मी टू अभियान से कितनी बदली महिलाओं की स्थिति?
मी-टू का हंगामा तो बहुत हुआ और काफी समय तक चर्चा में भी रहा। जब एक के बाद एक कई महिलाओं ने अपने साथ हुए कटु अनुभव सुनाए तो जैसे एक सन्नाटा सा बरप गया। यह जानकर लोग हैरान रह गए और सकते में आ गए कि जिन्हें वह एक सम्माननीय और प्रशंसनीय नजरों से देखते थे तथा सोचते थे कि वह भी उनके जैसा क्यों नहीं बन पाए वहीं भीतर से इतने खोखले और ओछी मानसिकता के निकले।
दरअसल, वह खुद तो सम्मान व आदर पाते रहे, लेकिन दूसरों विशेषकर उनके संपर्क में आने वाली महिलाओं के सम्मान को उन्होंने तार-तार कर रखा था। चूंकि उनकी पोल नहीं खुल रही थी व उनके बारे में महिलाएं मुंह नहीं खोल रही थी इसलिए वह अच्छे बनने का मुखौटा ओढ़े समाज में घूमते रहे।
फिर एक दिन एक महिला ने अपने साथ हुए असम्मान की पीड़ा बताई तो फिर तो एक शोर हो गया। एक-एक महिला अपने अब तक के छिपे दर्द को सामने लेकर आती गईं और तथाकथित समाज में बहुत ही प्रशंसा पाने वाले पुरुष बेनकाब होते चले गए। पश्चिम से शुरू हुआ मी-टू का यह हंगामा पूर्व तक भी आया पर, भारत तक ही सिकुड़ कर रह गया मी-टू का यह तूफानी दौर थम सा गया है।
इधर, न तो पश्चिम में और न ही पूर्व में इसका कहीं शोर या कोई आवाज तक नहीं आ रही, तो क्या यह समझा जाए कि पुरुष या तो सुधर गए हैं या फिर मी-टू के हंगामे के बाद सहम गए हैं और इसलिए कोई ऐसी बेजा हरकतें नहीं कर रहे हैं। इस पर तो शक किया जाना चाहिए कि पुरुषों में एकाएक सुधार आ गया है और वह इस अहिंसात्मक आंदोलन से कुछ सीख पाए हैं। ऐसा तो हो ही नहीं सकता।
दूसरी मुख्य बात इस मी-टू आंदोलन के कारण यह पूछी जानी चाहिए कि क्या इससे महिलाएं सशक्त हुई? मी-टू को लेकर एक सहानुभूति की लहर अवश्य उठी पर इससे महिलाओं को क्या लाभ हुआ। क्या उनके अधिकारों में बढ़ोतरी हुई या उनका सशक्तीकरण हुआ?
दरअसल, इस बात को लेकर एक विश्लेषण भी किया गया है जिसके परिणाम यहीं बताते हैं कि मी-टू की महिलाओं को सशक्त बनाने में कोई भूमिका नहीं बन पाई। अमेरिका की कारनेगे विश्वविद्यालय ने मी-टू द्वारा महिलाओं को सशक्त बनाने के प्रभाव के रोल के बारे में एक अध्ययन किया। फ्लोरेंस में एंजेली फील्ड ने भी मी-टू पर की गई अपनी रिसर्च का पेपर प्रस्तुत किया है।
एंजेली ने जब यह पेपर प्रस्तुत किया तो तुरंत इस पर चर्चा होने लगी कि मी-टू अभियान से तो महिलाओं को और अधिक सशक्तीकरण को मजबूती मिलनी चाहिए थी व उनके व्यक्तित्व को लेकर और अधिक सम्मान की बातें की जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा होता हुआ कुछ नजर तो नहीं आ रहा। जिस तरह से मीडिया में मी-टू अभियान की घटनाओं की भाषा तथा उनमें प्रयुक्त शब्दों का प्रयोग हुआ उससे तो कहीं यह जाहिर नहीं हुआ कि इससे महिलाओं की स्थिति में अंतर आया और महिलाएं सशक्त हुईं हैं। उनकी बातों में वजन है और अब भविष्य में इस वजन की अनदेखी नहीं की जा सकती या की जाएगी।
दरअसल, मी-टू अभियान की सारी बातें और उसमें बताई गई सारी घटनाएं एक किस्सागोई बनकर रह गईं। इन घटनाओं का वर्णन करने में मीडिया व स्वयं पीड़िताओं ने भी जिस तरह से इसे कहा वह सब एक घटना घटित होनी की ही बातें लगीं और उनमें कहीं वजन और गहराई या यूं कहें कि गंभीरता नहीं थी।
इन घटनाओं के बारे में जो भी जानकारी मिली उससे शोषित महिला या युवती के प्रति सहानुभूति तो हुईं व संवेदनाएं भी जागीं पर इससे महिलाओं की छवि सशक्त बनाने में कोई मदद नहीं हुई। घटनाओं का केवल मात्र वर्णन जिस तरह की भाषा का प्रयोग करके किया गया वह मात्र घटना का नेरेशन होकर रह गया। महिलाओं की स्थिति में कोई विशेष बदलाव इस मी-टू आंदोलन से दिखाई नहीं दे रहा।
यूलिया तवेस्तकोव जो कम्प्यूटर साईंस की भाषा टेक्नोलॉजिस इंस्टीट्यूट की असिस्टेंट प्रोफेसर मानती हैं कि- अभी भी मीडिया पुरुषों को एक ताकतवर व प्रभुतासंपन्न व्यक्तित्व वालों की छवि में ही प्रस्तुत करता है जबकि उन पर यौन शोषण के इतने आरोप लग चुके हैं इसलिए ही महिलाओं की मी-टू अभियान के बावजूद यथास्थिति ही बनी हुई है।
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