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National Doctors Day: स्वस्थ समाज के लिए जरूरी है डॉक्टर-मरीज के बीच विश्वास, मौजूदा हालात चुनौतीपूर्ण

Fri, 01 Jul 2022 04:08 PM IST
Swati sharma स्वाति शैवाल
Updated Fri, 01 Jul 2022 04:08 PM IST
सार

चिकित्सा को हमेशा से एक नोबल पेशे में गिना गया है। सहज शब्दों में कहें तो एक ऐसा पेशा जहां आपके हाथ में ईश्वर सुपर पॉवर दे देता है। इसे चाहे आस्था कहें, विश्वास कहें या चमत्कार, चिकित्सा जगत में ऐसे कई घटनाक्रम आम हैं जहां गम्भीर बीमारी या दुर्घटना से जूझ रहा व्यक्ति भी मौत के मुंह से वापस आ जाता है। इसमे ईश्वर की माया के साथ डॉक्टर की काबिलियत और खुद मरीज का विश्वास भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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National Doctor's Day 2022 Are we losing the trust of good doctors
डॉक्टर की काबिलियत और खुद मरीज का विश्वास भी महत्वपूर्ण - फोटो : Pixabay

विस्तार

चिकित्सा को हमेशा से एक नोबल पेशे में गिना गया है। सहज शब्दों में कहें तो एक ऐसा पेशा जहां आपके हाथ में ईश्वर सुपर पॉवर दे देता है। इसे चाहे आस्था कहें, विश्वास कहें या चमत्कार, चिकित्सा जगत में ऐसे कई घटनाक्रम आम हैं जहां गम्भीर बीमारी या दुर्घटना से जूझ रहा व्यक्ति भी मौत के मुंह से वापस आ जाता है।

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इसमें ईश्वर की माया के साथ डॉक्टर की काबिलियत और खुद मरीज का विश्वास भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गौर कीजिएगा कि यहां डॉक्टर की काबिलियत भी उपरोक्त दो चीजों के साथ जुड़ी है। कोई भी डॉक्टर आपको यह गारंटी नही दे सकता कि वह आपको चमत्कारी रूप से स्वस्थ कर देगा। यह आपका उसके प्रति विश्वास होता है जिसको बनाए रखने के लिए वह खुद को झोंक देता है। ऐसे में बिना गलती अगर डॉक्टर्स को ही हर बात के लिए दोषी ठहराया जाए तो क्या ये नाइंसाफी नहीं होगी?
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मेरे बेटे के पीडियाट्रिशियन के क्लिनिक के ठीक पास एक खोमचे वाला चाट और पानी पूरी बेचता है। अक्सर उस जगह पर कॉलेज स्कूल के विद्यार्थियों की भीड़ लगी रहती है क्योंकि वहां आस पास-कई शिक्षण संस्थान हैं, ये तो हुई आम बात। क्लिनिक का समय आमतौर पर शाम का होता है जो कि डिनर का भी समय होता है।
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मैंने ये अनुभव किया है कि जो पैरेंट्स अपने बीमार बच्चों को लेकर आते हैं वे अक्सर डॉक्टर साहब का इंतज़ार करते हुए या चेकअप के बाद जाते समय खुद तो उस खोमचे से लेकर चीजें खाते ही हैं, बीमार बच्चे को खिलाने से भी नही हिचकते।

15 मिनिट पहले जिस बच्चे को डॉक्टर ने ठंडी-चटपटी चीजें खाने से परहेज करने को कहा, वो अपने ही माता पिता की छत्रछाया में पानी पूरी खा रहा होता है। वो भी डिनर की जगह, अब अगर बच्चा ठीक न हो, उसकी तबियत ठीक न हो तो सारा दोष डॉक्टर का। बिना पलक झपके डॉक्टर को खराब बता दिया जाता है।

यहां उस गरीब खोमचे वाले को भी दोष देने का मतलब नहीं क्योंकि उसने आपको कसम नहीं दी कि मेरे खोमचे का खर्चा आपसे ही चलता है, कसम है कुछ तो खा जाओ, उसे तो शायद ये भी नहीं पता कि आप डॉक्टर के पास से चेकअप करवा कर आ रहे हैं?

यह सच है कि आज भारत में कम प्रशिक्षित डॉक्टर्स व फर्जी डिग्रीधारियों की संख्या और बढ़ी है। यह भी सच है कि जांच और इलाज के नाम पर लाखों रुपए ऐंठ लेने वाले अस्पताल भी खड़े हुए हैं लेकिन इन दोनों की ही सबसे बड़ी कीमत जो चुका रहा है, वह है एक अच्छा प्रोफेशनल जो अच्छा इंसान भी है। जो अपने अनुभव और प्रशिक्षण के बल पर मरीज़ों को सेवा देने को आतुर है।

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डॉक्टर्स के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति - फोटो : istock

चिकित्सा सम्बन्धी जानकारियों का असंतुलन

अब आते हैं उस पक्ष पर जिसकी आमतौर पर लोग शिकायत करते हैं। यहां दो बातें गौर कीजिए। पहली चीज है चिकित्सा सम्बन्धी जानकारी का असंतुलन। यह हमारे देश की सबसे बड़ी विडंबना है। वर्तमान में दो तरह के लोग हमारे देश मे हैं। एक वे जो बिना जानकारी अपने मन से दवाएं लेते हैं और बीमारी बिगड़ने पर डॉक्टर के पास पहुंचते हैं।

दूसरे वे जो इंटरनेट पर बीमारियों के बारे में पढ़कर खुद डॉक्टर बनकर डॉक्टर के पास पहुंचते हैं, और अपने अधूरे ज्ञान के दम पर वे डॉक्टर के इलाज में ही कमी निकालने लगते हैं। इन सबसे इतर खतरा यहां भी है कि चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी हर तकनीक, दवाओं व अन्य सुविधाओं के बारे में न तो आमजन को सहज जानकारी ही होती है, न ही उन तक आसान पहुंच ही होती है। इसलिए सही प्रोफेशनल तक पहुंचने में ही काफी वक्त बर्बाद हो जाता है। 

आज से कुछ महीनों पहले राजस्थान के दौसा में डॉक्टर अर्चना शर्मा द्वारा जान देने की जो  घटना घटी थी, वह महज एक डॉक्टर की मौत नहीं थी। वह उस पूरे विश्वास की मौत थी जिसने डॉक्टर के पेशे को नोबल यानी पवित्र काम की श्रेणी में रखा है। कहा जाता है कि धरती पर डॉक्टर ईश्वर के भेजे दूत हैं, लेकिन ये दूत इंसान के रूप में काम करने आये हैं। यह बात भी ध्यान में रखना जरूरी है। डॉक्टर अर्चना शर्मा की गलती यह थी कि उन्होने अन्याय के खिलाफ लड़ने की बजाय जान देना बेहतर समझा।

उनका पूरा परिवार टूट गया जो अब वापस नहीं जुड़ सकता। उनके परिवार में अब शायद ही कोई डॉक्टर बनना चाहे। एक डॉक्टर बनने के लिए जीवन के कम से कम 7-9 साल पूरी मेहनत और समर्पण से काम करना होता है। स्पेशलाइजेशन के बाद की ट्रेनिंग और प्रैक्टिस को जोड़ दें तो एक अच्छा डॉक्टर बनने में कम से कम 12-15 साल का समय लगता है। ऐसे में एक विशेषज्ञ को खो देने का महत्व आज नही, आज से कुछ सालों बाद पता चलेगा।

कुछ समय पहले एक परिचित डॉक्टर, मेडिकल फील्ड की बात करते-करते व्यथित होकर बोले-

अच्छे डॉक्टर्स आ ही कहाँ रहे हैं। जो हैं उनका प्रतिशत बहुत कम है। कोरोना के दौरान वैसे भी हमने बहुत सारे अनुभवी चिकित्सकों को खो दिया है। ये वो प्रोफेशनल्स थे जिन्होंने केवल अपने काम ही नहीं, इंसानियत से भरे अपने व्यवहार के लिए भी अपनी जगह बनाई थी। आज ऐसे डॉक्टर मिलना बहुत मुश्किल है।


एक व्यापमं घोटाले के बाद जिस हेराफेरी का पता चला था वो अब खत्म हो गई होगी ये तो सोचना भी मूर्खता होगी क्योंकि धांधली करने वालों ने चेहरे भी बदल लिए होंगे और तरीके भी। इसलिए जो अच्छे लोग इस फील्ड में काम कर रहे हैं उनकी सुरक्षा और भी जरूरी हो जाती है।

केंद्रीय स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्री, मनसुख मंडाविया ने इसी वर्ष राज्यसभा में जानकारी देते हुए कहा था-

देश में इस वक्त तेरह लाख से कुछ ज्यादा एलोपैथिक डॉक्टर्स हैं जो मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया या स्टेट मेडिकल काउंसिल में रजिस्टर्ड हैं। यानी करीब 834 लोगों पर 1 डॉक्टर। इनके अलावा कुछ लाख डॉक्टर्स होम्योपैथी, यूनानी, और आयुर्वेदिक आदि पद्धति से इलाज करने वाले भी हैं। अब कोई व्यक्ति किस पद्धति से इलाज करवाता है यह उसका निजी मसला है।


लेकिन यह भी एक तथ्य है कि रिसर्च और टेस्टिंग की जितनी प्रमाणिकता अभी एलोपैथी को लेकर मौजूद है उसकी आधी भी बाकी पैथियों के लिए नहीं है और यही वो वजह है जो इन बाकी पैथियों को असरकारक होते हुए भी उस तरह स्थापित नहीं कर पातीं।

ऊपर से खुद को डॉक्टर समझ बैठे लोग इन पैथियों को लेकर भी कई भ्रांतियों में जीते हैं। जिनमे सबसे आम है- होम्योपैथी और आयुर्वेदिक दवाइयों का कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं होता। जबकि खुद इस पैथी से जुड़े डॉक्टर इस भ्रांति को लेकर सबसे ज्यादा परेशान होते हैं। यह केवल एक बात है ऐसी कई बातें हैं जो इन पैथियों की विश्वसनीयता को लोगों तक पहुंचाने में बाधा बनती हैं।

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डॉक्टर मरीज के बीच का भरोसा आवश्यक - फोटो : Social Media

ग्रामीण इलाकों की अलग चुनौतियां

दुश्वारियां यहीं खत्म नहीं हो जातीं। ग्रामीण इलाके के सरकारी अस्पताल में काम करने वाली एक परिचित महिला डॉक्टर ने मुझे एक बार बताया कि गांवों में लोग डॉक्टर की दवाइयों से पहले झाड़-फूंक से मरीज को अधमरा कर चुके होते हैं। इसके बाद वे मरीज को हमारे पास लाते हैं कि हम उन्हें ठीक कर दें वरना हमारी डॉक्टरी किस काम की। हम पूरी कोशिश करते हैं और मरीज ठीक भी होते हैं। लेकिन एक भी मरीज अगर ठीक न हो तो हमारी जान पर बन आती है।

चुनौतियां बहुत सारी हैं लेकिन जरूरी यह है कि इसके लिए मरीज और डॉक्टर को मिलकर ही हल निकालने होंगे। अगर कोई डॉक्टर या हॉस्पिटल गलत कर रहा है तो बकायदा उसके खिलाफ लांबमद हो जाएं, लोगों तक सबूत के साथ उसकी गलती पहुंचाएं लेकिन अस्पताल में तोड़ फोड़ करके या डॉक्टरों पर खुद हमला करके खुद को मुश्किल में न डालें। ऐसे भावनापूर्ण समय में अगर कोई आपको भड़का भी रहा है तो उसकी सुनने की बजाय अपने दिमाग से काम लें।

अच्छे और बुरे लोग हर प्रोफेशन में होते हैं, चिकित्सा क्षेत्र में भी। इसलिए अच्छे डॉक्टर्स की कद्र करना बहुत जरूरी है। एक बार डॉक्टर मरीज के बीच का भरोसा पूरी तरह चला गया तो वो चमत्कार होने भी बन्द हो जाएंगे जो प्रकृति डॉक्टरों का साथ देने के लिए करती है।

इन तमाम नकारात्मक परिस्थितियों के बीच एक दिन जब एक युवा डॉक्टर ने मुझसे कहा- 'मैं मरीजों की जेब में हाथ डालकर पैसे नहीं निकालना चाहता, इसलिए विदेश जा रहा हूँ। पैसे कमाकर लौटूंगा और हॉस्पिटल खोलूंगा जहां लोगों को किफायती इलाज मिल सके।'

तो मन संतोष की रोशनी से भर जाता है,इसलिए अगली बार अगर आप किसी डॉक्टर के काम और इलाज से संतुष्ट हों तो उन्हें धन्यवाद देने से न चूकें। ये विश्वास ही असली डॉक्टर्स डे मनाने का सूचक होगा।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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