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बिरजू महाराज का जाना: स्मृतियां साक्षी हैं, धरती स्थिर है, आवाज़ों का शोर थम गया है..!

Mon, 17 Jan 2022 02:54 PM IST
Sandip Naik संदीप नाईक
Updated Mon, 17 Jan 2022 02:54 PM IST
सार

देवास का मल्हार स्मृति मंदिर अनगिनत कलाकारों की प्रस्तुति का  साक्षी रहा है संगीत, वाद्य यंत्र, बैंड, नृत्य से लेकर तमाम कलाएं यहां आकर धन्य हुईं और यहां के दर्शकों और श्रोताओं को तृप्ति दी..! 

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pandit birju maharaj death legendary kathak dancer has passed away know about him
पंडित बिरजू महाराज: र हर बार उनकी ऊर्जा चकित करती थी। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

देवास का मल्हार स्मृति मन्दिर अनगिनत कलाकारों की प्रस्तुति का  साक्षी रहा है संगीत, वाद्य यंत्र, बैंड, नृत्य से लेकर तमाम कलाएं यहां आकर धन्य हुई और यहां के दर्शकों और श्रोताओं को तृप्ति दी।

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बहुत छोटे से मंच पर बिरजू महाराज को लगभग दो ढाई घण्टे अपने संगतकारों के संग थिरकते देखा है, शायद तीन बार से ज़्यादा और हर बार उनकी ऊर्जा चकित करती थी। 1970 से उन्हें देख रहा था देवास, इंदौर, भोपाल, मुम्बई, दिल्ली - वो आदमी थकता ही नहींं था और गाढ़ी लाली लगे होठों पर गज़ब की मुस्कान हमेंशा चिपकी रहती थी 
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हाल ही में रज़ा फाउंडेशन के कार्यक्रम की वीडियो क्लिप्स देख रहा था जहां वे बैठे बातें कर रहे थे कितने सहज और सौम्य लग रहे थे।

घुंघरू बंधे पांव, सांसों का आरोह-अवरोह, जमुना के तट पर कृष्ण कन्हैया राधा के संग मुरली बजावे, नए प्रयोग, नित नूतन नवाचार और अपने शिष्यों संग पितृ भाव वाले महाराज संसार का चक्कर लगा आये थे, कोई कोना छूटा हो शायद।
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कल देर रात से तबियत ठीक नही, छत पर घूम रहा था पर ठंड, धुंध से हालात और खराब हो गए, बेचैनी छाती में दर्द, सर्दी-खांसी और धुंध में बनता बिखरता अस्तित्व, देर रात तीन बजे कमरे में आया तो एक मित्र की पोस्ट देखकर जी धक्क से रह गया- समझ आया कि ये घबराहट क्यों है?
 

धरती स्थिर है, आवाज़ों का शोर थम गया है, सांसे रूक गई है - वह आदमी यहां से चला गया है जिसके होने से, जिसके घुंघरुओं की ताक़त से यह धरती घूमती थी, नृत्य करती थी और तबले के साथ जुगलबंदी कर मदमस्त होकर थिरकती थी।


सुनो, आवाज़ें आना बंद हो गई है, जो बूंदे नाचती थी, जो पक्षी चहकते थे, हवा जिस थिर पर थम जाती थी, मयूर उदास है, सूरज की किरणें कही छुप गई है और लग रहा जैसे यह थमना ही अब शाश्वत सत्य है और नृत्य का अब अस्तित्व नही रहेगा, केलुचरण महापात्रा के बाद बिरजू महाराज के बाद यह सिर्फ नृत्य की बल्कि समूची मानवता की क्षति है - यह चलाचली की बेला है, कोई बताए कि इतनी सुबह किसने गा दी भैरवी, किसने कत्थक किया कि वो विराट महामना सो गया अतृप्त सा, अभी तो उसे फिर यहाँ आना था। 

नमन हे शिखर पुरुष, तुमने ही पुरुषों को नृत्य विधा में पारंगत किया और यह मान्यता तोड़ी कि पुरुष इस विधा में काम नही कर सकते और यह सिद्ध किया कि नृत्य पर सबका समान अधिकार है। 



हार्दिक श्रद्धांजलि बिरजू महाराज


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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