक भी र - फोटो : Facebook angira luba

विस्तार

प्रोफेसर अली जावेद (दिल्ली) नहीं रहे। वे लेखन के साथ ही साथ उस सांस्कृतिक आंदोलन की विरासत को भी आगे बढ़ाने के काम में लगातार लगे रहे जो प्रेमचंद, सज्जाद ज़हीर, फैज़ अहमद फैज़, कृशन चन्दर, अली सरदार जाफ़री, भीषम साहनी और हरिशंकर परसाई जैसे रौशन ख़याल लेखकों और विचारकों ने छोड़ी है। 

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प्रोफेसर अली जावेद के निधन पर प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष और तमिल भाषा के वरिष्ठ रचनाकार पुन्नीलन और महासचिव प्रोफेसर सुखदेव सिंह सिरसा के संयुक्त हस्ताक्षर से जारी बयान में कहा गया है-
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अपने नेतृत्वकारी साथी और प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष प्रोफ़ेसर अली जावेद के आकस्मिक निधन से समूचा संगठन स्तब्ध है और गहरे शोक में है। प्रोफ़ेसर अली जावेद के जाने से देश के प्रगतिशील और जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन को गहरा आघात लगा है।

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प्रोफेसर अली जावेद के निधन पर जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच, भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा), जन नाट्य मंच (जनम), दलित लेखक संघ, प्रतिरोध का सिनेमा आदि सांस्कृतिक संगठनों ने शोक व्यक्त किया है। प्रोफेसर जावेद हिंदी और उर्दू में तो सक्रिय थे ही किन्तु उन्होंने उस सपने को साकार करने की भी अपनी ओर से हरचंद कोशिश की जो देशों और भाषाओँ के पार जाकर साम्राज्यवादी ताक़तों और मूल्यों के खिलाफ लेखकों की एकता बनाए।


फैज़ अहमद फैज़ और सज्जाद ज़हीर के ज़माने में अफ्रीका और एशिया के तीसरी दुनिया के देशों के लेखकों के बीच एकता और संवाद कायम करने के लिए एफ्रो-एशियाई लेखक संघ का निर्माण किया गया था। फैज़ और बाद में भीषम जी ने भी इस मुहिम को नेतृत्व प्रदान किया था।
 

प्रोफ़ेसर अली जावेद भी 2012 से 2016 तक एफ्रो-एशियाई लेखक संगठन के अध्यक्ष रहे। उसके पहले सन 2007-2008 में वे नेशनल कौंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ़ उर्दू लैंग्वेज (एनसीपीयूएल) के निदेशक भी रहे। 

 

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद के नज़दीक एक गांव करारी में जन्मे प्रोफ़ेसर अली जावेद की स्नातक शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हुई और आगे डॉक्टरेट तक की पढ़ाई उन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से पूरी की। साहित्य के अलावा उनकी दिलचस्पी के केन्द्र में राजनीति भी थी और वे अपने छात्र-जीवन से ही वामपंथी विद्यार्थी संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन से जुड़ गए थे। पढ़ाई करते हुए उन्होंने अनेक छात्र आंदोलनों में शिरकत की। 

 

कोरोना के दौर में भी उन्होंने प्रगतिशील लेखक संगठन के देश भर में फैले लेखकों का उत्साहवर्धन किया और जैसे ही आने-जाने पर पाबन्दी हटी, वे जनवरी में किसान आंदोलन को अपना समर्थन देने पहुंच गए। उनके भीतर एक लेखक, एक आलोचक-समीक्षक, एक मार्क्सवादी नज़रिये से सोचने वाला और एक आंदोलनकारी एकसाथ मौजूद था।
 

उर्दू साहित्य के आलोचना क्षेत्र में उनकी पांच महत्त्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हैं। उनके मार्गदर्शन में दर्जनों शोधार्थियों ने शोध किए और लेखक संगठन की अपनी व्यस्तताओं के बावजूद उन्होंने सैकड़ों आलेख महत्त्वपूर्ण विषयों पर लिखे। 

 

कमाण्डर के नाम से मशहूर प्रगतिशील लेखक संघ के तत्कालीन महासचिव कमलाप्रसाद जी के न रहने पर 2012 में प्रलेस का राष्ट्रीय सम्मलेन प्रोफ़ेसर अली जावेद के नेतृत्व में आयोजित हुआ और वहां वे राष्ट्रीय महासचिव चुने गए थे।  वर्ष 2016 तक उन्होंने अपनी इस ज़िम्मेदारी का निर्वहन किया और 2016 से वे प्रलेस के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष की भूमिका में अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे थे। 

प्रोफ़ेसर अली जावेद को कुछ वर्ष पहले भी ब्रेन स्ट्रोक हुआ था जिससे वे अपनी जिजीविषा से उबर आए थे और पुनः सक्रिय तौर पर सांगठनिक गतिविधियों में शामिल हो रहे थे। अभी इसी अगस्त के दूसरे सप्ताह में उन्हें फिर ब्रेन हैमरेज हुआ और डॉक्टरों ने उन्हें वेंटीलेटर पर रख दिया। क़रीब  17-18 दिन तक जूझने के बाद 31 अगस्त और 1 सितंबर के बीच की रात 12 बजे वे मृत्यु के सामने हार गए। 

 

राष्ट्रीय समिति के इस बयान में प्रोफ़ेसर अली जावेद के परिवार के लिए, उनकी पत्नी, बेटियों, बेटों और परिजनों के लिए इस बड़े दुःख की घडी में संवेदनाएं और एकजुटता दर्शाई है और कहा है कि उतनी ही मुश्किल घड़ी यह अली जावेद जी के दोस्तों के लिए भी है जिनके साथ वे हमेशा बिंदास, ठहाका लगाते भी मिलते थे और गंभीर मसलों पर गंभीरता से चर्चा करते थे। 
 

शोक प्रस्ताव में कहा गया है कि प्रगतिशील लेखक संघ अपने इस उत्कट जिजीविषा वाले साहसी और विद्वान साथी के बिछड़ने से बहुत दुःखी है और उन्हें याद करते हुए संकल्प लेता है कि हम प्रगतिशील संस्कृति का निर्माण करेंगे जो मनुष्य को मनुष्य के करीब लाने में अहम् भूमिका निभाती है,और देश को भाषाओँ, धर्मों, सम्प्रदायों, जातियों, देशभक्ति और अनेक अन्य पहचानों में बाँटकर लोगों को आपस में लड़वाने के लिए की जा रहीं साज़िशों का आख़िरी विजय तक डटकर मुक़ाबला करते रहेंगे।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 

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