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कश्मीर शांत हुआ नहीं और 'कैब' पर उत्तर पूर्व भड़क गया

Sun, 15 Dec 2019 11:05 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Sun, 15 Dec 2019 11:05 AM IST
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North East violent protests against the Citizenship Amendment Bill
नागरिकता संशोधन कानून 2019 में पड़ोसी देशों, बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 से पहले वैध या अवैध तरीके से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी तथा ईसाई अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता आसान कर दी गई है - फोटो : PTI

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के शुरुआती दौर में ही गृहमंत्री अमित शाह ने भाजपा की विचारधारा से जुड़े तीन बेहद कठिन लक्ष्यों को हासिल कर अपनी चाणक्य नीति और दृढ़ निश्चय का लोहा तो मनवा ही लिया है। मौजूदा सरकार के सत्ता में आते ही सबसे पहले तीन तलाक को गैर कानूनी बनाया गया। उसके बाद जम्मू-कश्मीर की धारा 370 एवं 35 ए के प्रावधानों को दफन करने के साथ ही विशेषाधिकार प्राप्त इस राज्य को खण्डित कर उसका पूर्ण राज्य का दर्जा भी छीन लिया गया और अब 1955 के नागरिकता कानून में संशोधन कर तीन पड़ोसी इस्लामिक देशों के धार्मिक आधार पर उत्पीड़ित अवैध प्रवासी गैर मुस्लिमों को भारत में नागरिकता आसान बना कर अमित शाह ने जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी एवं आरएसएस के आदि पुरुषों के सपनों को तो साकार कर दिया लेकिन साथ ही इन फैसलों से समाज में जो अविश्वास का माहौल पैदा हुआ है उसने प्रधानमंत्री के ‘सबका साथ सबका विश्वास’ के संकल्प पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।

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भाजपा के चाणक्य अमित शाह ने सबसे पहले तीन तलाक के मामले में पंगा लिया, फिर कश्मीरियों को छेड़ा और अब उत्तर पूर्व को भड़का दिया। आगे भी वह चैन से बैठते नजर नहीं आ रहे हैं, क्योंकि उसे अभी समान नागरिक संहिता पर भी काम करना है।
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गैरों पे करम अपनों पे सितम 
नागरिकता संशोधन कानून 2019 में पड़ोसी देशों, बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 से पहले वैध या अवैध तरीके से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी तथा ईसाई अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता आसान कर दी गई है, चाहे उनके पास जरूरी दस्तावेज हों या नहीं। पीड़ित मानवता के प्रति नेकदिली, शरणागत को आश्रय देना और मानवीय संवेदनाओं के प्रति संवेदनशील रहना भारत की संस्कृति का हिस्सा रहा है। लेकिन ऐसी भी क्या नेकी जिससे पराये तो अपने और अपने ही पराये हो जाएं! धारा 370 हटाने के बाद जम्मू-कश्मीर में हालात अभी सामान्य हुए भी नहीं थे कि नागरिकता संशोधन कानून 2019 ने पूर्वोत्तर भारत में खलबली मचा दी।
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असम और त्रिपुरा में लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। सरकार ने इनर लाइन और अनुसूची-6 के क्षेत्रों को नए कानून के दायरे से बाहर करने के साथ ही नागालैण्ड की राजधानी दीमापुर और मणिपुर राज्य को भी इनर लाइन परमिट के दायरे में लाकर सामरिक दृष्टि से अति संवेदनशील इन राज्यों में फिलहाल स्थिति तो सम्भाल ली है, मगर वहां अब भी सबकुछ ठीकठाक नहीं है। इन राज्यों में धार्मिक नहीं बल्कि जातीय टकराव होता है।

वे बाहरी हिंदुओं को भी अपने अस्तित्व के लिये खतरा मानते हैं और ये हिंदू बंगाली हैं, जो कि ज्यादातर बांग्लादेश से आए हुए हैं। इस कानून सहित सरकार के फैसलों से तो मुस्लिम वर्ग पहले से ही रुष्ट था अब कानून के अवैध प्रवासी हिन्दुओं पर सरकार की दरियादिली से उत्तरपूर्व में असन्तोष की नई आग भड़क गई है।

North East violent protests against the Citizenship Amendment Bill
भारत में आने वाले घुसपैठिये अवैध विदेशी नागरिकों में सर्वाधिक संख्या बांग्लादेशियों की है। - फोटो : PTI

अहमदिया और रोहिंग्या को उत्पीड़ित नहीं माना
भारत में आने वाले घुसपैठिये अवैध विदेशी नागरिकों में सर्वाधिक संख्या बांग्लादेशियों की है। बांग्लादेश के अलावा पाकिस्तान और अफगानिस्तान से भी उत्पीड़ित लोग अवैध रूप से भारत में रह रहे हैं। हालांकि म्यमार में रोहिंग्या और पाकिस्तान से अहमदिया मुसलमान धार्मिक उत्पीड़न का शिकार रहे हैं।

अहमदिया को तो पाकिस्तान में मुसलमान ही नहीं माना जाता है, क्योंकि वे मोहम्मद साहब के बाद भी गुलाम अहमद को पैगम्बर के तौर पर मानते रहे हैं। जबकि शिया और सुन्नी मोहम्मद साहब को ही धरती पर अंतिम पैगम्बर मानते हैं। उत्पीड़ित अहमदिया भारत के बजाय श्रीलंका में ही ज्यादातर शरण लेते रहे हैं। लेकिन अहमदिया को नए नागरिकता कानून से बाहर रख कर सरकार ने विपक्षियों द्वारा धार्मिक भेदभाव करने और छिपे हुए हिन्दू राष्ट्र के ऐजेण्डे पर काम करने का आरोप लगाने का मौका दे दिया।

यद्यपि पड़ोसी देश म्यमार में रोहिंग्या मुसलमानों के साथ भी भेदभाव और उत्पीड़न होता रहा है, जिस कारण वे वहां से भाग कर भारत में मुम्बई और जम्मू-कश्मीर तक पहुंच गए। रोहिंग्या को शरण देना तो रहा दूर सरकार को उनके नाम से ही एलर्जी है। सिंहली बहुल पड़ोसी देश श्रीलंका में भी वहां के तमिलों से भेदभाव होता रहा है। इसी भेदभाव और जातीय उत्पीड़न का नतीजा पृथकतवादी संगठन लिट्टे का जन्म और गृहयुद्ध था। श्रीलंका से तमिल बड़ी संख्या में भारत आते रहे हैं। उनके साथ न केवल तमिलनाड़ू के लोगों की बल्कि भारत सरकार की भी सहानुभूति रही है। एक समय ऐसा भी रहा जबकि भारत का परोक्ष समर्थन लिट्टे के साथ रहा है। लेकिन नए कानून में श्रीलंका के अवैध प्रवासियों का भी उल्लेख नहीं है। इसे विपक्ष संविधान के अनुच्छे 14, 15 एवं 25 का उल्लंघन कर धार्मिक आधार पर भेदभाव मान रहा है। 

बांग्लादेश है अवैध प्रवासियों का सबसे बड़ा श्रोत
यद्यपि बांग्लादेश से आने वाले अवैध प्रवासियों की प्रमाणिक संख्या सामने नहीं आई है फिर भी अनुमान है कि प्रति वर्ष लाखों की संख्या में बांग्लादेशी भारत में घुस रहे हैं। संसद में 14 जुलाई 2004 को तत्कालीन गृहराज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल में बताया था कि भारत में 20 लाख बाग्लादेशी अवैध ढंग से रह रहे हैं और इनकी सर्वाधिक संख्या पश्चिम बंगाल में है। बाद में एनडीए सरकार में गृह राज्य मंत्री रहे किरन रिजिजू ने बाग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या 2.4 करोड़ तक बता डाली।

इनकी सर्वधिक संख्या असम में बताई गई थी। वर्ष 2001 की जनगणना में इनकी संख्या 30.84 लाख के करीब बताई गई। लेकिन इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट के समीर गुहा राॅय के अनुसार बांग्लादेशियों के बारे में आंकड़े बढ़ा-चढ़ा कर पेश किये जाते रहे हैं। जबकि 1981 से 1991 के बीच प्रति वर्ष लगभग 91 हजार बांग्लादेशी भारत में अवैध ढंग से प्रवेश करते रहे हैं। इनमें मुसलमान भी थे तो हिन्दू भी। बांग्लादेश में अब भी लगभग डेढ करोड़ याने कि 9.5 प्रतिशत आबादी हिन्दुओं की है। पूर्वोत्तर भारत के लोगों की चिन्ता है कि अगर बाग्लादेश के हिंदुओ को इसी तरह आकर्षित किया जाता रहा और उन्हें यहां नागरिकता दी जाती रही तो मूल निवासी अल्पसंख्यक हो जायेंगे। अगर वहां उत्पीड़न न भी हो रहा हो तो भी बेहतर जिन्दगी के लिये और नयेपन की चाह लेकर भी बांग्लादेश से पलायन हो सकता है।

 

North East violent protests against the Citizenship Amendment Bill
नागरिकता कानून के विरोध में हो रहे हिंसक प्रदर्शन ने अस्सी के दशक के असम आन्दोलन की याद ताजा कर दी है। - फोटो : अमर उजाला

आदिवासी घुसपैठियों के बारे में कानून खामोश
भारत और बांग्लादेश के बीच 4096 किमी लंबी साझी सीमा है और बांग्लादेश के 36 जिले असम, मेघालय, त्रिपुरा, मीजोरम, पश्चिम बंगाल और बिहार राज्यों से लगे हुए हैं। बांग्लादेशी घुसपैठिये आसानी से सीमा पार कर इन राज्यों में प्रवेश करते हैं। भौगोलिक संलग्नता के कारण बोली-भाषा आदि में भी समानता का लाभ उठा कर वे आसानी से भारतीय क्षेत्र में लोगों से घुलमिल जाते हैं।

बांग्लादेश में 98 प्रतिशत बंगाली और लगभग 2 प्रतिशत बिहारी तथा जनजातीय लोग रहते हैं। इन आदिवासी समूहों में चकमा, कुकी, और मरमा आदि जातियां शामिल हैं जो कि पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करती हैं। चकमा बांग्लादेश के चट्टग्राम पहाड़ी क्षेत्र का सबसे बड़ा जजातीय समुदाय है। यह चकमा भाषा बोलते हैं जो एक हिन्द-आर्य भाषी है। वे हिन्दू एवं बौद्ध धर्मों के अनुयायी होते हैं। सन् 60 के दशक में कर्नाफुली नदी पर काप्ताइ बांध बनने से गारो और हाजोंग जनजाति के लोगों की जमीन का बड़ा हिस्सा पानी में डूब गया था। उसके बाद वे मीजोरम में लुसाई पहाड़ी पार कर अरुणाचल प्रदेश तक पहुंच गये। बाग्लादेश के मेमनसिंह क्षेत्र में गारो जाति के लोग बहुतायत में रहते हैं। जबकि भारत में वे मेघालय राज्य के गारो पर्वत क्षेत्र में निवास करते हैं। गारो भारत में असम के कामरूप, गोपालपाड़ा और कार्बी एन्गलौंग में भी रहते है। 

अनुसूची 6 के राज्यों को छूट का आंशिक लाभ
संविधान के अनुच्छेद 244 (2) और 275 (1) के तहत अनुसूची 6 के जनजातीय क्षेत्रों के लिये विशिष्ट स्वायत्त प्रशासन का प्रावधान है। इस अनुसूची के असम, मेघालय, त्रिपुरा और मीजोरम में स्वायत्तशसी जिला काउंसिलें गठित की गयी हैं। नागरिकता संशोधन कानून के तहत इन स्वायत्तशासी जिला परिषदों को तो बाहर कर दिया गया मगर जो क्षेत्र इन परिषदों के ही बाहर हैं, वे इस कानून के दायरे में आ गये हैं। उदाहरणार्थ असम में केवल कार्बी एन्गलौंग और दिमा हसाओ दो जनजातीय जिलों में आटोनाॅमस या स्वायत्तशासी जिला परिषदें हैं। शेष असम पर यह कानून लागू होता है। असम में साम्प्रदायिक नहीं बल्कि भाषायी और जातीय टकराव रहा है जिसके केंद्र में बंगाली रहे हैं, चाहे वे हिंदू हो या मुसलमान। उन्हें डर है कि बंगाली हिन्दुओं को नागरिकता देने से उनके हितों और संसाधनों पर इन बाहरी लोगों का बोझ बढ़ जायेगा और त्रिपुरा की तरह जनसांख्यकी बदल जायेगी।

इसलिये असम इस समय इतना उबल रहा है। नागरिकता कानून के विरोध में हो रहे हिंसक प्रदर्शन ने अस्सी के दशक के असम आंदोलन की याद ताजा कर दी है। इस भीषण आंदोलन के फलस्वरूप सन् 1985 में हुये असम समझौते में 1971 के बाद असम में बसे लोगों को बाहर करने पर सहमति बनी थी, लेकिन अब वह डेड लाइन 1971 के बजाय 2014 तय कर सरकार ने घुसपैठियों को 43 साल का अतिरिक्त समय दे दिया जो कि असम समझौते की भावना के खिलाफ है। त्रिपुरा में केवल एक स्वायत्तशासी जिला परिषद है, जिसका क्षेत्रफल 7,132 वर्ग किमी है। इस क्षेत्र में 8,53,920 (2011 की जनगणना) जनजातीय आबादी है जो कि त्रिपुरा की आबादी का मात्र 30.95 प्रतिशत है। जाहिर है कि त्रिपुरा की लगभग 69 प्रतिशत आबादी नागरिकता कानून से प्रभावित होगी। वैसे भी वहां बांग्लादेश के गारो और चकमा जैसी जनजातियों के लोग आकर बसते रहे हैं।

इनर लाइन में छूट जनजातियों के लिए लूट
नागरिकता संशोधन कानून में इनर लाइन वाले राज्यों को भी बाहर रखा गया है। दरअसल अंग्रेजों के शासन काल में सुरक्षा उपायों और स्थानीय जातीय समूहों के संरक्षण के लिए वर्ष 1873 के बंगाल ईस्टन फ्रंटियर रेग्यूलेशन की धारा-2 में इनर लाइन परमिट का प्रावधान किया गया था।

इसमें पहले अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड और मीजोरम शामिल थे और अब भारत सरकार ने सम्पूर्ण मणिपुर राज्य और नागालैण्ड की राजधानी दीमापुर को भी इनर लाइन में शामिल कर दिया है। वैसे इनर लाइन परमिट की जरूरत उत्तराखण्ड, हिमाचल और लद्दाख जैसे सभी सीमावर्ती राज्यों में अन्तर्राष्ट्रीय सीमा के 10 किमी के दायरे में जाने के लिये भी होती है। मेइतेइ या मीतेइ मणिपुर राज्य का बहुसंख्यक समुदाय है जिसका हर क्षेत्र में बर्चस्व है और वे यहां काफी पहले से इनर लाइन लागू करने की मांग करते रहे हैं। वर्ष 2015 में तो इस मांग को लेकर चले हिंसक आन्दोलन में एक सांसद और राज्य के 6 मंत्रियों के घर तक जला दिया गये थे। मणिपुर में उरखुल, सेनापति, तामेंगलौंग और चन्देल जिलों में जनजातीय आबादी निवास करती है। कश्मीर की तरह बेहद संवेदनशील क्षेत्र होते हुये भी वहां अब तक इनर लाइन परमिट व्यवस्था जनजातियों की जमीनें और उनकी अलग संस्कृति पहचान बचाने के लिये लागू नहीं की गयी थी। स्वयं 2015 से पूर्व भाजपा भी मणिपुर में इनर लाइन परमिट के विरुद्ध थी। 

अगला लक्ष्य समान नागरिक संहिता?
अमित शाह शाह जिस दृढ़ता और तेजी से विरोध की परवाह न करते हुए भाजपा की मूल विचारधारा से जुड़े लक्ष्यों को हासिल करने में जुटे हुए हैं उसे देखते हुए अब समान आचार संहिता का लक्ष्य भी करीब लग रहा है। देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून का लक्ष्य संविधान निर्माताओं ने भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधताओं को ध्यान में रखते हुए बाध्यकारी बनाने के बजाय राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के साथ अनुच्छेद 44 में रख कर  उसे राज्य की मर्जी पर छोड़ दिया था। फिलहाल गोवा अकेला राज्य है जहां समान नागरिक संहिता लागू हैं। पहले जनसंघ और फिर भारतीय जनता पार्टी के मुख्य लक्ष्यों में से यह लक्ष्य भी शामिल रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली खण्डपीठ ने अदालत के ‘प्रोत्साहन’ के बाद भी अनुच्छेद 44 के लक्ष्य को हासिल न कर पाने पर अफसोस तक जताया था। इसलिए अमित शाह के लिये इस लक्ष्य को पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की मंशा और संविधान के नीति निर्देशक तत्व आधार का काम करेंगे। देश में फिलहाल मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय का पर्सनल लॉ है, जबकि हिन्दू सिविल लॉ के तहत हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं। समान नागरिक संहिता में शादी, तलाक और जमीन-जायदाद के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होगा। यद्यपि समान नागरिक संहिता का विरोध करने वालों का कहना है कि ये सभी धर्मों पर हिन्दू कानून को लागू करने जैसा है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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