मध्य प्रदेश में घमासान, खतरे में कमलनाथ सरकार
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कांग्रेस के 22 बागी विधायकों के अपने इस्तीफे पर अड़े रहने से कमलनाथ सरकार का जाना लगभग तय हो गया है। अब कोई चमत्कार ही उसे बचा सकता है। अदालती कार्रवाई में फंसे होने से विधानसभा में शक्ति परीक्षण होने में कुछ देर भले ही हो रही हो, लेकिन इससे कई संवैधानिक बिंदु निकल कर आ रहे हैं जिनका निदान होना निकट भविष्य में आवश्यक होगा।
लोकतंत्र की प्रक्रिया संवाद पर आधारित है। लेकिन जिस तरह से बागी विधायकों को बेंगलुरु के रिसॉर्ट में रखा गया है और उन्हें उनके परिजनों से भी बात नहीं करने दी जा रहा, वह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। उनके फोन भी बंद कर दिए गए हैं और उन्हें बाहरी दुनिया में किसी से भी बात नहीं करने दी जा रही।
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने वीडियो संदेशों के जरिए बागी विधायकों के खुद के सुरक्षित और अपनी मर्जी से बगावत करने की दलील को साफ खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता यह वीडियो संदेश बिना किसी दबाव के रिकॉर्ड किए गए। कोर्ट ने यह भी माना कि स्पीकर को यह सुनिश्चित करने का अधिकार है कि इस्तीफा देने वाले विधायकों ने बिना किसी दबाव के इस्तीफे दिए हैं। हालांकि कोर्ट ने कमलनाथ को शुक्रवार शाम 5 बजे तक अपना बहुमत साबित करने का निर्देश दिया।
कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों ने अपने अन्य विधायकों को भी क्रमशः राजस्थान और हरियाणा भेज दिया। ताकि दूसरी पार्टी उन्हें लालच या भय दिखाकर तोड़ न ले। राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है और हरियाणा में भाजपा की। वैसे ही जैसे कर्नाटक में भाजपा की सरकार होने के नाते स्थानीय पुलिस का संरक्षण पार्टी को मिला हुआ है। यानी दोनों पार्टियों द्वारा अपने अपने राज्य की पुलिस का इस्तेमाल राजनीतिक हित साधने के लिए किया जा रहा है।
अब बात दल बदल विरोधी कानून की। इस कानून को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान बनाया गया था ताकि राजनीति से आया राम गया राम की संस्कृति खत्म की जा सके। तब इस कानून के तहत पार्टी का विभाजन करने के लिए कम से कम एक तिहाई विधायकों या सांसदों की संख्या जरूरी थी। बाद में इसे और मजबूत करने के लिए एक तिहाई से बढ़ाकर आवश्यक संख्या दो तिहाई कर दी गई। लेकिन कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, मणिपुर, गोवा, अरुणाचल प्रदेश जैसे कई राज्यों में विधायक अपनी सीट से इस्तीफा देकर दूसरी पार्टी में शामिल हो गए और दोबारा चुनाव लड़कर वापस सदन में पहुंच गए। यानी उस विधायक को तो लाभ पहुंचा, लेकिन उस क्षेत्र के लोगों को 5 वर्षों के अंदर दूसरी बार चुनाव का सामना करना पड़ा।
ऐसे में सभी दलों को साथ मिलकर एक बार फिर मंथन करना चाहिए और जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करना चाहिए। यदि कोई विधायक या सांसद अपनी सीट से इस्तीफा देता है तो उसे कम से कम एक वर्ष तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। इस दौरान उपचुनाव हो जाएगा और उस सीट पर कोई दूसरा व्यक्ति चुन लिया जाएगा।
ऐसे में इस्तीफा देने वाले विधायक या सांसद को दोबारा चुने जाने के लिए अगले चुनाव का इंतजार करना होगा। राजनीति की तेजी से सरकती रेत में अगले 3 साल के बाद क्या होगा किसने देखा है। यानी तब इस्तीफा देने की सोचने वाले विधायकों अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता जरूर होगी। उस सीट पर अपनी पत्नी या बेटे को खड़ा कर सीट सुरक्षित रखने की सोचने वालों की भी रोकथाम करने के लिए इस कानून में प्रावधान होना चाहिए कि इस्तीफा देने वाले विधायक के पति पत्नी बेटा या भाई जैसे ब्लड रिलेटिव (निकट संबंधी) भी उपचुनाव में हिस्सा नहीं ले सकते।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर कहते रहे हैं कि बार-बार चुनाव के झंझट से बचने के लिए पूरे देश में एक चुनाव होना चाहिए। वन नेशन वन पोल। विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव एक साथ। लेकिन सरकारों के बनाने और गिराने के खेल में विधायकों के इस्तीफे की वजह से बार-बार उपचुनाव कराने पढ़ रहे हैं। कर्नाटक में 18 तो मध्यप्रदेश में 22। लाभ तो विधायकों और राजनीतिक दलों को होता है लेकिन क्षेत्र की जनता को 5 वर्षों में एक से ज्यादा बार चुनाव क्यों देखना पड़े? उन्हें बार-बार चुनाव का खर्च क्यों उठाना पड़े?
इससे बचने के भी प्रावधान किए जा सकते हैं। यदि कानून में संशोधन कर उपचुनाव पर होने वाले सरकारी खर्च की वसूली भी इस्तीफा देने वाले विधायक या सांसद से की जाए तो शायद दलबदल करने से पहले वे चार बार सोचेंगे।
आखिर किसी भी सांसद या विधायक के चुनाव में उनकी अपनी छवि के अलावा उस पार्टी की भी भूमिका होती है जिसके टिकट पर वे चुनाव लड़ते हैं। कभी कहा जाता था कि कांग्रेस के टिकट पर यदि लैंप पोस्ट को भी खड़ा कर दिया जाए तो इंदिरा गांधी के नाम पर वह भी जीत जाएगा। यही हालत कमोबेश आज नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के चलते भाजपा की है। दल बदल करने वाले जनप्रतिनिधि को निजी तौर पर तो फायदा होता है लेकिन जिस पार्टी के टिकट पर व चुना गया था उसे अवश्य नुकसान होता है। इस प्रक्रिया पर अंकुश लगाए जाने की जरूरत है। इसलिए इस विषय पर राष्ट्रव्यापी बहस छेड़ी जाए और जिन उपायों पर सहमति हो उन्हें कानून का दर्जा दिए जाने में कोई देरी नहीं की जानी चाहिए। आखिर यह पूरे देश की नैतिकता का सवाल है।
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