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मध्यप्रदेश नगरीय और पंचायत चुनाव : बिना ओबीसी आरक्षण के ओबीसी आरक्षण मुद्दे पर होंगे चुनाव

Fri, 13 May 2022 11:15 AM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Fri, 13 May 2022 11:15 AM IST
सार

राज्य में पिछले नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों में ओबीसी को 14 प्रतिशत आरक्षण दिया गया था। लेकिन बीच में सवा साल सत्ता में रही कांग्रेस ने इसे बढ़ाकर 27 फीसदी करने का दावं चला ताकि ओबीसी वोट को कांग्रेस की तरफ खींचा जा सके।  

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Madhya Pradesh Assembly Election 2023 Next elections to be held on OBC reservation issue
मध्य प्रदेश में कुल 378 नगरीय निकाय हैं, जिनमें 16 नगर निगम, 98 नगर पालिकाएं तथा 264 ग्राम पंचायते हैं। - फोटो : Social Media

विस्तार

मध्यप्रदेश में नगरीय निकायों और पंचायतों में पिछड़े वर्ग ( ओबीसी) को ज्यादा आरक्षण को लेकर चली राजनीति और कानूनी दांव पेंच का लुब्बो लुआब यह है कि प्रदेश में अब ये चुनाव बिना ओबीसी आरक्षण के होंगे, लेकिन चुनाव का मुख्य मुद्दा ओबीसी आरक्षण ही होगा। मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वद्ंवी भाजपा और कांग्रेस ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण न दे पाने के लिए एक दूसरे को कोसेंगे। फैसला जनता करेगी कि उसके लिए असली मुद्दा क्या है? ओबीसी आरक्षण, महंगाई, बेरोजगारी या स्थानीय विकास?

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हालांकि ओबीसी आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी मात खाने के बाद शिवराज सरकार ने इस मुद्दे को राज्य में ओबीसी को न्याय दिलाने के संकल्प में तब्दील करने का ऐलान किया है तो विपक्षी कांग्रेस इसे राज्य में ओबीसी हितों की उपेक्षा के रूप में प्रोजेक्ट कर रही है।
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गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में कुल 378 नगरीय निकाय हैं, जिनमें 16 नगर निगम, 98 नगर पालिकाएं तथा 264 ग्राम पंचायते हैं। इसी तरह कुल 23 हजार 59 पंचायतें हैं, जिनमें 51 जिला पंचायतें, 313 जनपद पंचायतें और 22 हजार 525 ग्राम पंचायतें हैं।  

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राज्य में पिछले नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों में ओबीसी को 14 प्रतिशत आरक्षण दिया गया था। लेकिन बीच में सवा साल सत्ता में रही कांग्रेस ने इसे बढ़ाकर 27 फीसदी करने का दावं चला ताकि ओबीसी वोट को कांग्रेस की तरफ खींचा जा सके।  


यही नहीं कांग्रेस ने नगरीय निकायों और पंचायतों का नए सिरे से परिसीमन करने की चाल चली और नगरीय निकायों में महापौर/अध्यक्ष के चुनाव की अप्रत्यक्ष प्रणाली लागू की। इन्हीं बदलावों के चलते कांग्रेस ने नियमानुसार 2019 में होने वाले नगरीय निकाय और पंचायतों के चुनाव टाले और उसके बाद तो उसकी सरकार ही चली गई।


कांग्रेस सरकार और ओबीसी आरक्षण 

खास बात यह रही कि कमलनाथ सरकार ने ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण की घोषणा तो कर दी, लेकिन गजट अधिसूचना जारी नहीं की। यानी उस घोषणा का कानूनी दृष्टि से कोई मतलब नहीं था। उसके बाद कोविड में दो साल निकले। जबकि संविधान के 73 व 74 वें संशोधन के मुताबिक राज्यों को हर पांच साल में नगरीय  निकायों और पंचायतों के चुनाव कराना जरूरी है। इन्हें अधिकतम 6 माह तक टाला जा सकता है। लेकिन राजनीतिक कारणों से मप्र में ये चुनाव करीब ढाई साल टल चुके हैं।
 

अब सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद ये बहुप्रतीक्षित चुनाव जून में होने जा रहे हैं। राज्य निर्वाचन आयुक्त बी.पी.सिंह ने कहा कि चुनाव दो चरणों में होंगे। इनकी अधिसूचना 24 मई तक जारी कर दी जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि नगरीय निकाय चुनाव ईवीएम से और पंचायत चुनाव मतपत्र पद्धति से होंगे। चुनाव प्रक्रिया 30 जून तक सम्पन्न कर ली जाएगी।


इस बीच ओबीसी आरक्षण के सवाल को लेकर कोर्ट में मात खा चुकी मध्यप्रदेश सरकार जनता को समझाने के लिए फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। उसने सर्वोच्च अदालत में सुधारात्मक याचिका दायर की है। हालांकि इससे कोई खास फर्क पड़ेगा, ऐसा नहीं लगता। कानूनी लड़ाई के बरक्स कांग्रेस ने राज्य में ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण न दिला पाने के लिए शिवराज सरकार को कटघरे में खड़ा कर रही है तो जवाब में भाजपा उल्टा चोर कोतवाल को डांटे की तर्ज पर विपक्ष में बैठी कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा रही है।

Madhya Pradesh Assembly Election 2023 Next elections to be held on OBC reservation issue
प्रदेश की शिवराज सरकार द्वारा ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण न दे पाने के मुद्दे पर कांग्रेस अपनी जीत देख रही है। - फोटो : सोशल मीडिया

चुनाव पर कितना होगा असर?

बहरहाल, मप्र में नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों  में ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण न दे पाने का मुद्दा चुनाव में कितना असर डालेगा, यह देखने की बात है। इस मुद्दे का चुनावी लाभ लेने की नीयत से कांग्रेस ने ऐलान कर दिया है कि वो इन चुनावों में 27 फीसदी टिकट पिछड़े वर्ग को देगी।

जवाब में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वी.डी.शर्मा ने कहा कि भाजपा कांग्रेस से ज्यादा टिकट ओबीसी को देगी। ध्यान रहे कि सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय के तहत ओबीसी के लिए अलग से कोई आरक्षण न होने से पिछड़ी जातियों के प्रत्याशियों को टिकट भी सामान्य सीट पर ही देने होंगे। इससे नया घमासान मचने की आशंका है।


कांग्रेस का नजरिया 

प्रदेश की शिवराज सरकार द्वारा ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण न दे पाने के मुद्दे पर कांग्रेस अपनी जीत देख रही है। हालांकि भाजपा इस स्थिति से निराश नहीं है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि इन चुनावों में ‘महाविजय का संकल्प’ दिलाते हुए कहा कि हम ओबीसी व अन्य सभी वर्गों को न्याय देकर आगे बढ़ेंगे।

उन्होंने कांग्रेस को घेरते हुए कहा कि ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस कोर्ट की शरण में इसलिए गई, क्योंकि उसे चुनाव में अपनी पराजय का डर था। उसी के ‘महापाप’ के कारण राज्य में ओबीसी आरक्षण रुका। उन्होंने तो यह भी कहा कि ये भाजपा है, जिसने मप्र को 3-3 मुख्यमंत्री ओबीसी से दिए। खुद शिवराज भी ओबीसी हैं।

सवाल यह कि कौन सी पार्टी ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण न दे पाने का राजनीतिक फायदा उठा पाएगी? दूसरे, यह कि राज्य में ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण का औचित्यपूर्ण आधार क्या है? पहले सवाल का जवाब यह हो सकता है कि संगठनात्मक दृष्टि भाजपा कांग्रेस की तुलना में बहुत ज्यादा मजबूत और फोकस्ड है।

उसका प्रचार और दुष्प्रचार तंत्र भी कांग्रेस के मुकाबले बहुत बड़ा है। वो पूरी कोशिश करेगी कि ओबीसी मुद्दे पर कोर्ट में सरकार की नाकामी का ठीकरा वह कांग्रेस पर ही फोड़े। यानी यह संदेश देने की कोशिश होगी कि बीजेपी तो पिछड़ों को 27 फीसदी आरक्षण देने जा रही थी, लेकिन कांग्रेस ने ही फच्चर मार दिया।  इसकी तैयारी हो चुकी है।

उधर कांग्रेस की पूरी कोशिश रहेगी कि 27 फीसदी आरक्षण न दे पाने के लिए वह भाजपा को कोसे और यह संदेश देने की कोशिश करे कि पिछड़ों की असली हितैषी वही है, भले ही उसने सत्ता में रहते हुए एक भी ओबीसी मुख्यमंत्री न बनाया हो।

Madhya Pradesh Assembly Election 2023 Next elections to be held on OBC reservation issue
अब सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद ये बहुप्रतीक्षित चुनाव जून में होने जा रहे हैं। राज्य निर्वाचन आयुक्त बी.पी.सिंह ने कहा कि चुनाव दो चरणों में होंगे। - फोटो : सोशल मीडिया

यहां 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण में राजनीतिक के साथ-साथ सरकारी नौकरियों में आरक्षण का मसला भी शामिल है। कोर्ट द्वारा राज्य में ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण अमान्य करने का असर सरकारी नौकरियों पर भी पड़ेगा। राज्य में अभी शासकीय सेवाओं में पिछड़ों को 14 फीसदी आरक्षण मिला हुआ है, जिसे बढ़ाकर 27 फीसदी किया जाना है।

लेकिन सवाल यह है कि मप्र में पिछड़ों की आबादी वास्तव में है कितनी? और इस 27 फीसदी आरक्षण का आधार क्या है? ऐसा करने पर कुल आरक्षण 63 फीसदी हो जाएगा, उसका क्या? दरअसल राज्य में ओबीसी की आबादी वास्तव में कितनी है, इसका कोई प्रामाणिक आंकड़ा न तो शिवराज सरकार के पास है और न ही कमलनाथ सरकार के पास था।
 

सुप्रीम कोर्ट के साफ दिशा निर्देश हैं कि पहले पिछड़ों की वास्तविक आबादी के प्रामाणिक आंकड़े सरकार पेश करे, उसी के बाद तय होगा कि ओबीसी वास्तव में कितने फीसदी आरक्षण के हकदार हैं। शिवराज सरकार ने जल्दबाजी में कोर्ट में जो आंकड़े प्रस्तुत किए, उसमे राज्य में ओबीसी आबादी 48 फीसदी होने, तदनुसार राज्य में ओबीसी को 35 प्रतिशत आरक्षण देने का दावा किया गया। ये आंकड़े भी किन प्रामाणिक स्रोतों से जुटाए गए, स्पष्ट नहीं है। उधर कांग्रेस का मानना है कि मप्र में ओबीसी कुल आबादी  का करीब 52 फीसदी हैं।
 

कोर्ट ने कहा था कि ओबीसी के आंकड़े ट्रिपल टेस्ट फार्मूले से जुटाए जाएं, लेकिन वो एक जटिल, गहरी और लंबी प्रक्रिया है। राज्य सरकार वादे के मुताबिक यह प्रक्रिया भी समय पर पूरी नहीं कर पाई। इसके अलावा आरक्षण के इस फार्मूले में बड़ा पेंच सर्वोच्च न्यायालय का वो निर्णय है, जिसमें कहा गया है कि (कतिपय अपवादों को छोड़कर) देश में कुल आरक्षण 50 फीसदी से अधिक नहीं हो सकता।

मप्र में ओबीसी को पहले से दिए गए 14 फीसदी आरक्षण से यह कोटा पूरा हो चुका है। अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया है कि चूंकि सरकार के पास ओबीसी आबादी के प्रामाणिक आंकड़े नहीं हैं, इसलिए  नगरीय निकायों और पंचायतों के ताजा चुनाव बिना ओबीसी आरक्षण के ही होंगे। यानी चुनाव में आरक्षण केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग को ही मिलेगा, जो कुल मिलाकर 36 फीसदी होता है। अब चुनाव नतीजे जो भी हों, लेकिन इन नतीजों से राज्य में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के संकेत जरूर मिलेंगे, यह तय है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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