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निर्मल जल की धार और स्मृतियों में बहता पानी

Prayag Shuklaप्रयाग शुक्ल Updated Tue, 14 May 2019 05:53 PM IST
निर्मल जल का सौंदर्य बड़ी चीज़ है।
निर्मल जल का सौंदर्य बड़ी चीज़ है। - फोटो : अमर उजाला
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निर्मल जल का सौंदर्य बड़ी चीज़ है। जल की ज़रूरत हमें गले की प्यास बुझाने के लिए तो होती ही है, आंखों को तृप्त करने के लिए भी होती है। सागर का जल हम पीते नहीं हैं, पर कब हम उसके किनारे इसलिए नहीं गए कि उसका जल-दृश्य हमें ताजा कर देगा। उसकी उमड़ती, उठती लहरें हों, तट पर पछाड़ खातीं, फेन छोड़ती, लौट जातीं, फिर आती या मंथर गति वाली-सब मोहित करती है। हां, जल और आकाश ही हैं, जो सौंदर्य के अनुपम भंडार हैं।
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जरूरी नहीं कि आंखों को तृप्ति देने के लिए हमें एक बड़ी-जल राशि ही चाहिए। गर्मियों के दिनों में जब पेड़-पौधों को पानी से सिंचाई करने के बाद उनपर कोई जल भी छिड़क देता है, तो पत्तों पर बैठी वे जल-बूंदें मोती सरीखी ही तो लगती हैं। फसल की सिंचाई का पानी भी कितना मोहित करता है, और कितने ही सौंदर्य-चित्र बिंब उसमें से निकलते चले जाते हैं: त्रिलोचन जी की ये कविता पंक्तियां, उच्चारित करते ही क्यों हम एक शीतल सौंदर्य से भर उठते हैं, 

“दोनों मिलकर दो प्रानी/दे रहे खेत में पानी।”

हां, अपूर्व लगती हैं। जल से जुड़ी हुई छवियां—चिड़िया जब किसी जल-पात्र से अपने को भिगोकर फुर्र करते हुए उड़ती है। जब किसी जल-राशि पर झुकी हुई कोई डाल, हवा से लहरा-लहरा कर जल का स्पर्श करती है, या जब उसके ‘ठहरे’हुए रूप का प्रतिबिंब जल पर पड़ता है, या जब पानी पर चंद्रमा उतर आता है—हम कितना प्रफुल्लित हो उठते हैं। ‘सद्यस्नाता’ के गुण कवियों ने यों ही नहीं गाए हैं। 

कालिदास ने लिखा है: “क्षीरोदवेलेव सफेन पुंजा पर्याप्त चन्द्रेव शरतत्रियामा।/नवं नव क्षौम निवासिनी सा भूमो वभौ दर्पणमादधाना।।”

[पार्वती ने, एक तो गौरी, दूसरे नहाकर खौर कर आई, फिर धवल रेशमी वस्त्र पहने और फिर नया (किसी ने जिसमें अपका मुंह न देखा हो ऐसा) दर्पण हाथ में लिया, लगा कि क्षीर समुद्र में ज्वार आ गया है, फेन धवलतर हो गया है, जैसे शरद् की निखरती हुई पूनो में चंद्रमा समा नहीं पा रहा है।] और सुमित्रानंदन पंत की ‘नौका विहार’कविता की ये पंक्तियां भी देखिए :

“शांत, स्निग्ध, ज्योत्स्ना उज्ज्वल!/
अपलक अनंत, नीरव भूतल!/
सैकत शय्या पर ढुग्ध धवल, तन्वंगी गंगा ग्रीष्म विरल,/
लेटी है श्रांत, कलान्त, निश्चल!/
तापस बाला गंगा निर्मल, शशि मुख से दीपित मृदु करतल,/
लहरे उर पर कोमल कुंतल!”
 
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