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बिहार के अंतिम चरण के चुनाव में कांटे की जंग, क्यों आसान नहीं है नीतीश कुमार की राह?

Nawal Kishor Kumarनवल किशोर कुमार Updated Wed, 15 May 2019 02:26 PM IST
19 मई को बिहार के नालंदा, पटना साहिब, पाटलिपुत्र, आरा, बक्सर, सासाराम, काराकाट और जहानाबाद में चुनाव होने हैं।
19 मई को बिहार के नालंदा, पटना साहिब, पाटलिपुत्र, आरा, बक्सर, सासाराम, काराकाट और जहानाबाद में चुनाव होने हैं। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण में 19 मई को बिहार के नालंदा, पटना साहिब, पाटलिपुत्र, आरा, बक्सर, सासाराम, काराकाट और जहानाबाद में चुनाव होने हैं। इनमें से 4 क्षेत्रों में वर्तमान केंद्र सरकार के 4 मंत्रियों की किस्मत दांव पर लगी है। इनमें पटना साहिब से रविशंकर प्रसाद, पाटलिपुत्र से रामकृपाल यादव, बक्सर से अश्विनी चौबे के अलावा काराकाट से उपेंद्र कुशवाहा शामिल हैं। हालांकि उपेंद्र कुशवाहा चुनाव के पहले ही नीतीश कुमार से 36 के संबंध के कारण भाजपा से नाता तोड़कर राजदनीत महागठबंधन में शामिल हो गए हैं।

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दूसरी ओर आरा संसदीय क्षेत्र में भारत सरकार (मनमोहन सिंह सरकार) के पूर्व गृह सचिव आर. के. सिंह भी दूसरी बार ताल ठोंक रहे हैं जहां उनका मुकाबला भाकपा माले के नौजवान उम्मीदवार राजू यादव से होना है। इस संसदीय क्षेत्र पर सबकी निगाहें इसलिए भी टिकी हैं क्योंकि राजू यादव को राजद और कांग्रेस ने अपना समर्थन दिया है।

नालंदा क्यों बना नीतीश के लिए चुनौती? 
इस प्रकार अंतिम चरण का चुनाव दिलचस्प बन गया है। क्षेत्रवार बात करें तो नालंदा लोकसभा क्षेत्र में एक बार फिर नीतीश कुमार की प्रतिष्ठा उनके गले में अटकी पड़ी है। यह क्षेत्र नीतीश कुमार का गढ़ माना जाता है। यह उनका गृह जिला है जहां कुर्मी जाति के वोटर निर्णायक होते हैं। सियासी गलियारे में यह सभी स्वीकारते हैं कि नालंदा में जदयू का उम्मीदवार चाहे कोई हो, वह नीतीश कुमार का मुखौटा ही होता है।

बता दें कि नालंदा पर नीतीश कुमार का कब्जा 1996 से बरकरार है। इससे पहले तक यहां कांग्रेस और सीपीआई के उम्मीदवार आपस में उलझते थे। 1991 में सीपीआई उम्मीदवार विजय कुमार यादव को जीत मिली थी।

पिछली बार यानी 2014 में नीतीश कुमार ने अपने बूते चुनाव लड़ा था और केवल जिन दो क्षेत्रों में उन्हें जीत मिली थी, उनमें से एक नालंदा भी शामिल था। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि तब कथित तौर पर मोदी की सुनामी के कारण भाजपा को अविस्मरणीय जीत मिली थी।

आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो पिछली बार नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के उम्मीदवार कौशलेंद्र कुमार को 3 लाख 21 हजार 982 वोट मिले थे और वे किसी तरह महज लगभग 10 हजार वोटों के अंतर से जीत सके थे। उन्हें लोक जनशक्ति पार्टी के सत्यानंद शर्मा ने कड़ी चुनौती दी थी। उन्हें 3 लाख 12 हजार 355 वोट मिले थे। जबकि तीसरे स्थान पर रहे बिहार के पूर्व डीजीपी आशीष रंजन सिन्हा को बतौर कांग्रेस उम्मीदवार 1 लाख 27 हजार 270 वोट मिले थे।

इस बार हालात बदले हैं। नीतीश कुमार एक बार फिर से नरेंद्र मोदी के साथ हैं। लिहाजा यह माना जा सकता है कि नालंदा में न केवल नीतीश कुमार के उम्मीदवार के लिए बल्कि स्वयं नीतीश कुमार के लिए राह आसान है। हालांकि नालंदा लोकसभा क्षेत्र के मतदाताओं का मूड एक जैसा नहीं होता है। इस बार महागठबंधन ने विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के उम्मीदवार अशोक कुमार आजाद चंद्रवंशी को जदयू के उम्मीदवार कौशलेंद्र कुमार के खिलाफ उम्मीदवार बनाया है।

जातिगत समीकरणों के लिहाज से नालंदा में कुर्मी जाति के मतदाताओं की संख्या अधिक हो, लेकिन दूसरे स्थान पर यादव और अति पिछड़ी जाति के मतदाताओं की संख्या भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। पिछली बार वे अति पिछड़े ही थे जिनके कारण नीतीश कुमार के उम्मीदवार 10 हजार वोटों के अंतर से जीत दर्ज कर सके थे। इस बार अशोक कुमार आजाद चंद्रवंशी जो कि अति पिछड़ा वर्ग से आते हैं, यदि यादव, मुसलमान और अति पिछड़ा वर्ग के वोटरों का वोट पाने में कामयाब हो जाते हैं तो नालंदा में इस बार उलटफेर की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
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