फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   maharashtra assembly election 2019 political challenges in front of bjp and cm devendra fadnavis

कहीं महाराष्ट्र ना निकल जाए भाजपा के हाथों से? ऐसे घिरे हैं सीएम देवेन्द्र फडणवीस

Thu, 13 Dec 2018 04:26 PM IST
Updated Thu, 13 Dec 2018 04:26 PM IST
विज्ञापन
maharashtra assembly election 2019 political challenges in front of bjp and cm devendra fadnavis
महाराष्ट्र में भी आगामी चुनाव को लेकर सुगबुगाहट तेज होने लगी है। - फोटो : File Photo

मध्यप्रदेश और राजस्थान सहित छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अपनी खोयी जमीन हासिल कर सरकार बनाने की तैयारी कर रही है। तीनों ही राज्यों में सीएम का चेहरा सामने आने में अभी समय लगेगा। लेकिन इस बात में कोर्इ दो राय नहीं कि भाजपा के हाथों से इन तीनों ही राज्यों की सत्ता चले जाने का असर अब 2019 के चुनावों में नजर आने वाला है। यही वजह है कि मध्यप्रदेश के पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र में भी आगामी चुनाव को लेकर सुगबुगाहट तेज होने लगी है। बता दें कि राज्य में सितंबर 2019 में चुनाव होने हैं। 

विज्ञापन


5 राज्यों के ताजा परिणाम भाजपा के लिए खतरे की घंटी की तरह है और ऐसे में पार्टी बहुत कुछ ऐसा करना चाहेगी कि राज्य की सत्ता फिर से उसके पास लौटे। सूत्रों की मानें तो पार्टी ने आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू भी कर दी है। जाहिर है भाजपा हर कदम फूंककर रखना चाहती है। भाजपा की कोशिश है कि पार्टी फडणवीस सरकार के पांच साल की उपलब्धियों को जनता के बीच लेकर जाएगी।
विज्ञापन


दरअसल, भाजपा की कोशिश है कि सीएम देवेन्द्र फडनवीस की अगुवाई में सियासी पिच पर मैच खेले और फडणवीस की बेदाग और कामकाजी छवि को भुनाने का प्रयास किया जाए। बता दें कि देवेन्द्र फडणवीस युवा सीएम होने के अलावा विदर्भ के बड़े नेताओं में एक माने जाते हैं, जो राज्य में पार्टी के बड़े स्टार प्रचारक हो सकते हैं। 

विज्ञापन
विज्ञापन

maharashtra assembly election 2019 political challenges in front of bjp and cm devendra fadnavis
राज्य में लगातार हुए किसान आंदोलनों से फडणवीस सरकार पर दबाव बढ़ा है। - फोटो : File Photo

किसान आंदोलन बढ़ा रहा सिरदर्द 
इधर राज्य में लगातार हुए किसान आंदोलनों से फडणवीस सरकार पर दबाव बढ़ा है। मराठवाड़ा और विदर्भ के किसान तो पानी के संकट से जूझ ही रहें लेकिन इस बार सरकार को उत्तर पश्चिम के किसानों ने भी घेरा है। सरकार की कोशिश होगी कि वे किसानों के अंसतोष का फायदा विपक्षियों को ना लेने दे और वोटर्स पर इसका असर ना पड़े। खास बात यह है कि राज्य के किसान आंदोलन ने एनसीपी और कांग्रेस के बीच आई दरार को भरने का काम किया है। दोनों ही पार्टियां 2019 के लोकसभा चुनावों को साथ लड़ने का फैसला कर चुकी हैं। 

दलित भी हैं नाराज 
उधर दूसरी ओर भीमा कोरे गांव की घटना के बाद से ही राज्य सरकार से दलित नाराज हैं। इस जातीय हिंसा से जहां राज्य सरकार को पूरे देश में घेरा गया था, वहीं राज्य का दलित समुदाय भाजपा से अब भी नाराज है जबकि विपक्षी दल कांग्रेस, एनसीपी, बीएसपी और यहां तक कि एसपी भी इस मामले को लेकर सरकार पर हमलावर रही है। बता दें कि राज्य की 288 विधानसभा सीटों में से तकरीबन 10 फीसदी से ज्यादा दलित वोटर्स हैं और एक तरह से 60 सीटों पर दलित मतदाता अपना अहम रोल प्ले करते हैं। वैसे इस बात में भी कोई दो राय नहीं कि ये 60 सीटें लोकसभा चुनाव में भाजपा को प्रभावित कर सकती हैं। 

हर मामले से अपनी तरह से निपटे हैं फडणवीस 
हालांकि बड़े से बड़े मामले को भी फडणवीस ने अपने तरीके से हल किया है। यही वजह है कि कई मामलों में सीएम के फैसले विपक्ष पर भारी पड़ते दिखाई दिए हैं। किसानों के सबसे बड़े आंदोलन को मुख्यमंत्री ने आश्वासन देकर मुंबई में शांत कराया था जबकि कर्जमाफी की घोषणा के बाद किसानों का आक्रोश कुछ कम करने में सफलता मिली।

हालांकि विदर्भ में किसानों की आत्महत्या अब भी गले की फांस बनी है। इसके अलावा फडणवीस ने कुछ मुद्दों पर मास्टर स्ट्रोक लगाया है। 80 के दशक में मराठा आरक्षण की मांग करते हुए कर्मचारियों के नेता अन्ना साहेब पाटिल की भूख हड़ताल के दौरान जान चली गई थी। इसके बाद जब फडणवीस सरकार के समय मुद्दा उठा, तो उन्होंने आंदोलन के बाद कहा था कि वो समाज को गिफ्ट देंगे। सरकार ने विधेयक लाकर उसे विधानमंडल में पास कराया। बड़ा दांव खेलकर मराठाओं को नौकरी और शिक्षा में 16 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला लिया गया।

हालांकि आरक्षण भाजपा के लिए एक नई मुसीबत बनता नजर आ रहा है। मराठा आरक्षण के साथ ही दूसरे समाज भी रिजर्वेशन की मांग कर रहे हैं वहीं अलग-अलग जातियों के आंदोलन से न निपट पाना सरकार के सामने अड़चन खड़ी कर सकता है। इन आंदोलनों में मुस्लिम, धनगर, जैसे कई वर्गों के साथ लाना और उनसे निपटना फडणवीस के लिए नई चुनौतियां हैं।     

maharashtra assembly election 2019 political challenges in front of bjp and cm devendra fadnavis
भाजपा चाहेगी कि राज्य में चुनाव लड़ते समय पार्टी एनडीए के घटक दलों के प्रति सॉफ्ट नजरिया अपनाए। - फोटो : self

शिवसेना की नाराजगी 
उधर भाजपा चाहेगी कि राज्य में चुनाव लड़ते समय पार्टी एनडीए के घटक दलों के प्रति सॉफ्ट नजरिया अपनाए। विशेष रूप से भाजपा, शिवसेना की तल्खियां दूर सकती हैं। बता दें कि भाजपा ने पिछले चुनावों में पहली बार सबसे ज्यादा 124 सीटें जींती और सीएम पद को लेकर दोनों ही पार्टियों में लंबे समय तक खींचतान चली थी। नौबत पुराना गठबंधन टूटने तक आ गई थी।

बता दें कि चुनाव रुझान आते ही शिवसेना पहले ही बीजेपी को नसीहत दे चुकी है। विपक्ष की भूमिका में नजर आए शिवसेना नेता संजय राउत ने तो यहां तक कह दिया था कि राहुल गांधी तो अब नेता बन चुके हैं। उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को वन मैन आर्मी बताया और कहा कि अब भी वक्त है, बीजेपी को इन परिणामों से सबक लेने की भी जरूरत है। उधर मुंबई में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने चुनाव परिणामों पर खुशी जताते हुए, “फिर कौन होगा विकल्प?” जैसे उठने वाले सवालों को फिजूल करार दिया। 

सीएम देवेंद्र के हैं कई रिकॉर्ड 
बहरहाल, महाराष्ट्र में बीजेपी भले ही पहली बार सत्ता में आई हो, लेकिन देखा जाए तो पूरे 5 साल तक सरकार चलाने में फडणवीस का अच्छा खासा अनुभव रहा है। गठबंधन में शिवसेना के साथ लाख खींचतान के बावजूद फडणवीस अपना कार्यकाल लगभग पूरा करने में सफल रहे हैं। बतौर सीएम वो लगातार रिकॉर्ड बना रहे हैं। पिछले चार सालों में राज्य की 27 महानगर पालिकाओं में भाजपा के सबसे ज्यादा 1097 नगर सेवक चुनकर आए हैं। जबकि सत्ता में भागीदार शिवसेना 487 नगरसेवकों के साथ दूसरे नंबर पर हैं। इसके पहले भी फडणवीस के नाम एक और रिकॉर्ड दर्ज हुआ कि  वे राज्य में ज्यादा दिन तक मुख्यमंत्री पद पर रहने वाले दूसरे सीएम बन गए। उन्होंने दिवंगत विलासराव देशमुख का भी रिकार्ड तोड़ा है।

maharashtra assembly election 2019 political challenges in front of bjp and cm devendra fadnavis
महज 44 वर्ष की उम्र में महाराष्ट्र के 18वें मुख्यमंत्री बने सीएम फडणवीस की राहें इतनी आसान नहीं है। - फोटो : Getty Images

आसान नहीं होगी राहें 
महज 44 वर्ष की उम्र में महाराष्ट्र के 18वें मुख्यमंत्री बने सीएम फडणवीस की राहें इतनी आसान नहीं है। सत्ता में भागीदार शिवसेना कई मुद्दों पर बीजेपी को घेरती रही, कई बार शिवसेना की तरफ से ऐसे तीखे बयान आए, लगा मानों अब गठबंधन टिकेगा भी की नहीं। जबकि इसे शिवसेना की प्रैशर पॉलिटिक्स भी माना जाता है। लेकिन वैचारिक तौर पर बीजेपी ही एक ऐसी पार्टी है, जिसे शिवसेना के करीब कहा जा सकता है। रुख में नर्मी दिखी, तो कभी बीजेपी एक कदम पीछे हटी।

चुनौतियों के बीच मुश्किलें 
बहरहाल, महाराष्ट्र में विपक्ष फडणवीस के सामने कोई खास बड़ी चुनौती नहीं खड़ी कर सका है, एनसीपी-कांग्रेस भले ही साथ-साथ हों, लेकिन इन पार्टियों के मुद्दे भी अपने-अपने हैं। सहयोगी पार्टी शिवसेना की बात करें, तो उसका रुख सरकार के प्रति नरम-गरम रहा है। जैसे चुनाव करीब आ रहे हैं, नाणार परियोजना को लेकर सरकार के खिलाफ आक्रामक रही शिवसेना अब अयोध्या में मंदिर बनाने की बात करने लगी है। लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं कि एमपी, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव परिणामों ने महाराष्ट्र में भाजपा और सीएम फडणवीस दोनों को अलर्ट कर दिया है। देखना यह है कि क्या महाराष्ट्र में भी भाजपा के लिए किसानों की नाराजगी चिंता बढ़ाएगी। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed