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दूसरा पहलू: लोहा चाहिए या जंगल; कालाढूंगी में कैसे रुकी पेड़ों की कटाई?

Mon, 06 Apr 2026 07:13 AM IST
Pavan अमर उजाला
अमर उजाला Published by: Pavan Updated Mon, 06 Apr 2026 07:13 AM IST
सार

कुमाऊं कमिश्नर हेनरी रैमजे के हस्तक्षेप से पेड़ों की कटाई रुकी, तो कुमाऊं आयरन बॉक्स कंपनी को अपना काम समेटना पड़ गया। नैनीताल के कस्बे कालाढूंगी में दूसरी आयरन फाउंड्री की स्थापना की गई, जो 1861 में 'कुमाऊं आयरन वर्क्स कंपनी' का हिस्सा बन गई। फाउंड्रियों में ईंधन के रूप में ओक व रेलवे स्लीपर के लिए साल के पेड़ों की भारी कटाई होने लगी। हेनरी रैमजे ने सरकार को लिखा कि तराई भाबर के क्षेत्र में आयरन उद्योग होने से यहां के जंगल खत्म हो जाएंगे।

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Other side: Do you want iron or forests? How did the cutting of trees stop in Kaladhungi?
लोहा चाहिए या जंगल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नैनीताल जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर कालाढूंगी एक छोटा-सा कस्बा है। पहाड़ में पत्थर को ढूंगा कहा जाता है। कालाढूंगी क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में ‘काला पत्थर’ पाया जाता है, जो इस कस्बे की पहचान बना। इसी कारण इसका नाम ‘कालाढूंगी’ पड़ गया। कालाढूंगी केवल प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ औद्योगिक और पर्यावरणीय इतिहास के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्थान है। बहुत कम लोग जानते हैं कि देश की दूसरी आयरन फाउंड्री (लोहे की भट्टी)  की स्थापना भी कालाढूंगी क्षेत्र में ही हुई थी।
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1860 में कुमाऊं के दैचोरी क्षेत्र में देश की पहली, जबकि कालाढूंगी में दूसरी आयरन फाउंड्री स्थापित की गई। 1861 में यह फाउंड्री डेविस कंपनी में विलय होकर ‘कुमाऊं आयरन वर्क्स कंपनी’ का हिस्सा बन गई। इसके बाद कई स्थानों पर कुल आठ फाउंड्रियां स्थापित की गईं। यहां लौह अयस्क को पिघलाकर लोहा तैयार किया जाता था। यहां पाए जाने वाले काले पत्थर में लौह अयस्क की अधिकता थी, जिससे भी कच्चा लोहा बनाया जाता था।
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फाउंड्रियों में ईंधन के रूप में बांज (ओक) और रेलवे स्लीपर के लिए साल के पेड़ों की भारी कटाई होने लगी, जिससे पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ा। फाउंड्रियों को चलाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने नैनीताल जिले में दाबका नदी से लेकर भाखड़ा नदी तक करीब 35 किलोमीटर तक जंगल को काटने की अनुमति दी थी। तब दुनिया में पर्यावरण को लेकर कोई बात नहीं होती थी। उस समय पर्यावरण की चिंता की तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नर हेनरी रैमजे ने, जिन्होंने पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी। इसके चलते लौह अयस्क का उद्योग प्रभावित हुआ।
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अंततः 1876 में कुमाऊं आयरन बॉक्स कंपनी को अपना कार्य समेटना पड़ गया। इतिहासकार डॉ. अजय सिंह रावत के मुताबिक, देश में पहला वन कानून 1878 में लागू हुआ था, पर तत्कालीन कुमाऊं आयुक्त हेनरी रैमजे ने स्थानीय स्तर पर वन प्रबंधन की शुरुआत 1854 में ही कर दी थी। हेनरी रैमजे ने सरकार को लिखा था कि तराई भाबर के क्षेत्र में आयरन उद्योग होने से यहां के जंगल खत्म हो जाएंगे। पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। यहां तक लिख दिया था कि जो पेड़ कट गए हैं, उन्हें भी न हटाया जाए, क्योंकि इससे जैव विविधता को नुकसान होगा।


आज यह इलाका हेनरी रैमजे के कारण ही बच पाया है, जिसे कुछ वर्षों बाद जिम कॉर्बेट ने अपना कार्य क्षेत्र बनाया। अब कॉर्बेट और सीताबनी आने वाले पर्यटक इस ऐतिहासिक धरोहर तक पहुंच सकें, इसके लिए जिला पर्यटन विभाग ने एक प्रोजेक्ट बनाया है। वन विभाग यहां तक पहुंचने के लिए एप्रोच रोड और गेट बनाएगा। यह कार्बेट ट्रेल का हिस्सा है। - प्रेम प्रताप सिंह
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