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महाराष्ट्र सरकारः आखिर कौन है असली ‘गेम चेंजर’?

Sat, 23 Nov 2019 06:09 PM IST
Atul sinha अतुल सिन्हा
Updated Sat, 23 Nov 2019 06:09 PM IST
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महाराष्ट्र की राजनीति में 23 नवंबर का दिन इतिहास बन गया। - फोटो : Amar Ujala
अब आप इसे महाराष्ट्र के लिए काला शनिवार कहिए, लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने वाली बेशर्म घटना का नाम दीजिए या फिर अमित शाह की गुगली मान लीजिए, लेकिन जब पूरी सियासत में मोहरे ही इस तरीके से फिट किए गए हों, तो खेल रातोंरात क्या चंद घंटों या चंद मिनटों में भी बदल सकता है।
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नतीजे आने के एक महीने तक की उठा-पटक, आगे-पीछे, जोड़तोड़, खरीद फरोख्त की कसरतें, लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहानेबाजियां, इस एक महीने में महाराष्ट्र ने वो सबकुछ देख लिया जिसके बारे में महाराष्ट्र की जनता ने तो कम से कम कभी सोचा नहीं होगा। 
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बहरहाल, अब इसपर बहसें होती रहेंगी और मायने निकाले जाते रहेंगे, लेकिन हकीकत यही है कि देवेन्द्र फड़नवीस को ताज फिर से मिल गया है।

एक हफ्ते का वक्त है और 30 नवंबर तक बहुमत साबित करने के लिए उन्हें अपने गणित को दुरुस्त करना है। सरकार रहती है या गिरती है, शरद पवार अपनी बात के कितने पक्के हैं, भतीजे को आगे करके क्या उन्होंने सचमुच कोई बड़ा गेम खेला है या फिर कांग्रेस के साथ अपनी दोस्ती की नैतिकता और भाजपा विरोध की अपनी सियासी रणनीति पर वो कायम रहेंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।
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भाजपा के लिए चुनौती होगी बहुमत साबित करना। - फोटो : Amar Ujala
चुनाव से ठीक पहले मुंबई में जब कांग्रेस के एक दिग्गज नेता से मुलाकात हुई तो निराशा साफ झलक रही थी। कांग्रेस की अंदरुनी स्थितियों और खींचतान से परेशान अपने अस्तित्व बचाने की जंग में जुटे इन नेताजी का झुकाव भी भाजपा की तरफ दिख रहा था। उनके कई काम धंधे और करोड़ों के कारोबार के लिए भाजपा एक सेफ ज़ोन नज़र आ रही थी, लेकिन नतीजे आते ही उनका उत्साह फिर देखने लायक था।

खासतौर से तब जब शिवसेना से भाजपा का नाता टूट गया। लेकिन अचानक रातोंरात बदले समीकरण और भाजपा के फिर से सत्ता पर कब्जे के बाद नेताजी फिर निराश हो गए और गेम प्लान के साथ-साथ भाजपा की दादागिरी से कुछ दबे से नज़र आए।

इस वाकये को बताने का मकसद सिर्फ ये है कि कांग्रेस जिस उहापोह की स्थिति में पहुंच चुकी है और केन्द्र में मोदी की धमाकेदार वापसी के बाद से जिस अनिर्णय की स्थिति में वह लगातार दिखाई दे रही है, उससे साफ है कि महाराष्ट्र क्या, आने वाले वक्त में उसके लिए अपने हाथ आए राज्यों को बचाना भी आसान नहीं है। भाजपा के चाणक्य भीतर ही भीतर क्या खेलते हैं, कौन सी व्यूह रचना करते हैं और अपने खिलाफ खड़े नेताओं को कौन सा डर दिखाते हैं, ये सबके सामने है। चाहे उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह और मायावती को ले लीजिए या अब महाराष्ट्र में शरद पवार या अजित पवार को।

 

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महाराष्ट्र - फोटो : self
मनी लांड्रिंग के खेल में चिदंबरम साहब भीतर हैं तो कोई और न हो ऐसा कैसे हो सकता है। याद कीजिए कि ईडी ने शरद पवार और अजित पवार को 25 हजार करोड़ की मनी लांड्रिंग का नोटिस कब भेजा था। चुनाव से ठीक पहले। भाजपा को मालूम था कि शिवसेना उसके साथ धोखा कर सकती है। इसके लिए उसने दूसरा रास्ता खोलना पहले से ही शुरू कर दिया था।

कांग्रेस को लेकर भाजपा पहले से ही आश्वस्त रहती है कि अब वहां कोई फैसला इतनी आसानी से नहीं होने वाला। जिस पार्टी का कोई मुखिया न हो, जिसकी आवाज़ गुम हो गई हो और जो खुद अभी तय नहीं कर पा रही कि उसे करना क्या है, ऐसे में भाजपा की सारी रणनीति कांग्रेस को पूरे निश्चिंत भाव से किनारे रखकर बनती है।

महाराष्ट्र में भी उसने 24 अक्टूबर के बाद से लगातार कांग्रेस के ढुलमुल रवैये को देखा। लेकिन जब शुक्रवार शाम को शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के बीच बात एकदम से बनती दिखी तो भाजपा ने अपना आखिरी पांसा फेंका और अजित पवार को तोड़कर साम-दाम-दंड-भेद की अपनी रणनीति के तहत सरकार बनवा ली।

बाल ठाकरे के भतीजे राज ने जिस तरह पार्टी तोड़ दी, कुछ वैसा ही एनसीपी में होता दिख रहा है। यहां भी चाचा-भतीजा कम से कम अभी तक आमने सामने दिख रहे हैं। कांग्रेस अब भी इसी दुविधा में है कि शिवसेना के साथ जाए या न जाए। बैठक पर बैठक हो रही है। वक्त भागता जा रहा है। अलग-अलग प्रेस कांफ्रेंस हो रही है। अब भी एक साथ मंच शेयर करने में मुश्किलें आ रही हैं। ऐसे में सरकार कैसे चलेगी। कांग्रेस अब तक ये नहीं पचा पा रही कि भाजपा-शिवसेना में कोई फर्क है। ऐसे में हमेशा से पवार को ही गेम चेंजर माना जा रहा था। लेकिन बड़े पवार परदे के पीछे ही रह गए और छोटे पवार ने गेम चेंज कर दिया।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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