उत्तराखंड के लिए नायक भी और खलनायक भी थे मुलायम
उत्तराखण्ड के प्रति उनके भावनात्मक लगाव का ही नतीजा था कि उन्होंने अपने दोनों पुत्रों की बहुएं गढ़वाल से चुनीं और इस भू-भाग से अपने पारिवारिक रिश्ते जोड़े। उनकी बड़ी बहू डिम्पल पौड़ी गढ़वाल के रावतों की बेटी और छोटी बहू अपर्णा उत्तरकाशी के बिष्टों की बेटी है।
उत्तराखण्ड के प्रति उनके भावनात्मक लगाव का ही नतीजा था कि उन्होंने अपने दोनों पुत्रों की बहुएं गढ़वाल से चुनीं और इस भू-भाग से अपने पारिवारिक रिश्ते जोड़े। उनकी बड़ी बहू डिम्पल पौड़ी गढ़वाल के रावतों की बेटी और छोटी बहू अपर्णा उत्तरकाशी के बिष्टों की बेटी है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
जयसिंह रावत मुलायम सिंह यादव को राजनीतिक कारणों से भले ही उत्तराखण्ड में खलनायक के तौर पर प्रोजेक्ट किया गया हो, लेकिन वास्तव में वह इस पहाड़ी भू-भाग के असली शुभ चिन्तक थे। यह सही है कि शुरू में वह पृथक उत्तराखण्ड राज्य के विरोधी थे और कहते थे कि उत्तराखण्ड उत्तर प्रदेश का सिर है इसलिए उसे कटने नहीं देंगे।
दरअसल, वास्तव में वह देवभूमि को सिर की तरह सम्मान देते थे। जहां तक सवाल पृथक राज्य के गठन का है तो कामरेड पी.सी जोशी के अलावा उत्तराखण्ड का राष्ट्रीय स्तर का कोई भी नेता अलग उत्तराखण्ड राज्य का समर्थक नहीं था। उन नेताओं में गोविन्द बल्लभ पन्त, हेमवती नन्दन बहुगुणा, नारायण दत्त तिवारी और के.सी. पन्त आदि सभी बड़े नेता थे जिनका नाम उत्तराखण्ड में बहुत आदर से लिया जाता है। तिवारी जी तो राज्य की पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री तक बने।
उत्तराखंड के लिए पहला प्रस्ताव विधानसभा में पास कराया
मुलायम सिंह यादव को उत्तराखण्ड विरोधी बताया गया, जबकि वह मुलायम सिंह ही थे जिन्होंने सबसे पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा में पृथक उत्तराखण्ड के लिए एक विस्तृत प्रस्ताव पारित कर केन्द्र सरकार को भेजा था। उस प्रस्ताव के बाद पृथक उत्तराखण्ड राज्य की मांग को बल मिला। एक सकारात्मक माहौल बना।
प्रस्ताव भी बाद की सरकारों की तरह महज औपचारिक न हो कर एक दस्तावेज के तौर पर तैयार किया गया, जिसे लोग आज भी गाहे-बगाहे संदर्भित करते हैं, जबकि बाद में उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने केन्द्र से आए प्रस्ताव में उत्तराखण्ड विरोधी 26 संशोधन पारित कराए थे।
मुलायम का प्रस्ताव एक ऐतिहासिक दस्तावेज है-
मुलायम सिंह राज्य के लिए कितने गंभीर थे इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि उन्होंने प्रस्ताव के लिए दो कमेटियां गठित की थीं। एक कमेटी कैबिनेट मंत्री रामाशंकर कौशिक की अध्यक्षता में बनी थी जिसके सचिव रघुनन्दन सिंह टोलिया थे।
टोलिया जी उत्तराखण्ड के मामलों में विद्वान माने जाते थे। वह राज्य के मुख्य सचिव भी बने। टोलिया जी का बनाया हुआ मजमून वास्तव में एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। नए राज्य के प्रस्ताव के लिए मुलायम सिंह ने विनोद बड़थ्वाल की अध्यक्षता में दूसरी कमेटी भी गठित की ताकि प्रस्ताव में जनभावनाओं का समावेश हो जाए।
मुलायम सिंह यादव द्वारा गठित कौशिक समिति ने जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए राजधानी के लिए गैरसैण पर जोर दिया था। उस कमेटी ने गढ़वाल और कुमाऊं के बीच एक बफर डिविजन के गठन का सुझाव भी दिया था।
मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में ही पहली बार उत्तराखण्ड विकास विभाग के लिए अपर मुख्य सचिव की नियुक्ति हुई थी। इस नियुक्ति से उत्तराखण्ड के प्रति उनकी गंभीरता को आंका जा सकता है। उसके बाद काफी समय तक अतिरिक्त मुख्य सचिव का पद भारत सरकार ने समाप्त कर दिया था।
उत्तराखण्ड के लिए पहला कैबिनेट मंत्री नियुक्त करने वाले भी मुलायम सिंह यादव ही थे। उन्होंने 1989 में उत्तर प्रदेश की कमान संभालने पर उत्तरकाशी के बर्फिया लाल ज्वांठा को उत्तराखण्ड मंत्रालय का कैबिनेट मंत्री बनाया था, जबकि उससे पहले इस मंत्रालय को राज्यमंत्री संभालते थे।
उत्तराखण्ड के प्रति उनके भावनात्मक लगाव का ही नतीजा था कि उन्होंने अपने दोनों पुत्रों की बहुएं गढ़वाल से चुनीं और इस भू-भाग से अपने पारिवारिक रिश्ते जोड़े। उनकी बड़ी बहू डिम्पल पौड़ी गढ़वाल के रावतों की बेटी और छोटी बहू अपर्णा उत्तरकाशी के बिष्टों की बेटी है।
मुजफ्फरनगर कांड के कलंक से कभी नहीं उबर पाए मुलायम
मुजफ्फरनगर कांड को लेकर उन्होंने सार्वजनिक मांगी थी जबकि आज के नेताओं से इस तरह की माफी की अपेक्षा नहीं की जाती। उत्तराखंड आंदोलन के दौरान मुजफ्फरनगर कांड समेत कई गोली कांडों के कारण उनकी छवि खलनायक की अवश्य बनी मगर वह इन कांडों के लिए अकेले दोषी नहीं थे। दिल्ली पुलिस के तत्कालीन उपायुक्त दीपचंद के उस बहुचर्चित पत्र के अलोक में भी मुजफ्फरनगर कांड को देखा जाना जरुरी है।
सीबीआई जांच के अनुसार गढ़वाल के दो पुलिस अफसरों ने जवानों से स्टेनगन छीनकर आंदोलनकारियों पर गोलियां बरसाईं थी। दोनों को बाद में उत्तराखंड में प्रमोशन। इनमें एक को सेवानिवृति के बाद भी दुबारा नियुक्ति मिली जबकि दूसरा दरोगा से लेकर DSP तक बना। मसूरी गोली कांड के दौरान एक गढ़वाली कॉन्स्टेबल ने बलबीर नेगी के सीने में संगीन घोंपी थी।
देहरादून का प्रेस क्लब भी मुलायम की ही देन है। वह पत्रकारों के सबसे बड़े मित्र और शुभ चिन्तक हुआ करते थे। मुझे याद है एक बार हमारी यूनियन के झांसी में आयोजित सम्मेलन में उन्होंने कहा था कि मित्रता किसी की जाति, धर्म या राजनीतिक सम्बद्धता को देखकर नहीं होती। उन्होंने पत्रकार धुरन्धरों से पूछा कि आप हमारे पुराने मित्र हैं जबकि आपकी आरएसएस से करीबी जगजाहिर है। वास्तव में वह एक जमीनी नेता थे, इसलिए उन्हें जमीनी हकीकतों की जानकारी रहती थी।