फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Manipur Violence News, Why is Manipur burning a review article on it

मणिपुर हिंसा : क्या अफस्पा का दायरा कम करना बड़ी भूल?

Fri, 05 May 2023 09:15 PM IST
Kunal Verma कुणाल वर्मा
Updated Fri, 05 May 2023 09:15 PM IST
सार

मणिपुर के कई क्षेत्रों में अफस्पा के हटने के बाद सरकार विरोधी ताकतों का मनोबल बढ़ चुका था। ऐसे में जिस क्षेत्र को शांत मान लिया गया था वहां हिंसा की एक चिंगारी ने भयानक आग का रूप ले लिया। रूप भी ऐसा कि चौबीस घंटे के अंदर केंद्र सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ गया।

विज्ञापन
Manipur Violence News, Why is Manipur burning a review article on it
मणिपुर में हिंसा की आग - फोटो : Twitter

विस्तार

मणिपुर का इतिहास हिंसा की आग में घिरे रहने का है। इस आग में हमारे पड़ोसी देश भी समय-समय पर घी डालते रहते हैं। ताजा हिंसा के प्रत्यक्ष कारणों में भले ही मैतेई समुदाय से जुड़ा मामला दिख रहा हो, लेकिन तमाम अन्य कारणों की अनदेखी भी नहीं की जा सकती है। सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि क्या केंद्र सरकार ने जल्दबाजी में मणिपुर के अधिकतर क्षेत्रों को सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा) के दायरे से अलग निकालकर ऐतिहासिक भूल कर दी है?

विज्ञापन


लंबे समय बाद किसी राज्य में हिंसा के मद्देनजर प्रदर्शनकारियों को देखते ही गोली मारने का आदेश यह बताने के लिए काफी है कि मणिपुर की हिंसा कोई सामान्य हिंसा नहीं है। एके-47 से गोलीबारी से लेकर पल-भर में सैकड़ों घरों को आग के हवाले कर देना किसी सुनियोजित साजिश का ही हिस्सा है। दुकानों में लूटपाट से लेकर प्रदर्शनकारियों के हाथों में हथियारों का खुलेआम लहराना, उस शासन व्यवस्था को सीधी चुनौती है जिसने मणिपुर को पूरी तरह शांत समझ लिया है।
विज्ञापन


मणिपुर के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की शानदार जीत के बाद से ही पड़ोसी देशों में खलबली मची थी। इस पहाड़ी क्षेत्र में, खासकर म्यांमार और चीन के हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। हाल ही में राज्य सरकार ने जिस तरह वहां के पहाड़ों में गैरकानूनी तरीके से बसे "घुसपैठियों" को निकालने का अभियान चलाया है, उससे विरोध की आग सुलगनी शुरू हो गई थी, जो इस तरह की विध्वंसकारी हिंसा के रूप में सामने आई है।
विज्ञापन
विज्ञापन


पिछले साल और इस साल मणिपुर के कई जिलों को अफस्पा कानून के दायरे से बाहर कर दिया गया है। केंद्र सरकार का मानना है कि मणिपुर अब शांत क्षेत्र में तब्दील होने लगा है ऐसे में इस कानून का महत्व नहीं रह गया है। यह सच है कि मणिपुर के कई क्षेत्रों के लोग अफस्पा कानून को खत्म करने की मांग लंबे समय से करते आ रहे हैं।

चुनाव के दौरान भी यह मुद्दा हावी रहता है, लेकिन इस सच्चाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि वर्ष 2023 के चुनाव में सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में इस कानून को हटाने जैसा वादा नहीं किया गया था। कांग्रेस पार्टी के अलावा क्षेत्रीय दलों ने भी अपने घोषणापत्र में लोगों से वादा किया था कि अगर उनकी सरकार बनती है तो यह कानून हटा दिया जाएगा।

भाजपा के घोषणापत्र से अफस्पा के गायब रहने के बावजूद जिस तरह वहां के लोगों ने भाजपा को समर्थन दिया वह अपने आप में बहुत कुछ बयां करता है। मणिपुर में 53 फीसदी जनसंख्या मैतेई समुदाय की है। इस वक्त प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर करीब 40 विधायक इसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। ऐसे में स्पष्ट है कि अफस्पा कोई चुनावी मुद्दा नहीं था, बल्कि वहां के अधिकतर लोग शांति व्यवस्था को प्राथमिकता में रखते हैं।

अफस्पा हटने के बाद बिगड़ते हालात

मणिपुर के कई क्षेत्रों में अफस्पा के हटने के बाद सरकार विरोधी ताकतों का मनोबल बढ़ चुका था। ऐसे में जिस क्षेत्र को शांत मान लिया गया था वहां हिंसा की एक चिंगारी ने भयानक आग का रूप ले लिया। रूप भी ऐसा कि चौबीस घंटे के अंदर केंद्र सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ गया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सेना और असम राइफल्स के कई बटालियन को मैदान में उतरना पड़ा है। शूट एट साइट के आर्डर जारी करने पड़ गए। करीब नौ हजार लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है।

हिंसा में मरने और घायल होने वालों का आंकड़ा सरकार ने इस आलेख के लिखे जाने तक सार्वजनिक नहीं किया है। डर इस बात का है कि इन आंकड़ों के सामने आने के बाद प्रतिकार हिंसा और अधिक बढ़ सकती है। पर माना जा रहा है कि ताजा हिंसा में मैतेई समुदाय के लोग काफी संख्या में हताहत हुए हैं।

Manipur Violence News, Why is Manipur burning a review article on it
केंद्र सरकार को अफस्पा की तरफ फिर से देखना वक्त की जरूरत तो नहीं? - फोटो : ANI

पूर्वोत्तर में हिंसा का पुराना इतिहास रहा है। 1950 से अलगाववाद और हिंसा की जो आग सुलगी वो कई बार सेनाओं और सुरक्षाबलों की सख्ती की बदौलत ठंडी जरूर पड़ी, लेकिन अंदर ही अंदर सुलगती रही है। इसे सुलगाने में पड़ोसी देशों की भूमिका पर भी सवाल उठते रहे हैं। इसी कारण अफस्पा को कई राज्यों में लागू किया गया था।

अफस्पा हटाने के पीछे तर्क दिया जाता है कि जिन क्षेत्रों में हिंसा में कमी आई या हिंसा बंद हो गई वहां से इसे हटा लिया गया। 1980 के दशक में मिजोरम से इस कानून को पूरी तरह हटा दिया गया था। वहीं त्रिपुरा से 2015 और मेघालय से 2018 में इसे पूरी तरह हटा लिया गया था। इन तीनों राज्यों से कानून हटाने के पीछे वैध कारण थे और निश्चित तौर पर इन राज्यों में अलगाववाद की आग पूरी तरह बुझ चुकी है।

पर मणिपुर में परिस्थतियां दूसरे तरह की थी। भौगोलिक दृष्टि से भी यहां के हालात अन्य राज्यों से अलग हैं। ड्रग्स की आगोश में पूरा प्रदेश घिरा हुआ है। हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह ने भी मणिपुर दौरे के दौरान बड़ा बयान दिया था कि जल्द ही प्रदेश को ड्रग्स मुक्त कर दिया जाएगा। राज्य सरकार ने भी हाल के दिनों में बड़ा अभियान छेड़ रखा है। सरकार अफीम की खेती को नष्ट कर रही है। माना जा रहा है कि इसकी मार म्यांमार के अवैध प्रवासियों पर भी पड़ रही है।

ये अवैध प्रवासी प्रदेश की कुकी-जोमी जनजाति से ताल्लुक रखते हैं। सरकार इन्हें सरकारी जमीन पर अफीम की खेती करने से रोक रही है और इनकी पहचान कर रही है। जंगलों में बसे अवैध प्रवासियों को बाहर निकालने की राज्य सरकार की कार्रवाई से सरकार विरोधी संगठन नाराज थे। ऐसे में हाईकोर्ट के निर्देश के बाद मैतेई समुदाय को अनुसूचित-जनजाति में शामिल करने की राज्य सरकार की पहल ने विरोधी संगठनों को एक मौका दे दिया।

मैतेई समुदाय का बड़ा हिस्सा हिन्दू है और बाकी मुस्लिम। प्रदेश के जिन 33 समुदायों को जनजाति का दर्जा मिला है, वे नगा और कुकी जनजाति से हैं। इन दोनों जनजातियां के लोग मुख्य रूप से ईसाई हैं। राज्य की अनुसूचित जनजाति समूहों को ही पहाड़ों में जमीन खरीदने और बसने का अधिकार है। ऐसे में सरकार के ताजा प्रयासों के बाद अगर मैतेई समुदाय को एसटी वर्ग में शामिल कर लिया गया तो उन्हें भी पहाड़ों में जमीन खरीदने का अधिकार मिल जाएगा।

राज्य सरकार सहित केंद्र सरकार भी इस सच्चाई से अच्छी तरह रूबरू थी कि वहां मैतेई समुदाय के साथ नगा और कुकी जनजातियों के रिश्ते किस तरह से हैं। ऐसे में अगर दो बड़े अभियान (ड्रग्स और एसटी कानून) चलाए जाने की रूपरेखा पहले से तैयार थी तो प्रदेश के अधिकतर इलाकों से अफस्पा जैसे सशक्त कानून को हटाने की जल्दी क्यों थी?

ऐसा तो होगा नहीं कि सरकार के पास विरोध और हिंसा के इनपुट नहीं रहे होंगे। फिर सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों को क्यों नहीं परखा गया। विरोधी ताकतें हिंसा के दौरान जिस तरह से घातक हथियारों से लैस थी उसने कई सवालों को जन्म दे दिया है।

पूर्वोत्तर में उग्रवाद के पीछे चीन?

पूर्वोत्तर में चीन द्वारा उग्रवाद को बढ़ावा देने की तमाम संभावना हमेशा से मौजूद रही है। मणिपुर सहित पूर्वोत्तर में विद्रोही संगठनों के म्यांमार में अराकान आर्मी और यूनाइटेड व स्टेट आर्मी जैसे सशस्त्र समूहों के साथ संबंध हैं, जहां से चीनी हथियार पूर्वोत्तर में अपना रास्ता तलाशते रहे हैं। कई रिपोर्ट में यह बात भी सामने आ चुकी है कि चीन ने पूर्वोत्तर के उग्रवादी नेताओं को सुरक्षित आश्रय भी प्रदान किया है। इसमें यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के कमांडर परेश बरुआ और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (आईएम) के फंटिंग शिमरंग शामिल हैं।

अलगवावादी संगठनों का यह इतिहास रहा है कि वो किसी स्थानीय मुद्दे की आड़ लेकर अपने हित साधने में लगे रहते हैं। ऐसे में मणिपुर की ताजा हिंसा की यह आग जल्द बुझने की संभावना कम है। ऐसे में केंद्र सरकार को अफस्पा की तरफ फिर से देखना वक्त की जरूरत तो नहीं? 


----------------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed