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नेपाल पर ये गलती कर बैठे पीएम मोदी, वरना नोट बदलने को मजबूर नहीं होता पड़ोसी?

Sat, 15 Dec 2018 07:37 PM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Sat, 15 Dec 2018 07:37 PM IST
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nepal bans the use of indian currency notes of Rupees 200 and 500 and 2000 denomination
नेपाल ने भारत के नये नोटों को अपने यहां मान्यता देने से मना कर दिया है। - फोटो : File Photo

नेपाल ने भारत के नये नोटों को अपने यहां मान्यता देने से मना कर दिया है। अब 2 हजार रुपए से अधिक के गुलाबी, हरे रंग के 5 सौ रुपए और भूरे रंग के 2 सौ के नोट वहां बच्चों के व्यापार खेल के काम आएंगे। नेपाल और करता भी क्या? कोई देश एक बार अनुरोध कर सकता है। दो बार प्रार्थना कर सकता है। तीन बार गिड़गिड़ा सकता है। आखिर कितने बार वह हिंदुस्तान के सामने झोली फैलाएगा? अरसे तक वह सिर्फ इस

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आधार पर भारत का पिछलग्गू बना रहा कि सदियों से रोटी-बेटी का रिश्ता रहा है और दोनों देशों को जोड़ने वाला सीमेंट हिंदू धर्म का था।

जब उसने बारह बरस पहले घोषित रूप से हिंदू राष्ट्र का चोला उतार दिया और चीन की शरण में चला गया तो हिंदुस्तान हाथ मलने लगा। धर्म की दीवार का यह सीमेंट बिखरने लगा। एक अच्छे दोस्त, पड़ोसी प्यारे से देश से दूरी कितनी भारी पड़ेगी, यह आने वाला वक्त साफ कर देगा। कौन विश्वास करेगा कि नेपाल के मुक्ति संग्राम के यज्ञ में कभी भारत के लोकप्रिय आंचलिक लेखक फणीश्वर नाथ रेणु जैसे हजारों क्रांतिकारियों ने कमर में रिवॉल्वर लटका कर उसकी जंग लड़ी थी।

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नेपाल सरकार ने दस दिसंबर को यह फैसला ले लिया था। - फोटो : File Photo

आखिर क्यों बंद किए नेपाल ने नोट 
एक बार फिर नोटों की बात। नेपाल सरकार ने दस दिसंबर को यह फैसला ले लिया था। उसे सार्वजनिक नहीं किया गया था। एक आखिरी निवेदन उसने भारत से किया था। मगर हम देवताओं की जाति और इंसानों का गोत्र तय करने के महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कर्तव्य में लगे हुए थे। हमारे कई प्रदेशों से भी छोटे इस बौने से देश की कारोबारी रीढ़ की चिंता क्यों करते? लिहाजा एक सप्ताह इंतजार करने के बाद उसने फैसले को उजागर कर दिया। अब वहां न कोई भारत की मुद्रा रख पाएगा न उस मुद्रा में कोई कारोबार कर पाएगा। यह जुर्म होगा।

पिछ्ले साल भी नेपाल ने भारत के नए नोटों पर बंदिश लगा दी थी। इसके बाद इस साल भारतीय प्रधानमंत्री जब नेपाल जाने वाले थे, तो सदभावना दिखाते हुए नेपाल ने यह रोक हटा दी थी। शायद यह सोचकर कि नरेंद्र मोदी उसकी पुरानी मांग पर ध्यान देंगे। जब भारतीय प्रधानमंत्री जनकपुर दर्शन करने के लिए गए थे प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने उनसे विनम्र अनुरोध किया था कि वे नेपाल की मुश्किल समझें और नेपाल के खजाने में मौजूद पुराने नोटों को बदलने का निर्देश दें। हमारे प्रधानमंत्री ने सहमति दी। कुछ नहीं हुआ।

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सितंबर में विदेशी मुद्रा विनिमय विभाग ने सितंबर में फिर भारत के आगे हाथ फैलाया कि वह पुराने नोट बदल दे। - फोटो : File photo

इसके बाद सितंबर में विदेशी मुद्रा विनिमय विभाग ने सितंबर में फिर भारत के आगे हाथ फैलाया कि वह पुराने नोट बदल दे। कुछ नहीं हुआ। अगर आप को मैं नेपाल के राष्ट्रीय बैंक में मौजूद भारतीय नोटों की संख्या बताऊं तो यकीनन आप हंसेंगे। यह मुद्रा आठ से दस करोड़ रुपए है। नेपाल के आम आदमी के पास भी करीब इतने ही रुपए हैं। याने कोई बीस करोड़ रुपए। इतना तो हमारा एक सांसद चुनाव लड़ने में बहा देता है।

इतना ही नहीं, भारत में तो लोगों को नोट बदलने की सुविधा और समय भी मिला था। नेपाल के नागरिकों को तो यह मौका भी नहीं मिला। अगर दोनों देश दशकों से भारतीय करंसी में कारोबार कर रहे थे तो इसमें उनका दोष क्या था। नेपाल का करीब सत्तर फीसदी हिंदुस्तानी नोटों में होता है। एक संप्रभु देश को मुसीबत में डालने का काम हमारी ओर से क्यों हुआ - इसका उत्तर किसी के पास नहीं है।

उठ रहे हैं ये भी सवाल नेपाल के साथ भेदभाव क्यों? 
नेपाल बैंक के कार्यकारी निदेशक भीष्म राज ढुंगाना का सवाल है कि भूटान के रुपए भारत ने बदले। फिर नेपाल के साथ भेदभाव क्यों? इसका जवाब शायद ही किसी के पास न हो। अलबत्ता भारतीय अधिकारी कहते हैं कि इस पर दोनों देशों के बीच वार्ताओं के दौर चल रहे हैं। गोया यह भी चीन के साथ सीमा विवाद की तरह है ,जिसकी वार्ताएं अनंत काल तक चलती रहेंगीं।

नए निर्देशों के मुताबिक नेपाल सरकार ने भारत के सौ रुपए तक के नोटों या चिल्लर को प्रचलन में रहने दिया है। कारण यह है कि गरीब और कमजोर वर्ग को असुविधा न हो। रिक्शा चालक, चायवाले तथा किराने वाले जैसे लोगों को असुविधा से बचाने के लिए यह छूट दी गई है। लेकिन यह सचाई है कि नेपाल में भारतीय नोटों का प्रचलन बंद होने से आम आदमी में भारत के प्रति भरोसे की दीवार दरक गई है।

कोई ताज्जुब नहीं कि पाकिस्तान की तरह अब नेपाल में चीन की मुद्रा का प्रचलन वैध और औपचारिक बना दिया जाए। अभी भी संभावना का दरवाजा खुल सकता है। बशर्ते भारत विदेशी आदान-प्रदान अधिनियम के मुताबिक फेमा नोटिफिकेशन जारी करे। देखना है हम अपने इस दुर्बल पड़ोसी की गुहार पर कब ध्यान देते हैं।
 

(डिस्क्लेमर- अस्वीकरण: यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.)

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