बीजेपी में गए अल्पेश तो बढ़ेंगी अमित शाह की मुश्किलें? ठाकोर के जाने से फायदे में कांग्रेस?
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आखिरकार गुजरात की पिछड़ी जाति, ठाकोर समाज के नेता अल्पेश ठाकोर कांग्रेस छोड़कर चले गए। उनके बारे में बताया जा रहा है कि वे अब भारतीय जनता पार्टी में शामिल होंगे। हालांकि उन्होंने अभी तक किसी भी पार्टी में शामिल होने की बात नहीं बताई है, लेकिन उनके व्यवहार और राजनीतिक सोच को देखकर यह साफ होने लगा है कि वे भाजपा का ही दामन थामेंगे। इससे गुजरात कांग्रेस को झटका तो लगा है, लेकिन कुछ मायने में फायदा भी हो सकता है।
खासकर हिन्दी भाषियों के खिलाफ ठाकोर के द्वारा चलाए गए अभियान के कारण अल्पेश हिन्दी भाषी व परप्रांतियों के निशाने पर हैं। अल्पेश के कांग्रेस छोड़ देने से गुजरात सहित कांग्रेस को यह कहने में अब कोई आपत्ति नहीं होगी कि उन्होंने क्षेत्र और भाषावादी अल्पेश को अपनी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है।
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क्यों अचानक चर्चा में आए गुजरात के अल्पेश ठाकोर?
करीब छह महीने पहले परप्रांतीय लोगों पर बड़ी संख्या में हुए हमलों की वजह से गुजरात अचानक से राष्ट्रीय स्तर की सुर्खियों में शामिल हो गया था, तब गुजरात में 14 महीने की एक बच्ची के साथ दुष्कर्म के एक मामले में बिहार के एक मजदूर को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद राज्य के कई इलाकों में बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के खिलाफ जबर्दस्त हिंसा भड़क गई थी। इसके चलते कई लोगों को गुजरात छोड़ना पड़ा था। हिंदीभाषी पीड़ितों ने उस समय खुद पर हुई ज्यादती के लिए अल्पेश ठाकोर और उनके नेतृत्व वाली ‘गुजरात क्षत्रिय-ठाकोर सेना’को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं।
जानकारी में रहे कि विगत् दिनों गुजरात में हिन्दी भाषियों के खिलाफ चलाए गए हिंसक आन्दोलन में अल्पेश की भूमिका कथित तौर पर सामने आई। इस अभियान में किसी न किसी रूप में सरकार की भी भूमिका संदिग्ध के घेरे में हैं। चूंकि सरकार भाजपा की है इसलिए हिन्दी भाषी अल्पेश के साथ ही साथ भाजपा सरकार के खिलाफ भी हैं।
दूसरी बात यह है कि देश में जहां-जहां हिन्दी भाषियों के खिलाफ मामले सामने आए हैं वहां-वहां या तो भाजपा की सरकार रही है या फिर भाजपा गठबंधन की सरकार रही है। अगर इन दोनों की सरकार नहीं रहीं हैं तो बाद में भाजपा उनके साथ समझौता करती रही है। ऐसे में देशभर के हिन्दी भाषियों का मानना है कि भाजपा देश में एक नए प्रकार का उपराष्ट्रवाद खड़ी कर रही है।
बता दें कि गुजरात में जो विगत् दिनों हिन्दी भाषियों के खिलाफ हिंशक झड़पें हुई उसमें भी आरोप भाजपा के ऊपर ही लग रहे हैं। हालांकि उन दिनों अल्पेश को लेकर भाजपा देशभर में अभियान चलाई लेकिन बाद में भाजपा बैकफुट पर आ गई थी। आपको यह भी बता दें कि गुजरात में भी परप्रांतीय लोगों की संख्या अच्छी खासी है।
हिंदी भाषी लोगों के बारे में क्या कहते हैं लोग?
प्रवासी हितों के लिए काम करने वाले प्रकाश गुर्जर का कहना है कि गुजरात की जनसंख्या 7 करोड़ से ऊपर पहुंच गई है। इसमें से लगभग डेढ़ करोड़ परप्रांतीय हैं। हालांकि उन्होंने यह भी बताया कि परप्रांतीय वोटरों की संख्या कम है, लेकिन वे प्रदेश के 46 विधानसभा क्षेत्रों में अपना प्रभुत्व रखते हैं। इसके अलावा 6 ऐसे लोकसभा की सीटें हैं जहां हिन्दी भाषियों का प्रभावशाली हस्तक्षेप है।
प्रकाश बताते हैं कि इस बार हमारी योजना अल्पेश को हराने की होगी। हम चाहेंगे कि अल्पेश को जो भी समर्थन करे उसके खिलाफ हमारे लोग वोट करें। यही नहीं उन्होंने यह भी बताया कि भाजपा आज इसीलिए मजबूत दिख रही है क्योंकि उसे परप्रांतीयों का समर्थन प्राप्त है। उन्होंने यह भी बताया कि भाजपा का इतिहास देख लें। हिन्दी भाषियों की यह पार्टी होती थी और उन दिनों गुजराती जनसंघ या भाजपा को हिन्दी भाषियों की पार्टी कहकर ही संबोधित करते थे।
अल्पेश बीजेपी में गए तो बढ़ेंगी अमित शाह की मुश्किलें?
प्रकाश के मुताबिक आज भी प्रदेश के अधिकतर हिस्सों में हिन्दी भाषियों का अच्छा प्रभाव है। अब तो लोग वोटर भी बनने लगे हैं। हमारी योजना है कि इस बार विभिन्न दलों में हमारे लोग चुनाव लड़ें और हम उन्हें समर्थन करें। प्रकाश के अनुसार प्रदेश में लगभग 20 से 22 प्रतिशत वोट परप्रांतियों की है। हम चाहें तो किसी भी सरकार को उलट सकते हैं।
देखा जाए तो प्रकाश गुर्जर की बात में दम दिखता है। जामनगर, मेहसाणा, पालनपुर, अहमदाबाद, गांधीनगर, भावनगर, सूरत, बडोदरा आदि क्षेत्रों में हिन्दी भाषियों की संख्या अच्छी खासी है। कांग्रेस को यदि अल्पेश के जाने से घाटा होता दिख रहा है तो कांग्रेस को कुछ हद तक इसका फायदा भी होगा। यदि अल्पेश भाजपा में शामिल होते हैं तो इसका खामियाजा भाजपा को केवल गुजरात में ही नहीं पूरे देश में उठाना पड़ सकता है।
सामान्य आंकड़े बताते हैं कि गुजरात की अलग-अलग सीटों पर बिहार-उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले प्रवासियों की बड़ी संख्या है। फिलहाल ये प्रवासी भाजपा के लिए वोट करते हैं, लेकिन विगत दिनों जो हिंसा हुई उसके बाद से ये प्रवासी सोचने के लिए मजबूर होने लगे हैं। ये लोग ठाकोर की वजह से अब तक कांग्रेस से खासे आक्रोशित थे। अब जब ठाकोर कांग्रेस छोड़ दिए हैं तो हिन्दी भाषियों का आक्रोश कम होता दिख रहा है। यदि ठाकोर भाजपा में शामिल हो जाते हैं तो फिर भाजपा को भी हिन्दी भाषियों के आक्रोश का सामना करना पड़ सकता है। पहले से हिन्दी भाषियों के मन में हिंसक वारदात के लिए भाजपा की भूमिका को लेकर अच्छा भाव नहीं है।
इन सीटों पर है ठाकोर की पकड़
आपको बता दें कि 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ठाकोर समाज के युवा नेता अल्पेश कांग्रेस में शामिल हुए थे। बीते एक साल में ऐसे मौके कई बार आए जब लगा कि अल्पेश कांग्रेस को गच्चा दे सकते हैं। ताजा मामला इसी जनवरी का है जब वे गुजरात भाजपा के एक प्रमुख नेता शंकर चौधरी से मिले थे लेकिन हर बार की तरह कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व (प्रदेश नेतृत्व नहीं) तब भी अल्पेश को मनाने में सफल रहा था। इस बार अल्पेश ठाकोर और उनके दो सहयोगी विधायकों-धवलसिंह झाला और भरत जी ठाकोर-ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया।
चर्चा यह भी है कि गुजरात की स्थानीय निकाय संस्थाओं में, जहां अभी भी कांग्रेस का वर्चस्व है, अपने सहयोगियों को मलाईदार जिम्मेदारियां दिलवाने के लिए ठाकोर जमकर मोलभाव कर सकते हैं। आपको बता दें कि अल्पेश जिस ठाकोर समुदाय से आते हैं, गुजरात में उसकी तादाद पंद्रह से अठारह फीसदी बताई जाती है। इस समुदाय के वर्चस्व को खास तौर पर राज्य के उत्तरी जिलों में साफ महसूस किया जा सकता है। यह समुदाय लोकसभा की करीब चार सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है। इसके अलावा प्रदेश में चालीस फीसदी से ज्यादा आबादी वाले पूरे ओबीसी वर्ग पर भी ठाकोर समुदाय का खासा प्रभाव है।
कांग्रेस को इन सीटों पर हो सकता है नुकसान
अब यदि सीटों के हिसाब से बात करें तो अल्पेश ठाकोर की नाराजगी से कांग्रेस को जिन सीटों पर पसीना आने की पूरी संभावना है उनमें पाटण और उसकी नजदीकी बनासकांठा (जिला-पालनपुर) प्रमुख हैं। गौरतलब है कि गुजरात की छब्बीस में से जिन पांच लोकसभा सीटों पर कांग्रेस को सबसे ज्यादा उम्मीदें थीं, पाटण और बनासकांठा उनमें ही शामिल हैं। इन दोनों सीटों से कांग्रेस को ज्यादा उम्मीद इसलिए भी थी क्योंकि लोग यहां दो साल पहले आई बाढ़ के दौरान भाजपा सरकार की बदइंतजामी को अभी भी पूरी तरह भूल नहीं पाए हैं। यही कारण है कि जानकार ठाकोर के कांग्रेस का साथ छोड़ देने को कांग्रेस के लिए बड़े झटके के तौर पर देख रहे हैं।
इसलिए कांग्रेस से नाराज थे अल्पेश ठाकोर
गुजरात कांग्रेस से जुड़े विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो पाटण ही वह सीट थी जिस पर हुए टिकट वितरण ने पार्टी और अल्पेश ठाकोर के बीच बनते-बिंगड़ते रिश्तों में आखिरी कील का काम किया। कांग्रेस ने पाटण से जगदीश ठाकोर को अपना उम्मीदवार चुना है। जगदीश 2009 के लोकसभा चुनाव में इसी सीट से कांग्रेस को जीत दिला चुके हैं।
दूसरी तरफ अल्पेश ठाकोर खुद भी पाटण जिले से ही आते हैं। प्रदेश कांग्रेस के एक पूर्व पदाधिकारी के शब्दों में, ‘अल्पेश पाटण और आस-पास के जिलों में अपने सिवाय किसी अन्य बड़े ठाकोर चेहरे की उपस्थिति नहीं चाहते हैं, इसलिए उन्होंने इस सीट से अपने ही किसी विश्वस्त को मैदान में उतारे जाने की पुरजोर पैरवी की थी।
ठाकोर की मांग को कांग्रेस नेतृत्व ने जान-बूझकर तवज्जो नहीं दी। कांग्रेस के एक नेता ने बताया कि कांग्रेस नेतृत्व को अब यह आभास हो गया
है कि अल्पेश कांग्रेस के लिए बोझ बन गए हैं। उत्तरी गुजरात में कांग्रेस अब अपने पारंपरिक नेतृत्व को तवज्जो देने लगी है। कांग्रेस अब यह मानकर चल रही है कि अल्पेश फायदा पहुंचाने के अलावा अब घाटा पहुंचाएंगे। इसलिए अब कांग्रेस अल्पेश से कन्नी काटने लगी है। हालांकि प्रेक्षक यह भी बताते हैं कि अल्पेश, कांग्रेस के उम्मीदवार जगदीश ठाकोर को चित्त करने में ऐड़ी-चोटी का जोर लगा देंगे और इस कवायद में सफल होने पर उन्हें भाजपा की तरफ से बड़ा ईनाम भी दिया जा सकता है।
अल्पेश के जाने के बाद कांग्रेस का बड़ा दांव
वहीं, बनासकांठा में कांग्रेस ने परथीभाई भटोल पर दांव खेला है। भटोल, गुजरात में हुए चर्चित दूध आंदोलन (1946) की नींव के तौर पर स्थापित हुई अमूल डेयरी (गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन) के चेयरमैन रह चुके हैं। इस वजह से वे न सिर्फ बनासकांठा बल्कि पूरे प्रदेश में खासे प्रतिष्ठित हैं लेकिन अल्पेश ठाकोर इस क्षेत्र से भी अपने ही किसी सहयोगी को मौका दिए जाने की मांग पर अड़े थे। अपनी बात न माने जाने पर उन्होंने भटोल के सामने अपने दो डमी प्रत्याशियों को मैदान में उतार दिया जबकि तब वे कांग्रेस से अलग भी नहीं हुए थे।
अल्पेश के साथ कांग्रेस छोड़ने वाले दोनों विधायक-धवलसिंह झाला और भरत जी ठाकोर-मेहसाणा जिले से ही ताल्लुक रखते हैं। हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि यहां कांग्रेस को कोई नुकसान नहीं होने वाला। मेहसाणा लोकसभा सीट को भाजपा ने 1984 के आम चुनावों में तब भी जीता था जब भाजपा को पूरे देश में सिर्फ दो सीटें ही मिली थीं।
करवट बदलती गुजरात की राजनीति?
कुल मिलाकर देखें तो गुजरात की राजनीति एक बार फर करवट बदल रही है। इस बार भाजपा के कई पारंपरिक वोटर कांग्रेस के खेमें में जा सकते हैं। उसी प्रकार कई कांग्रेसी वोटर भाजपा के साथ हो सकते हैं। वर्तमान लोकसभा चुनाव में भी कुछ अलग खेल हो सकता है।
आंकड़ों पर नजर रखने वालों का मानना है कि इस बार भी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं रहने वाली है, लेकिन कांग्रेस के नेताओं का दावा है कि वे इस लोकसभा चुनाव में कम से कम 10 सीटों पर विजयी होंगे और अल्पेश ठाकोर के जाने से उन्हें कोई घाटा नहीं होगा अपितु फायदा ही होगा।
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