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नेपाल को एक बार फिर नए नायक का इंतजार है...

Sun, 24 Jan 2021 09:38 PM IST
Atul sinha अतुल सिन्हा
Updated Sun, 24 Jan 2021 09:38 PM IST
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Nepal PM KP Sharma Oli expelled from ruling Communist Party and membership revoked
नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली - फोटो : नेपाल प्रधानमंत्री सचिवालय

पिछले एक साल से लगातार अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को एक तानाशाह की तरह अहमियत देते रहे नेपाल के कार्यवाहक प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली को आखिरकार नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके संकेत शुक्रवार को ही मिल गए थे, जब एनसीपी के अध्यक्ष पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने ओली के खिलाफ एक जबरदस्त रैली की थी और संसद भंग करने के ओली के एकतरफा फैसले को संविधान विरोधी करार देते हुए ओली को लोकतंत्र के खिलाफ काम करने वाला करार दिया था।

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पार्टी के भीतर भी अक्सर प्रचंड और ज्यादातर पार्टी नेता ओली की मनमानियों के खिलाफ आवाज़ उठाते रहे थे, लेकिन तमाम मर्यादाओं को ताक पर रखकर ओली ने 20 दिसंबर को राष्ट्रपति भंडारी के साथ मिलकर संसद भंग करवाई और मई में दोबारा चुनाव कराने का एलान करवाकर खुद कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहे। 
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शायद भीतर ही भीतर ओली ये चाहते भी थे कि पार्टी उन्हें निकाल दे और वो एक बार फिर अपनी पार्टी यूएमएल को अस्तित्व में ले आएं। कुछ महीने पहले जब उनकी पार्टी के ज्यादातर सदस्यों ने उनके मनमाने फैसलों पर आपत्तियां उठानी शुरू कीं और पार्टी के अध्यक्ष पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ से उनकी तनातनी बहुत ज्यादा बढ़ गई तभी ये कयास लगाए जाने लगे थे कि ओली पार्टी तोड़ना चाहते हैं और फिर से अपनी अलग पार्टी बनाना चाहते हैं।
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ऐसा उन्होंने कई बार खुलकर अपने समर्थकों को कहा भी था और ये खबर भी आई थी कि नेपाल निर्वाचन आयोग में उन्होंने नई पार्टी रजिस्टर भी करवा ली है, लेकिन सुलह की तमाम कोशिशों की वजह से ये मामला टलता गया।

तीन साल पहले हुए चुनाव के दौरान ओली की यूएमएल और प्रचंड की नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था, लेकिन दोनों ने मिलकर दो तिहाई बहुमत वाली सरकार बनाई और बाद में दोनों पार्टियों का विलय कर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) बना ली।

नेपाल में कम्युनिस्टों के इस एकीकरण को पूरी दुनिया के कम्युनिस्टों ने बहुत उम्मीद की नज़र से देखा था और एक मिसाल बताया था। इसी के आधार पर ये दावा किया जाने लगा था कि भारत समेत ज्यादातर मुल्कों में दक्षिणपंथी उभार के बावजूद नेपाल ने ये साबित किया है कि कम्युनिस्टों में अभी दम है और आज भी इनकी ताकत को कम करके नहीं आंका जा सकता।

लेकिन सत्ता संभालने के कुछ ही समय बाद से प्रधानमंत्री ओली की महात्वाकांक्षाएं हिलोरें मारने लगीं। दोनों पार्टियों के एकीकरण के बाद सत्ता की जिम्मेदारी ओली को सौंपने के वक्त ये तय हुआ था कि आधे कार्यकाल के लिए ओली प्रधानमंत्री रहेंगे और फिर आधे कार्यकाल के लिए प्रचंड को पीएम की कुर्सी सौंप देंगे।

लेकिन दो साल पूरे होते-होते और अपना आधा कार्यकाल समाप्त होते-होते ओली का कुर्सी प्रेम इस कदर बढ़ा कि उन्होंने प्रचंड के खिलाफ मुहिम छेड़ दी। पार्टी के कुछ नेताओं को कुर्सी का लालच दे देकर प्रचंड के खिलाफ भड़काते रहे और तमाम मनमाने फैसले लेते रहे।

उन पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे और पार्टी ने उन्हें ये भी कहा कि वो तमाम फैसले लेने से पहले कम से कम पार्टी को भरोसे में लें, लेकिन उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया। पार्टी ने उन्हें अध्यक्ष का पद संभालने और यहां तक कि पार्टी को स्वतंत्र रूप से चलाने को कहा, लेकिन पीएम पद के आगे उन्हें कुछ भी पसंद नहीं था। वो पार्टी के सह अध्यक्ष भी रहना चाहते थे और पीएम भी। जाहिर है उनकी महत्वाकांक्षाओं ने नेपाल के कम्युनिस्ट आंदोलन को तोड़ने का काम किया।

नेपाल का नया नक्शा जारी करके लिपुलेख दर्रे, कालापानी को अपना हिस्सा बताने के बाद भारत के साथ तनातनी और चीन के हाथों खेलने के आरोपों के बीच ओली की मनमानी चलती रही। प्रचंड ने कई बार अपमान झेला, पार्टी के भीतर लड़ते रहे, न चाहते हुए भी ओली के पीएम निवास जाकर उन्हें मनाते रहे, सुलह का रास्ता तलाशते रहे, लेकिन ओली जिद पर अड़े रहे।

कभी कहते कि वो कुर्सी छोड़ देंगे, कभी कहते कि कोरोना के वक्त अभी कुर्सी छोड़ने से जनता में खराब संदेश जाएगा, कभी कहते दिसंबर में पार्टी अधिवेशन में कुर्सी छोड़ देंगे। पार्टी की स्थाई समिति की बैठकों का बहिष्कार करते रहे, बहाने बनाते रहे, चीन के प्रतिनिधिमंडल से लगातार गुपचुप बातें करते रहे, सलाह मशवरे करते रहे और राष्ट्रपति बिद्यादेवी भंडारी को भी अपने तरीके से चलाते रहे। आखिरकार 20 दिसंबर को संसद भंग करवा कर ओली ने पार्टी के लिए गंभीर संकट खड़ा कर दिया।

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर कभी ऐसा घमासान नहीं हुआ था। जिस पार्टी ने नेपाल को राजशाही से मुक्त कराया और लोकतंत्र की स्थापना करवाई, उसे जनता के सवालों का जवाब देना मुश्किल हो गया।

ओली ने राजशाही समर्थक आंदोलन को हवा दी, नेपाल के हिन्दू राष्ट्र के स्वरूप को बरकरार रखने और भारत के साथ किसी न किसी रूप में टकराव पैदा करने की लगातार कोशिशें कीं – चाहे वह नए नक्शे को लेकर या फिर असली राम जन्मभूमि को नेपाल में होने का दावा करके।

जाहिर है नेपाल में कम्युनिस्टों को अपने इतने लंबे संघर्ष और जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता की चिंता है। उन्हें ओली जैसा तानाशाह नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भरोसा करने वाला एक नेतृत्व चाहिए। चुनाव में जनता ने जिस उम्मीद के साथ कम्युनिस्टों को सत्ता सौंपी, वह उम्मीद बरकरार रखने की जद्दोजहद में लगी पार्टी के लिए यूएमएल के साथ मिलना एक सिरदर्द साबित हुआ।

आखिरकार पार्टी ने ओली को पार्टी से बाहर करके ये संदेश देने की कोशिश की कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रक्रिया पर भरोसा करती है और उसे देश की चिंता है, न कि किसी की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की।

अब सबकी नज़र नेपाल के आने वाले दिनों के घटनाक्रमों पर है। नेपाल के सुप्रीम कोर्ट में असंवैधानिक तरीके से संसद भंग करने का मामला चल रहा है और ओली का ये फैसला पलट पाएगा या नहीं, ये सवाल सबके लिए अहम है। अब कम्युनिस्ट पार्टी का अगला कदम क्या होगा और ओली को पीएम की कुर्सी से हटाकर संसद बहाल करने और देश को नया नेतृत्व दे पाने में वह कितना कामयाब हो पाती है, यह देखने वाली बात होगी।

ऐसे में नेपाली कवि निभा शाह के एक पुराने इंटरव्यू की कुछ पंक्तियां अहम हो जाती हैं जो हाल ही में नेपाल मामलों के जानकार आनंद स्वरूप वर्मा ने अपने फेसबुक वॉल पर शेयर किया है । निभा शाह के मुताबिक इतिहास के एक कालखंड में जनता के नायक यदि खलनायक बन भी जाते हैं तो जनता फिर अपने नायक पैदा करती है और नए सपने देखती है।


शहीद का बलिदान रक्तबीज पैदा करने वाली कोख है, जो नए नायक पैदा करती रहेगी। जब तक जनता मुक्त नहीं होती, तब तक उसके सपने नहीं मरेंगे। बेशक नेपाल को एक बार फिर नए नायक का इंतज़ार है।

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