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यह बीजेपी की हार है, कांग्रेस की जीत नहीं

Thu, 24 Oct 2019 06:13 PM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Thu, 24 Oct 2019 06:13 PM IST
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मनोहर लाल खट्टर, भूपेंद्र हुड्डा, देवेंद्र फडणवीस, शरद पवार - फोटो : Facebook

यह तो होना ही था। दोनों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी के लिए लोकसभा चुनाव के बाद यह पहली बड़ी परीक्षा थी। कांग्रेस क्या हासिल करेगी,इसमें किसी की अधिक दिलचस्पी नहीं थी। इसलिए परिणाम बहुत चौंकाने वाले नहीं कहे जा सकते। हरियाणा में मतदाताओं ने सत्ता की चाबी बीजेपी को नहीं सौंपी है।

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सरकार बनाने के लिए उसे दुष्यंत चौटाला की मेहरबानी पर निर्भर रहना होगा और दुष्यंत साफ़ कह चुके हैं कि वे राज्य में बदलाव चाहते हैं ।इसी तरह महाराष्ट्र में बीजेपी अपनी सहयोगी शिवसेना पर निर्भर रहेगी। बीते वर्षों में शिवसेना ने बहुत खून के घूंट पिए हैं। अब उद्धव ठाकरे के लिए बीजेपी से यह कहने का अवसर है कि वे वही व्यवहार पसंद करेंगे ,जो एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है।

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हरियाणा में किसकी सरकार! - फोटो : Amar Ujala

असल में दोनों राज्यों में बीजेपी ने अपना प्रचार अभियान एक सुविधाजनक आधार से शुरू किया था। यह आधार लोकसभा चुनाव की जीत का था। प्रादेशिक इकाइयों व क्षत्रपों की आदत अब राष्ट्रीय नेतृत्व और प्रधानमंत्री नरेन्द्रमोदी के सहारे वैतरणी पार करने की हो गई है। काफ़ी हद तक इसका फ़ायदा मिला,लेकिन स्थानीय नेटवर्क और चेहरों के आभामंडल की उपेक्षा जायज़ नहीं ठहराई जा सकती।

बेशक सितारों की अपनी चमक होती है मगर आप जुगनुओं को दर किनार नहीं कर सकते। इसमें संदेह नहीं कि महाराष्ट्र में देवेन्द्र फड़नवीस ने पांच साल तक अपनी छवि पर आंच नहीं आने दी है,मगर इस बार शिवसेना अलग अंदाज़ में नज़र आ रही है। बीजेपी के साथ रहते हुए भी वह आक्रामक तेवर अपनाएगी। परंपरा तोड़ते हुए ठाकरे परिवार अगर चुनाव मैदान में कूदा है तो इसका मतलब कोई परदे में नहीं छिपा है। ज़ाहिर है अगले पांच बरस दोनों दलों के लिए बहुत आसान नहीं होंगे।

हरियाणा में तो स्लेट पर इबारत साफ़ लिखी थी।मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने ख़ुद ही अपनी राह में कांटे बिछाए थे। हरियाणा के मतदाता एकदम अलग ढंग से व्यवहार करते हैं। खट्टर इसे नहीं समझ सके। पूरे पांच साल वे एक दंभी मुख्यमंत्री बने रहे। दूसरी ओर कांग्रेस ने पिछले चुनाव में धोबी घाट की पटखनी खाई थी। उस पराजय के बाद अध्यक्ष समेत समूची पार्टी काफ़ी समय तक सदमें से उबर नहीं सकी। इसका असर तैयारियों पर भी पड़ा। कामचलाऊ अध्यक्ष के तौर पर सोनिया गांधी ने कम समय में ही मुर्दा पड़ी पार्टी में जान फूंकने का काम किया है ।

दोनों ही प्रदेशों में कांग्रेस का प्रचार अभियान बिखरा बिखरा और अव्यवस्थित रहा। शिखर नेता आधे अधूरे मन से रैलियों में गए। राज्य सरकारों की विफलताओं का कोई लेखा जोखा तैयार नहीं था।  यदि लोकसभा कि तरह ही इन चुनावों को पार्टी ने लिया होता तो संभव है कि परिणाम कुछ और होते । यह भी पार्टी के लिए एक सबक है।  अनमने ढ़ंग से  चुनाव लड़ने के बावजूद उनकी अंकसूची में अच्छे प्राप्तांक हैं। मगर ध्यान रखिए कि यह बीजेपी की हार है। कांग्रेस की जीत नहीं।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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