मालेगांव धमाके पर फैसला: कांग्रेस की भगवा विरोधी साजिश पर सत्य की विजय
- वर्षों तक आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता कहने वाली कांग्रेस ने इस मामले में हिंदू धर्म को आतंक से जोड़ दिया जो कि एक सोची समझी साजिश का हिस्सा था।
- एनआईए अदालत के निर्णय ने कांग्रेस द्वारा स्थापित की गई भगवा आतंकवाद की दूषित एवं झूठी अवधारणा की साजिश का पर्दाफाश कर दिया है।
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मालेगांव धमाके पर एनआईए अदालत के निर्णय ने कांग्रेस द्वारा स्थापित की गई भगवा आतंकवाद की दूषित एवं झूठी अवधारणा की साजिश का पर्दाफाश कर दिया है। वर्षों तक ‘सांप्रदायिक तुष्टिकरण’ की राजनीति में लिप्त रहकर कांग्रेस ने मालेगांव मामले को एक अवसर की तरह देखा और जबरन सनातन को आतंकी विमर्श में से घसीटा। इस षड्यंत्र का शिकार सिर्फ साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित जैसे निर्दोष लोग ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण हिंदू समाज बना क्योंकि कांग्रेस ने जानबूझकर भगवा आतंकवाद का झूठा विमर्श गढ़ कर सनातन को इस मामले का दोषी ठहराने की कोशिश की।
वर्षों तक आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता कहने वाली कांग्रेस ने इस मामले में हिंदू धर्म को आतंक से जोड़ दिया जो कि एक सोची समझी साजिश का हिस्सा था। सनातन, हिंदू और भगवा को बदनाम करने की एक साजिश को सफल करने के लिए कांग्रेस ने हरसंभव कदम उठाया। कांग्रेस नेताओं के बयानों से लेकर जांच में की जा रही गड़बड़ी तक यही प्रयास किया गया कि इस एक मामले पर सिर्फ बहुसंख्यक समाज के धर्म को बदनाम किया जाए।
न्यायालय का यह निर्णय शाश्वत सत्य सनातन पर किए गए प्रतिशोधात्मक वैचारिक आक्रमण का विध्वंसात्मक प्रत्युत्तर है। भगवा, जो त्याग, तप और राष्ट्रनिर्माण का प्रतीक है, जिसे बदनाम करने के लिए दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं ने मिथ्या आख्यान रचे, आज उसी भगवा की गरिमा पुनः स्थापित हुई है, यह प्रमाण है कि राजनीतिक प्रपंच सत्य को दीर्घकाल तक पराजित नहीं कर सकते।
मालेगांव धमाका केस-2008
महाराष्ट्र के मालेगांव के भीकू चौक पर 29 सितंबर 2008 को हुए बम धमाके की स्थानीय पुलिस ने जांच शुरू की, फिर मामला एटीएस और अंततः एनआईए के पास गया। धमाके में प्रयुक्त मोटरसाइकिल का संबंध प्रथमदृष्टतया साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर से जोड़कर उन्हें बिना किसी प्रमाण के आरोपी बना दिया गया, जबकि फॉरेंसिक रिपोर्ट में स्पष्ट था कि गाड़ी के इंजन और चेसिस नंबर मिटाए गए थे।
वोटबैंक के तुष्टिकरण के लिए लालायित हो चुकी कांग्रेस ने यहीं से भगवा आतंकवाद का कुत्सित नैरेटिव गढ़ना शुरू किया। तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने मामले को भगवा आतंकवाद का प्रकरण बताया और यही बयान कांग्रेस के सनातन-विरोधी वैचारिक एजेंडे की उद्घोषणा थी जिसके तहत कांग्रेस ने पूरे हिंदू समाज को एक दुर्भाग्यपूर्ण संदेह के घेरे में खड़ा करने की कोशिश की।
- कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने इसमें और दो कदम आगे बढ़ते हुए एक किताब विमोचन कार्यक्रम में कह दिया कि भगवा आतंकवाद की असल जड़ आरएसएस की विचारधारा है। इतना ही नहीं, उन्होंने शहीद एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे के नाम का दुरुपयोग कर इस विमर्श को स्थापित करने की कोशिश की, जो एक शहीद का अपमान था।
- कांग्रेस सांसद सुरेश कलमाड़ी ने भी बिना किसी जांच के तत्काल यह कह दिया कि यह धमाका हिंदू कट्टरपंथियों ने किया है। कांग्रेस सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर जांच को तो प्रभावित कर ही रही थी लेकिन साथ इस तरह के बयान देकर सनातन को भी कलंकित करने के विमर्श को स्थापित करने के कुत्सित प्रयास कर रही थी। राहुल गांधी भी इस एजेंडे से पीछे नहीं रहे। उन्होंने अमेरिकी राजनयिकों से मुलाकात में यह तक कह दिया कि हिंदू कट्टरपंथी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से भी बड़ा खतरा हैं।
पूर्व गृह मंत्री सुशील शिंदे ने तो यहां तक कह दिया कि बीजेपी और आरएसएस आतंकवादी ट्रेनिंग कैंप चला रहे हैं, जिनसे भगवा आतंकवाद से जुड़े लोग निकलते हैं। यह सीधा राजनीतिक हमला था, जिसमें राष्ट्रवादी संगठनों को आतंकी संगठन बताने की कोशिश की गई। कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद ने भी कहा कि भगवा आतंकवाद के दोषियों को सजा मिलनी चाहिए, जबकि न तो उस समय दोष सिद्ध हुए थे और न ही जांच पूरी हुई थी।
इतना ही नहीं, एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने भी साध्वी प्रज्ञा और अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हिंदू आतंकवाद को भी संविधान की नजरों में समान रूप से देखा जाना चाहिए। इन सभी बयानों का उद्देश्य एक ही था। हिंदू धर्म, उसके प्रतीकों और परंपराओं को आतंकवाद से जोड़ना और एक समुदाय विशेष का तुष्टीकरण करना।
कांग्रेस ने ‘भगवा’ को आतंक का रंग सिद्ध करने के लिए सरकारी मंच, अंतरराष्ट्रीय मंच और न्यायिक प्रक्रिया, हर स्तर पर दबाव बनाया। इससे बड़ा वैचारिक अपराध कोई दूसरा नहीं हो सकता।
मालेगांव बम विस्फोट की जांच में जो सबसे बड़ा सत्य शुरू में सामने आया था, वह कांग्रेस और उसके समर्थकों द्वारा जानबूझकर दफन कर दिया गया। सबसे पहली गिरफ्तारी सिमी के आतंकवादियों की हुई थी, और उन आतंकियों ने अपने बयान में मालेगांव बम धमाकों में संलिप्तता स्वीकार भी की थी। इतना ही नहीं, जिन स्थानों पर विस्फोटक तैयार किए गए थे, वहां की सॉइल टेस्टिंग और फॉरेंसिक रिपोर्ट्स में भी यह सिद्ध हो गया था कि उसी जगह विस्फोटक सामग्री को असेम्बल किया गया था।
फिर भी, इस वैज्ञानिक और स्वीकारोक्ति आधारित साक्ष्य को एक साजिश के तहत मिटा दिया गया और इसकी जगह एक वैकल्पिक, मनगढ़ंत कथा गढ़ी गई, जिसमें साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित, रमेश उपाध्याय और सुधाकर चतुर्वेदी आदि के नाम शामिल कर दिए गए। यह केवल जांच में चूक नहीं थी, यह योजनाबद्ध वैचारिक अपराध था।
ठीक यही पैटर्न समझौता एक्सप्रेस बम कांड में भी देखने को मिला। लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी सफदर नागोरी ने अपने नार्को एनालिसिस टेस्ट में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था कि समझौता एक्सप्रेस धमाका पाकिस्तान प्रायोजित इस्लामिक आतंकवाद का हिस्सा था। लेकिन इस नार्को स्टेटमेंट को जांच एजेंसियों ने दबा दिया और स्वामी असीमानंद को गिरफ्तार कर हिंदू आतंकवाद की नई स्क्रिप्ट लिख दी गई। इन दोनों मामलों में पैटर्न एक जैसा था।
पहले इस्लामिक आतंकवादियों की गिरफ्तारी, फिर वैज्ञानिक व स्वीकारोक्ति-आधारित साक्ष्य, फिर राजनीतिक दखल और फिर हिंदू प्रतीकों को आरोपी बनाने की कोशिश। यह सिद्ध करता है कि कांग्रेस का उद्देश्य सच्चाई खोजना नहीं, ‘हिंदू आतंकवाद’ का झूठा नैरेटिव गढ़ना था। ये घटनाएं यह प्रमाणित करती हैं कि कांग्रेस ने सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए आतंकवाद जैसे गंभीर विषय पर सांप्रदायिक विभाजन का बीज बोना था।
राष्ट्र निर्माण समर्पित संगठनों को बदनाम करने की साजिश
फैसला आने के बाद जांच में शामिल रहे अधिकारी महबूब मुजावर के खुलासों ने अधिक स्पष्टता से बताया कि कांग्रेस का एकमात्र उद्देश्य इस हमले की आड़ में सनातन, हिंदू और राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित संगठनों को बदनाम करना था क्योंकि यही संगठन उसके वोटबैंक तुष्टिकरण के एजेंडे के आड़े आ रहे थे। महबूब मुजावर ने स्पष्ट रूप से कहा कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जांच एजेंसियों पर दबाव बनाया कि आरएसएस प्रमुख श्री मोहन भागवत को इस केस में फंसाया जाए। यह बयान दिखाता है कि कांग्रेस अपने षड्यंत्र को सफल बनाने के लिए सिर्फ झूठे बयान देने तक ही नहीं बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं को तोड़ने तक नीचे गिर गई थी।
कांग्रेस की राजनीति हमेशा से वोटबैंक के इर्द-गिर्द घूमती रही है। वह रामसेतु को काल्पनिक कहती है, श्रीराम के अस्तित्व पर सवाल उठाती है, कांवड़ियों को गुंडा कहती है और भगवा वस्त्रधारियों को आतंकी बताती है। साध्वी प्रज्ञा जैसी सन्यासी को बिना सबूत जेल में डाल दिया गया। कर्नल पुरोहित जैसे सम्मानित सैन्य अधिकारी को आतंकवादी बताकर राष्ट्रभक्ति की परिभाषा को ही कलंकित किया गया।
कांग्रेस ने जांच एजेंसियों पर दबाव डालकर मनचाहे आरोप और बयान दिलवाए, जिससे पूरा मामला एक राजनीतिक एजेंडे में बदल गया। लेकिन अंततः सत्य की जीत हुई। 2019 में साध्वी प्रज्ञा ने कांग्रेस को उसके ही गढ़ भोपाल में हराकर संसद में प्रवेश किया, यह जनमत की निर्णायक प्रतिक्रिया थी।
कांग्रेस को हिन्दू समाज से न केवल परहेज है, बल्कि घृणा है। ‘भगवा आतंकवाद’ कांग्रेस की हिन्दू विरोधी मानसिकता और तुष्टिकरण आधारित राजनीति की ही उपज थी। यही कारण है कि यह फैसला केवल आरोपियों की नहीं, बल्कि पूरे सनातन की विजय है।
मालेगांव केस में अदालत का फैसला प्रमाण है कि कितनी भी बार झूठ बोला जाए, सत्य एक दिन सामने आता ही है। कांग्रेस अभी भी अपने पापों को स्वीकार नहीं करेगी और अपने हिन्दू विरोधी एजेंडे में अड़ी रहेगी। लेकिन देश ने देख लिया है कि भगवा आतंकवाद एक कुत्सित, झूठा और खतरनाक षड्यंत्र था जिसका उद्देश्य देश में सामाजिक वैमनश्य फैलाना था। अब कांग्रेस को उस विमर्श नैरेटिव को हमेशा के लिए तिलांजलि देनी ही पड़ेगी जो उसने सत्ता के लोभ में रचा था।
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