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मंथन 2019 : द्विदलीय प्रणाली पर बहस छेड़ता चुनाव

Mon, 08 Apr 2019 07:05 PM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Mon, 08 Apr 2019 07:05 PM IST
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lok sabha elections 2019 discussing two party system in democracy
BJP- Congress
उत्तर प्रदेश के बौद्धिक और मतदाता चेतना से समृद्ध इलाहाबाद में इन दिनों एक नई राजनीतिक बहस चल रही है । तीन दशक से क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने यहाँ दोनों राष्ट्रीय दलों - कांग्रेस और भाजपा को सत्ता के स्वाद से दूर रखा। दो बरस पहले भाजपा ने धमाकेदार एंट्री की। अपने दम पर महंत सरकार बनाई और अनेक नए सियासी समीकरणों की जमीन तैयार कर दी। 
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क्रमवार समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के हाथ में लगातार सरकार सौंपने के बाद लोगों को पहली बार यह लग रहा है कि लोकसभा के चुनाव में राष्ट्रीय दल ही बेहतर जिम्मेदारी निभा सकते हैं। प्रादेशिक हितों के लिए क्षेत्रीय पार्टियों को आजमाते रहने में कोई बुराई नहीं है। इसका एक कारण यह भी है कि केंद्र में मिली जुली या खिचड़ी सरकारों की शैली मुल्क की प्राथमिकताओं से मेल नहीं खाती।
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संसद में अपने एक भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो साफ साफ गठबंधन सरकारों को मिलावट और महामिलावट वाले रूप का बताया था। इसके बाद एक राष्ट्रीय चैनल पर अपने ताजा साक्षात्कार में उन्होंने फिर जोर दिया कि सरकार किसी की भी बने, पूर्ण बहुमत वाली होनी चाहिए। स्पष्ट है कि बड़ी पार्टी छोटी पार्टी को मजबूरी में ही साथ रखना चाहती है। अपने बलबूते पर बहुमत से बेहतर कोई बात नहीं। यह क्षेत्रीय दलों के लिए भी आंख खोलने वाला तथ्य है। 
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दरअसल प्रादेशिक पार्टियों की आंतरिक हालत भी बहुत अच्छी नहीं है। उत्तर प्रदेश की इन पार्टियों ने गठन के बाद से ही अपने प्रभाव और सीमाओं का विस्तार नहीं किया। उनकी उमर बढ़ती गई, लेकिन उस अनुपात में पार्टी की देह पर परिधान का आकार नहीं बढ़ा। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के हवाले से इलाहाबाद के मतदाता यह बहस छेड़ते हैं कि इन दलों को अपना अखिल भारतीय स्वरूप अख्तियार करने से किसने रोका था। 

वे दोनों बड़ी पार्टियों के सामने नई राष्ट्रीय ताकत के रूप में उभरती और उनके लिए चुनौती पेश करती। पर वे ऐसा नहीं कर पाईं। जुगनू की रौशनी को सितारे में तब्दील करना उन्हें नहीं आया। नतीजा यह कि वे एक छोटी रियासत के निरंकुश सामंत की तरह व्यवहार करने लगीं। इन दलों के भीतर ही लोकतंत्र नहीं बचा। ये हिंदुस्तान के लोकतंत्र को आगे कैसे ले जाती? 

इलाहाबाद का चरित्र हमेशा भारत की चुनावी राजनीति में कुछ नया अंदाज दिखाने का रहा है। आप इन दिनों यहां पान की गुमटियों, चाट के ठेलों और गंगा-जमुना के घाटों पर लोगों के बीच इस बहस को विविध जातीय रंगों में रंगा हुआ देख सकते हैं। शहरी, साक्षर और सवर्ण मतदाता दोनों राष्ट्रीय पार्टियों में बंटे नजर आते हैं तो बसपा और सपा का वोट बैंक भी अब नींद से जागते हुए अखिल भारतीय सोच से प्रभावित नजर आता है। देश पर असर डालने वाले मसले अब उसकी चर्चाओं में शुमार हैं। 


पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की दोनों क्षेत्रीय पार्टियों ने 20 और 22 फीसदी वोट पाते हुए भी मुंह की खाई थी। बसपा तो खाता भी नहीं खोल पाई और समाजवादी पार्टी के परिवार से बमुश्किल 5 लोग जीत सके हैं। इसका अर्थ इन प्रादेशिक दलों के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। भाजपा और कांग्रेस उत्तरप्रदेश के इस विचार केंद्र की चर्चाओं से उत्साहित हो सकते हैं। 
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