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नेपाल : बेशक विश्वासमत हारे, लेकिन अब भी भारी पड़ रहे हैं ओली

Tue, 11 May 2021 05:50 PM IST
Atul sinha अतुल सिन्हा
Updated Tue, 11 May 2021 05:50 PM IST
सार

मामला दिलचस्प है। लेकिन ओली निश्चिंत हैं और अब भी कोरोना के खिलाफ जंग के लिए दुनिया से मदद मांग रहे हैं। उनका कहना है कि उनकी प्राथमिकता जनता को इस महामारी से बचाना है, टीके लगवाना है, ऑक्सीजन से लेकर तमाम सुविधाएं मुहैया करानी है। इसके लिए वो लगातार संघर्ष करते रहेंगे।

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Nepal: Faithless of course, but kp sharma Oli still overshadows
केपी शर्मा ओली - फोटो : PTI

विस्तार

नेपाल की सियासी फिजा कुछ बदली-बदली सी है। केपी शर्मा ओली बेशक विश्वास मत हार गए, केवल 93 सांसदों का साथ ही उन्हें मिला और अब नेपाल की सियासत में उनकी फजीहत हो रही है। लेकिन उनके सामने नेपाल की संसदीय स्थिति का खाका भी साफ है और वो अपने विरोधियों की ताकत के बारे में भी जानते हैं। ऐसा नहीं है कि ओली पहले से जीत के लिए आश्वस्त थे, तभी विश्वास प्रस्ताव लेकर आए। करीब डेढ़ महीने पहले नेपाली सुप्रीम कोर्ट की संसद बहाली के आदेश-निर्देश के बाद ही वो समझ गए थे कि राह आसान नहीं है। लेकिन इस बीच संसदीय राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी के तौर पर उभरे ओली ने पूरे अंकगणित का जायजा लेने और संविधान की धाराओं को बारीकी से पढ़ने के बाद अपनी राह चुनी। फिलहाल वो तीन दिनों के कार्यवाहक प्रधानमंत्री हैं और अगर तीन दिनों में विपक्ष सरकार बनाने का दावा पेश नहीं कर पाता, उचित संख्या बल नहीं जुटा पाता तो कोई शक नहीं कि सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते कानून ओली को ही फिर से प्रधानमंत्री बना दिया जाएगा। फिर वो कम से कम 6 महीने के लिए निश्चिंत हो जाएंगे। राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने शुरू से ही ओली के हित में काम किया है, इसलिए विश्वासमत हारने के बाद भी ओली काफी हद तक निश्चिंत नजर आते हैं।

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ओली पर शुरू से ही आरोप लगते रहे हैं कि वो चीन के इशारों पर चलते हैं। भारत को लेकर उनका नजरिया भी कोई सकारात्मक नहीं रहा है। दरअसल 1966 से ही नेपाल की सियासत में सक्रिय रहे ओली के लिए तत्कालीन अधिनायकवादी पंचायत व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन में शामिल होना टर्निंग प्वाइंट था। कहा जाता है तब नौवीं कक्षा में पढ़ने वाले ओली के भीतर की आग का इस्तेमाल तत्कालीन राजशाही ने किया और अपने मोहरे के तौर पर पंचायत व्यवस्था के खिलाफ लड़ने वाले एक चेहरे के तौर पर पेश किया। ओली ने पढ़ाई छोड़ दी, राजशाही उनकी पीठ थपथपा रही थी और सियासत में अपने मोहरे के तौर पर इस्तेमाल कर रही थी। इसके करीब चार साल बाद ओली को इस बात का एहसास हुआ और उन्होंने खुद को कम्युनिस्ट आंदोलन का हिस्सा बना लिया। चीन उनके लिए तब से ही आदर्श रहा है। 70 के दशक में भारत समेत कई एशियाई देशों में कम्युनिस्ट आंदोलन उफान पर था। नेपाल में भी कम्युनिस्ट पार्टी राजशाही के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत कर चुकी थी, पंचायती व्यवस्था के अधिनायकवादी चेहरे के भी खिलाफ आवाज उठ रही थी और लोकतंत्र की मांग तेज होने लगी थी। भूमिगत तौर पर ओली बेहद सक्रिय थे और 1974 में झापा विद्रोह की उन्होंने अगुवाई की थी। जमींदारों के खिलाफ भूमिहीनों के इस आंदोलन में जिले के कई जमींदारों की सिर काटकर हत्या की गई थी। इन्हीं आरोपों के तहत ओली को 14 साल के लिए जेल जाना पड़ा। जेल में उन्होंने कम्युनिस्ट साहित्य पढ़ा और नेपाल की सियासत कई उतार चढ़ाव देखे।
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अस्सी के दशक के अंत में और नब्बे के दशक में ओली पूरी तरह से नेपाल की राजनीति में अहम चेहरा बन गए। सीपीएन-यूएमएल के अहम नेता के तौर पर स्थापित हुए। कोइराला सरकार में उप प्रधानमंत्री भी रहे। लेकिन अपने भीतर के अति आत्मविश्वास और अपनी कार्यशैली को लेकर उनकी जिद हमेशा बरकरार रही। कम्युनिस्ट आंदोलन के उभार, राजशाही विरोध और नेपाल में लोकतंत्र बहाली आंदोलन के दौरान उभरे माओवादी नेता पुष्प कमल दहल से उनकी वैचारिक असहमति हमेशा से रही। लेकिन नेपाल में जिस तेजी से सत्ता परिवर्तन होते रहे, नेपाली कांग्रेस का वर्चस्व भी लंबे समय तक बना रहा, साथ ही जनता दल जैसी कई ताकतें उभरीं, ऐसे में कम्युनिस्ट पार्टी के एकीकरण की जो कोशिश 2017 में हुईं, उसके पीछे सिर्फ और सिर्फ दोनों नेताओं के वर्चस्व का खेल था। इससे दक्षिणपंथियों के उस दुष्प्रचार के खिलाफ भी एक संदेश दुनिया को गया कि कम्युनिज्म अब खत्म हो रहा है।
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बहरहाल, दहल और ओली की वैचारिक जंग अपनी जगह है, लेकिन इससे नेपाल की सियासत में पिछले करीब दो साल से आए भूचाल और ओली के अड़ियल रवैये ने वहां की पूरी तस्वीर बदल दी। पार्टी को फिर से टुकड़ों में बांट दिया और जनता को दरकिनार कर इस भयानक कोरोना काल में सत्ता की ये जंग ने पूरी दुनिया के सामने दोनों नेताओं की बेशर्म सत्तालोलुपता का पर्दाफाश कर दिया।


लेकिन ओली अब भी हारे नहीं हैं। उनसे तीन साल छोटे राजनीति में जूनियर प्रचंड बेशक चुनौतियां खड़ी करते रहे हों, लेकिन सत्ता को कैसे खींचना है, कैसे मनमानी चलानी है और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद कैसे कुर्सी पर बने रहना है, इस खेल में ओली का कोई मुकाबला नहीं। बेशक ओली विश्वासमत हारे हों, लेकिन अब भी कुर्सी के खेल में वही भारी हैं। उनकी पार्टी सीपीएन-यूएमएल के अब भी 120 सदस्य हैं, जबकि प्रचंड की पार्टी के केवल 48 सांसद ही हैं। जनता समाजवादी पार्टी के 32 जबकि नेपाली कांग्रेस के 61 सांसद हैं। कुल 275 सदस्यों वाली संसद में बहुमत के लिए 136 सांसदों की जरूरत होती है। अगर ऐसा नहीं होता तो सबसे बड़ी पार्टी ही अल्पमत की सरकार चला सकती है। जाहिर है अब भी पलड़ा ओली का ही भारी है। अगर नेपाली कांग्रेस के शेरबहादुर देउबा अपने साथ जनता समाजवादी पार्टी और कुछ अन्य सांसदों को जोड़ भी लें तो ये नंबर नहीं पा सकते। ऐसे में सबसे ज्यादा फजीहत अगर किसी की होने जा रही है तो वो हैं पुष्प कमल दहल प्रचंड। मामला दिलचस्प है। लेकिन ओली निश्चिंत हैं और अब भी कोरोना के खिलाफ जंग के लिए दुनिया से मदद मांग रहे हैं। उनका कहना है कि उनकी प्राथमिकता जनता को इस महामारी से बचाना है, टीके लगवाना है, ऑक्सीजन से लेकर तमाम सुविधाएं मुहैया करानी है। इसके लिए वो लगातार संघर्ष करते रहेंगे। बेशक अभी उनकी संवैधानिक शक्तियां खत्म हो गई हों, लेकिन सरकार तो अभी वही चला रहे हैं।

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