गुजरात से ग्राउंड रिपोर्टः इन 10 कारणों से बुरी तरह हारी कांग्रेस, बीजेपी ने अपनाई ये नई रणनीति
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भाजपा ने इस बार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य में 2014 जैसी शानदार जीत दोहराकर गुजरात में कांग्रेस पार्टी के वजूद पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया है। गुजरात में कांग्रेस करीब 30 वर्षों से सत्ता से बाहर है। इस बार युवा नेता हार्दिक पटेल का सहारा लेकर कांग्रेस ने दांव खेला, लेकिन जीतने में नाकाम रही। कांग्रेस ने 2017 विधान सभा चुनावों में क़रीब 80 सीटें जीतकर भाजपा को लगभग हार के कगार पर खड़ा कर दिया था। लेकिन इसके बाद फिर से आदतन स्लीपिंग मोड में चली गई। गुजरात में कांग्रेस की हार के ये अहम कारण रहे।
1. पार्टी का ढीला रवैया
एक ओर भाजपा की मारक सक्रियता और दूसरी ओर कांग्रेस का ढीला रवैया, जिसके चलते इस बार के चुनावी नतीजे बिल्कुल भी अप्रत्याशित नहीं कहे जा सकते हैं। भाजपा ने अधिक सक्रियता दिखाकर कांग्रेस के कई लोकप्रिय विधायकों को तोड़कर अपने पाले में शामिल कर लिया। भाजपा ने कुछ भाग्यशाली दलबदलू विधायकों को पार्टी छोड़ने के कुछ ही घंटो के अंदर मंत्री मंडल में शामिल कर स्थानीय जातीय समीकरण को संतुलित कर 17वें लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को धूल चाटने की तैयारी कर ली थी। नतीजतन कांग्रेस हाथ मलती देखती रह गई।
2. जनता के बीच नहीं रहते कांग्रेस कार्यकर्ता
भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया, क्योंकि भाजपा के कार्यकर्ता जनता के बीच रहते हैं। कांग्रेस की तरह पार्ट-टाइम सुविधाभोगी पार्टी वर्कर नहीं हैं। भाजपा का ढांचा ही कुछ ऐसा बना है कि कोई कॉर्पोरेटर या विधायक होगा तो उसे अपने इलाक़े में जाकर रहना और लोगों से मिलते जुलते रहना होता है। ये कल्चर कांग्रेस में ख़त्म हो गया।
3. संगठन की ताकत के मामले में कांग्रेस पीछे
भाजपा के उम्मीदवारों को आरएसएस के कमिटेड वर्कर्स की मदद मिल जाती है। संगठन की ताक़त में कांग्रेस बहुत पीछे है। भाजपा जैसी माइक्रो-प्लानिंग के लिए जो जनशक्ति चाहिए, वो कांग्रेस के पास नहीं है।
4. नहीं चला पटेल फैक्टर
नतीजों से साफ है कि इन चुनावों में पटेल कोई फ़ैक्टर नहीं रहा, जिसपर कांग्रेस को काफी भरोसा था। भाजपा के वरिष्ठ नेता यमन व्यास का कहते हैं- पटेल पहले भी भाजपा के साथ थे और आज भी हैं। जहां एक दिन हार्दिक पटेल को भी शामिल होना है। 2017 विधानसभा से पहले गुजरात में उभरे तीन युवा चेहरे- अल्पेश, हार्दिक और जिग़्नेश। इनमें से लोकसभा चुनावों से ठीक पहले अल्पेश ने भाजपा की गोद में बैठकर कांग्रेस के खिलाफ काम किया।
5. हार्दिक पटेल के नेतृत्व का कांग्रेस की विचारधारा से मेल नहीं
गुजरात यूनिवर्सिटी के प्रोफसर गौरंग जानी कहते हैं- हार्दिक पटेल की लीडरशिप का कांग्रेस की विचारधारा से कभी कोई मेल नहीं था। वो एक युवा चेहरा हैं, जिसका उपयोग कांग्रेस ने मोदी के सामने खुलकर बोलने के लिए किया। युवा पीढ़ी को वो आकर्षित करते हैं। साथ ही राहुल गांधी के अलावा कोई दूसरा नेता पार्टी में नहीं है, ख़ासकर गुजरात में, जो इतना निर्भीक और आक्रामक होकर मोदी को आड़े हाथों ले सकता था। शायद उनकी इसी ख़ूबी को ध्यान में रखते हुए उन्हें न केवल कांग्रेस में शामिल किया गया, बल्कि एक हेलिकॉप्टर देकर उनसे चुनाव प्रचार भी कराया गया। यहां तक कि उनकी सभाएं अमेठी और रायबरेली में भी आयोजित की गईं।
हालांकि, एक खास रणनीति के तौर पर हार्दिक ने कांग्रेस में शामिल होना पसंद किया। लेकिन इसका कोई ख़ास लाभ कांग्रेस को हुआ हो, ऐसा बिल्कुल नहीं दिखता। गुजरात में पाटीदार एक फ़ैक्टर अब रहा ही नहीं, ख़ासकर 10 प्रतिशत आर्थिक आरक्षण की घोषणा के बाद।
6. आदिवासी, दलित व अल्पसंख्यक समुदायों के सवाल नहीं उठा पाई कांग्रेस
कांग्रेस के पास विधानसभा में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद एक साल से भी ज़्यादा समय था। उस दरमियान पार्टी कुछ ख़ास नहीं कर पाई। ये पार्टी के निकम्मेपन की जीवंत कहानी थी। पार्टी लोकसभा की तैयारी कर सकती थी, हार्दिक का सही उपयोग हो सकता था। कांग्रेस आदिवासियों में जंगल और ज़मीन के मसले पर बढ़ता असंतोष और दलित समुदाय व अल्पसंख्यकों के प्रश्नों को हाथ में नहीं ले पाई, ख़ासकर 2002 के बाद।
7. पहले ही मान लिया की हिंदुत्व के सामने कोई चारा नहीं
असल में कांग्रेस ने एक तरह से मान लिया कि मोदी के हिंदुत्व के सामने कोई चारा नही। मानसिक रूप से कांग्रेस पहले ही भाजपा से हार मान चुकी थी। हिंदुत्व के चलते भी जातियों के अंतर-विरोध स्थानीय स्तर पर हमेशा मौजूद रहते हैं, लेकिन कांग्रेस इन्हें भुनाने में बुरी तरह नाकामयाब रही।
8. दलित अत्याचारों की बात नहीं की
कांग्रेस गुजरात में दलित अत्याचारों की बात नहीं कर पाई, आदिवासियों को भी साथ नही रख सकी। पटेल आंदोलन को भी ठीक से हैंडल नहीं कर सकी। पार्टी पटेल आंदोलन को लेकर अपना स्टैंड नहीं रख पाई, जिसके चलते पिछड़ी जाती के लोग भाजपा की ओर खींचे चले गए।
9. सरकार के प्रति कॉन्ट्रैक्चुअल वर्कर्स का मुद्दा नहीं उठाया
गुजरात में कॉन्ट्रैक्चुअल वर्करस में काफ़ी नाराज़गी है। गुजरात सरकार नियमित भर्ती की बजाय कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट पर रखना पसंद करती है। सरकार के लिए लाखों कर्मचारी कॉन्ट्रैक्ट पर काम करते हैं। चालीस हज़ार रुपए वेतन के बजाय दस हज़ार में काम चला लेते हैं। कांग्रेस ने इन कर्मचारियों का मुद्दा कभी नहीं उठाया। कांग्रेस दिखा नहीं पाई कि वह अल्पसंख्यकों, दलितों के लिए प्रतिबद्ध है।
10. महिलाओं के लिए भी कुछ खास नहीं किया
पार्टी ने पिछले 16 सालों से अपने परम्परागत वोट बैंक- आदिवासी, दलित और ओबीसी में कोई हस्तक्षेप नहीं किया। महिलाओं के लिए भी कुछ ख़ास अच्छा काम नहीं किया। जबकि भाजपा इन समुदायों के बीच लगातार काम करती रही।
कांग्रेस के पूर्व प्रदेश प्रमुख और पूर्व केंद्रीय मंत्री भरत सोलंकी और दूसरे जाने माने आदिवासी कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री तुषार चौधरी की लगातार दूसरी बार हार पार्टी की दुर्दशा की एक लम्बी दास्तान बयां करती है। साथ ही विधान सभा में कांग्रेस नेता परेश धनानी (जो पार्टी के एक युवा पटेल चेहरा हैं) की हार ने पार्टी के मनोबल को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। कांग्रेस के वर्तमान प्रदेश प्रमुख अमित चावड़ा के नेतृत्व पर भी सवालिया निशान लग गया है। अब पार्टी को अपने चरमराते ढांचे में अहम परिवर्तन करने होंगे।
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