बदलाव का संकेत: फिर असम गण परिषद की तरफ लौट रहे हैं अल्पसंख्यक
हाल में नगांव जिले के कलियाबर और रोहा में जितनी बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक नेताओं और कार्यकर्ताओं ने अगप में योगदान किया है, उससे इस बात के साफ संकेत मिल रहे हैं कि अल्पसंख्यक मतदाता सत्ता में शामिल दल के साथ बने रहना चाहते हैं।
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पिछले कुछ दिनों से मैंने महसूस किया है कि राज्य के अल्पसंख्यक बहुल इलाके में फिर से असम गण परिषद (अगप) का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। अल्पसंख्यक मतदाता कांग्रेस एवं एआईयूडीएफ छोड़कर अगप की ओर लौट रहे हैं। अल्पसंख्यकों के साथ दिक्कत यह है कि कांग्रेस और एआईयूडीएफ के साथ रहने से उन्हें राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं का पूर्ण लाभ नहीं मिल पा रहा है।
भाजपा के साथ उन्हें जाने में परेशानी है या यह कहना ज्यादा सही होगा कि भाजपा में उनका प्रवेश इतना आसान नहीं है। ऐसे में अगप ही एकमात्र पार्टी है, जहां पर उनके लिए जगह है। दूसरी बात यह भी है कि अगप राज्य सरकार का एक घटक दल है।
पहले भी अगप का अल्पसंख्यकों पर प्रभाव रहा है। असम विधानसभा के 1996 के चुनाव में अगप के टिकट पर 8 अल्पसंख्यक विधायक चुनकर आए थे और उनमें से दो विधायक साहबुद्दीन आलम चौधरी तथा अब्दुल रॉफ महंत, मंत्रिमंडल में मंत्री भी बने थे।
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इतना ही नहीं, अल्पसंख्यक बहुल बटद्रवा तथा सामागुड़ी विधानसभा क्षेत्र से अल्पसंख्यक मतदाताओं के सहयोग से हिंदू उम्मीदवार जीतने में सफल रहे। वहीं अल्पसंख्यक बहुल यूनाइटेड माइनॉरिटी फ्रंट ऑफ असम को मात्र दो सीटें मिलीं।
अल्पसंख्यकों के अस्तित्व की लड़ाई
असम गण परिषद के अध्यक्ष अतुल बोरा के अनुसार अगप का चरित्र अपनी स्थापना के साथ ही धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल के रूप में रहा है। लेकिन 2005 में असम में संदिग्ध नागरिकों की पहचान के लिए 1983 में बने आईएमडीटी एक्ट को उच्चतम न्यायालय ने रद्द कर दिया। इसके बाद अल्पसंख्यकों के अस्तित्व को बचाने के नाम पर मौलाना बदरुद्दीन की अगुवाई में एआईयूडीएफ के गठन किया गया।
उसके बाद अल्पसंख्यकों का रुझान एआईयूडीएफ की तरफ गया, क्योंकि उन्हें यह बताया गया कि था कि उन्हें असम से बाहर करने की साजिश रची जा रही है, जिसकी वजह से वर्ष 2006 के विधानसभा चुनाव में इसे 10 सीटें, 2011 विस चुनाव में 18 और 2021 के विस चुनाव में 15 सीटें मिलीं। लेकिन अब खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। अजमल और कांग्रेस उन्हें वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करती रही, उनकी बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं हो पाए। भाजपा में रहते हुए भी अगप की छवि एक धर्मनिरपेक्ष पार्टी की रही है।
हाल में नगांव जिले के कलियाबर और रोहा में जितनी बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक नेताओं और कार्यकर्ताओं ने अगप में योगदान किया है, उससे इस बात के साफ संकेत मिल रहे हैं कि अल्पसंख्यक मतदाता सत्ता में शामिल दल के साथ बने रहना चाहते हैं। अगप अध्यक्ष अतुल बोरा ने इस बात को दोहराया कि अगप जनता की पार्टी है और वह राज्य सरकार में शामिल है, क्योंकि मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्वशर्मा सभी का विकास चाहते हैं। इसलिए भारतीय अल्पसंख्यकों को कांग्रेस और एआईयूडीएफ का साथ छोड़कर पहले की तरह अगप में शामिल हो जाना चाहिए। अगप ही उनके हितों की रक्षा कर सकती है।
उसी तेवर में अगप के कार्यकारी अध्यक्ष केशव महंत कहते हैं-
आज की राजनीति में सक्रिय अगप राज्य का सबसे पुराना क्षेत्रीय दल है। जब अगप का गठन हुआ था, तब अल्पसंख्यकों में डर था। लेकिन अगप की पहली सरकार के गठन के बाद उनका डर टूट गया। 1996 में जब दूसरी बार बनी तो 8 अल्पसंख्यक विधायक बने। उनमें 2 मंत्री भी बने। समय के साथ राजनीति भी बदली और अल्पसंख्यक वोट बैंक बंट गए। वे कांग्रेस एवं एआईयूडीएफ के बहकावे के शिकार हो गए। अगप सरकार के दिनों में कभी अल्पसंख्यकों पर अत्याचार नहीं हुआ।
अल्पसंख्यक बहुल विधानसभा क्षेत्रों में बड़ी संख्या में जिला परिषद सदस्य तथा आंचलिक पंचायत के सदस्य अपने समर्थकों के साथ अगप में शामिल हो रहे हैं। अगप की रैली में अल्पसंख्यकों की बड़ी भागीदारी राज्य की राजनीति में होने वाले बड़े बदलाव का संकेत है। यदि ऐसा होता रहा तो कांग्रेस के लिए नगांव और कलियाबर सीट को बचाना मुश्किल हो जाएगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।