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ऑपरेशन सिंदूर: हर रणनीतिक मोर्चे पर भारत की निर्णायक सफलता

Wed, 21 May 2025 07:14 PM IST
Raman Rawal रमण रावल
Updated Wed, 21 May 2025 07:14 PM IST
सार

operation sindoor: यह दुनिया जब से बनी है, तब से ही शक्ति ही प्रमुख तत्व रही है। वह बाहुबल की हो, धन की हो, सत्ता की हो, बुद्धि की हो, सैन्य संसाधनों की हो, संख्या बल की हो। जो जितना बलवान, वह उतना धनवान। बल और धन दोनों का युक्ति से उपयोग करने से अनुकूल नतीजे प्राप्त होते हैं।

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operation sindoor: India's decisive Victory on every strategic front
हर रणनीतिक मोर्चे पर भारत की निर्णायक सफलता - फोटो : PTI

विस्तार

इन दिनों भारत में सोशल मीडिया पर युद्ध समर्थक व विरोधियों के बीच जंग छिड़ी हुई है। मुद्दा यह है कि भारत ने पहलगाम के आतंकी हमले की प्रतिक्रिया स्वरूप पाकिस्तान के आतंकी अड्डों व चुनिंदा सैन्य ठिकानों पर जो धुंआधार हमले किए थे, उन्हें कुछ दिन और जारी रखना था। लाहौर, इस्लामाबाद, कराची, बहावलपुर आदि शहरों पर भी प्रबल हमले कर पाकिस्तान को बरबादी की खाई में धकेल देना था।

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दरअसल, इस तरह के बहुत सारे तर्कों के तीर,भावनाओं की मिसाइलें दागी जा रही हैं जिसे सरकार-मोदी-भाजपा समर्थक आर्थिक उपलब्धियों के मिसाइलरोधी ड्रोन से तहस-नहस कर रही है। अब जबकि भावनाओं का ज्वार थम गया है, तब यह जानना आवश्यक है कि क्या वास्तव में भारत पूर्ण यु्द्ध चाहता था? क्या उसने पाकिस्तान को पर्याप्त सबक दे दिया है? क्या विश्व समुदाय भारत की सैन्य शक्ति को जान चुका है और आतंकियों को दिये जवाब का नैतिक समर्थन करता है?
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यह दुनिया जब से बनी है, तब से ही शक्ति ही प्रमुख तत्व रही है। वह बाहुबल की हो, धन की हो, सत्ता की हो, बुद्धि की हो, सैन्य संसाधनों की हो, संख्या बल की हो। जो जितना बलवान, वह उतना धनवान। बल और धन दोनों का युक्ति से उपयोग करने से अनुकूल नतीजे प्राप्त होते हैं। युक्ति के लिए बुद्धि आवश्यक है। ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं, जब आमने-सामने की लड़ाई में संख्या बल अधिक होने के बाद भी कम सैन्य शक्ति वाले को विजय मिली। वह होता है तात्कालिक रणनीति से, युक्ति से, विवेक से। केवल बाहुबल से युद्ध लड़े व जीते जाते तो किसी भी देश की सेना में भर्ती होने के लिये अखाड़े या जिम्नेशिय का पहलवान होना ही जरूरी होता।

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अब ताजा भारत-पाकिस्तान युद्ध की बात करते हैं तो स्पष्ट कर दूं कि भारत की ओर से यह पाकिस्तान के साथ युद्ध तो था ही नहीं। यह पाक समर्थित आतंकवादियों के साथ लड़ाई थी। इसीलिए उनके ठिकानों को निशाना बनाया गया और जब पाकिस्तान ने उन्हें समर्थन देने के लिए अपनी सेना को सन्नद्ध किया, मोर्चा संभाला, एयर बेस तैयार किए, सेना को रवानगी डलवाई तो उसे सचेत करने के लिए भारत ने प्रतीकात्मक हमले किए। उनके हवाई मार्ग अवरुद्ध कर दिए और ये पर्याप्त कारगर रहे।


इधर, पांच दिन में ही पाकिस्तानी सरकार व सेना की समझ में आ गया कि यदि इस बार इसने पूर्णकालिक युद्ध की शक्ल ले ली तो कितान कबाड़ा होगा,अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। इसलिए, वह जिन-जिन आकाओं के सामने गिड़गिड़ा सकता था, गिड़गिड़ाया। मिन्नतें कीं। झोली फैलाई। भारत से भी बैठकर बात करने की पहल की, तब जाकर अर्ध विराम पर भारत सहमत हुआ। वह भी इस चेतावनी के साथ कि ऑपरेशन सिंदूर जारी रहेगा। पाकिस्तान के साथ चर्चा होगी तो आतंकवाद और पीओके पर। साथ ही आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई होने तक सिंधु जल संधि स्थगित रहेगी।
 

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इतनी बड़ी कूटनीतिक जीत प्रत्यक्ष युद्ध में मिलने वाली प्रचंड विजयश्री से भी कई गुना बड़ी है - फोटो : Amar Ujala

इतनी बड़ी कूटनीतिक जीत प्रत्यक्ष युद्ध में मिलने वाली प्रचंड विजयश्री से भी कई गुना बड़ी है। उसकी वजह है विश्व समुदाय का हमारे साथ खड़े रहना। अनेक देशों ने आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में अपनी प्रतिबद्धता दर्शाई। पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर हमलों को उचित ठहराया। दुनिया ने देख लिया कि भारत ने इस बार ज्यादातर स्वदेशी हथियारों,तकनीकी संसाधनों का उपयोग कर किस तरह से हमले किए व पाकिस्तान के हमलों को हवा में ही हवा-हवाई कर दिया।

विश्व हतप्रभ रह गया। वैश्विक शक्तियां भी सोच नहीं पा रही थी कि हम अस्त्र-शस्त्र,तकनीक व उनके सफल उपयोग में इतने दक्ष हो चुके होंगे। मिलाइलें हमारी धरती पर गिरने से पहले नष्ट करना। सैकड़ों ड्रोन को हवा में खाक कर देना। अपने किसी फाइटर जेट या मिसाइल का अचूक रहना। यह दुनिया में भारत नाम की एक भव्य और दिव्य शक्ति के उदय का शंखनाद है। इसीलिये हमले रोकने का श्रेय लूटने का अंतरराष्ट्रीय खेल भी हुआ।

6 मई से अभी तक हजारों-लाखों वीडियो,लेख,संदेश प्रसारित होते रहे, जिसमें युद्ध जारी रखने और पाकिस्तान को नेस्तनाबूद कर देने जैसी बातें कही गईं। भावनात्मक रूप से प्रत्येक भारतीय इस पक्ष में रहेगा, लेकिन हमें युद्ध से होने वाले गंभीर,दूरगामी दुष्परिणामों, प्रभावों की अनदेखी नहीं करनी चाहिये। एक हफ्ते का पूर्ण युद्ध भी किसी भी राष्ट्र की अर्थ व्यवस्था को चौपट करने का सामर्थ्य रखता है।

मौजूदा दौर में रूस व इजराइल इसके बड़े प्रमाण हैं। भले ही वे अपने कदम पीछे लेने को तैयार नहीं, लेकिन इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है, यह वे ही जानते हैं। यह संदेश काफी है कि वे अब चाहकर भी युद्ध बंद नहीं कर सकते, क्योंकि व्यक्ति हो या राष्ट्र, आत्म सम्मान के नाम पर तो कभी अहंकार के चलते हम घोर गलत कदम भी पीछे नहीं लेते। बरबाद तो फलस्तीन व यूक्रेन भी हो रहे हैं, लेकिन हार कौन मान रहा है?


प्रत्येक भारतीय को यह अच्छी तरह से याद रखना चाहिये कि हम विश्व की पांचवीं बड़ी अर्थ व्यवस्था बन चुके हैं और कभी-भी तीसरी शक्ति बन सकते हैं। अभी अमेरिका 30.507 लाख करोड़ डॉलर, चीन 19.231 लाख करोड़ डॉलर,जापान 4.91 लाख करोड़ डॉलर,जर्मनी 4.744 लाख करोड़ डॉलर और भारत 4.187 लाख करोड़ डॉलर अर्थ व्यवस्था वाले देश हैं।

भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.4 प्रतिशत है, जो रिजर्व बैंक की अनुमानित दर 6.6 से थोड़ी कम है। हमारा लक्ष्य 2025 में 5 लाख करोड़ डॉलर वाली अर्थ व्यवस्था बनने का है। युद्ध हमारी गति को तेजी से कम कर देता। यह 2014 से भाजपा सरकार द्वारा अर्थ व्यवस्था को सुदृढ़ किये जा रहे प्रयासों पर पानी फेर सकता था, जिससे उबरने में फिर कितना समय लगता, निश्चित नहीं कहा जा सकता। 2015 में भारत 2.1 लाख करोड़ डॉलर की अर्थ व्यवस्था वाला देश था। दस वर्ष में इसमें सौ प्रतिशत वृद्धि करने वाला वह इकलौता देश है। इसलिये केवल भावनाओं में बहकर युद्ध के उन्माद में कूदना समझदारी,देश भक्ति,सैन्य मजबूती नहीं मानी जा सकती थी।
 

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तस्वीर में पाकिस्तान में तबाही का मंजर - फोटो : PTI

युद्ध किस तरह से खर्चीला और व्यक्ति से राष्ट्र तक की कमर तोड़ने वाल होता, जरा समझिये। समूचा सैन्य बल सीमा पर ले जाने के लिये परिवहन के साधनों में लगने वाला अतिरिक्त ईंधन। जल,थल,वायु सेना के लाखों जवानों का प्रतिदिन का खर्च। युद्धक टैंक,मिसाइल,फाइटर जेट विमान,ड्रोन,युद्धक हेलिकॉप्टर,सैन्य ट्रक्स,जीप व अन्य वाहन,चिकित्सा खर्च। समुद्री सीमा को जल पोतों से पाट देना होता है। अभी करीब एक हफ्ते के लिए 650 यात्री विमान सेवा स्थगित की गई,उसका करोड़ों का नुकसान, जो लंबा युद्ध चलने पर अरबों रुपये होता। फिर युद्ध होने से महंगाई बढ़ती है, जो मुद्रा स्फीति बढ़ाती है, जिससे अर्थ व्यवस्था लड़खडाती,जीडीपी वृद्धि पर कम हो जाती। युद्ध की आशंका में व युद्ध होने पर लोगों में खाद्यान्न के संचय की प्रवृत्ति बढ़ती है, जिससे बाजार में राशन की कृत्रिम कमी भी पैदा की जाती है। फिर कालाबाजारी बढ़ती है। तब सरकार इसे रोके या युद्ध पर ध्यान दे?

युद्ध की ऐसी अनेक सच्चाई हैं, जिन पर सरकार,सेना की ओर से जन साधारण को तो बताया भी नहीं जाता,उसके खर्च का हम अंदाज भी नहीं लगा सकते। फिर,इससे भी बड़ा जो नुकसान होता, वह यह कि कुछ समय से अमेरिका-चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध के कारण चीन में काम कर रही अनेक अमेरिकी व अन्य देशों की कंपनियां तेजी से चीन छोड़ रही हैं, जिनमें से अनेक इकाइयां भारत का रूख कर रही हैं। इस तरह से हमारे यहां विदेशी निवेश बढ़ रहा है, विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ रहा है। 1951-52 में जो विदेशी मुद्रा भंडार 1.82 अरब डॉलर था, वह फरवरी 2023 में 561 अरब डॉलर हो चुका है। युद्ध होने पर इसमें तेजी से कमी होती है, क्योंकि आकस्मिक सैन्य सामग्री खरीदने के लिये ताबड़तोड़ खर्च के फैसले करने पड़ते हैं।

कुल मिलाकर भारत ताजा घटनाक्रम में बेहद फायदे में रहा। पाकिस्तान को अपनी ताकत दिखा दी। आतंकवादियों को उनकी औकात बता दी कि वे अब अपने आका की गोद में छुपें या पीछे, उन्हें ढूंढकर ठोक सकते हैं। विश्व समुदाय को यह जता दिया कि नये युग का भारत अपनी लड़ाई लड़ने में सक्षम है। सुपर पॉवर का दंभ भरने वाले अमेरिका व छोटे मियां चीन को समझा दिया कि भारत सैन्य संसाधन में आत्म निर्भर है।  

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।  

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