फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Lockdown Coronavirus Migrant laborers on the path of starvation, farmers are also at work

बिना इनके क्या हालात को संभाल पाएंगे? क्या हम घर के गमलों में गेहूं उगा पाएंगे?

Mon, 20 Apr 2020 01:08 PM IST
Rohit Ojha Rohit Ojha
Updated Mon, 20 Apr 2020 01:08 PM IST
विज्ञापन
Lockdown Coronavirus Migrant laborers on the path of starvation, farmers are also at work
बांद्रा स्टेशन पर इकट्ठा हुए प्रवासी मजदूर - फोटो : PTI

कोरोना वायरस के कारण 21 दिनों के लिए लगा लॉकडाउन और 19 दिन के लिए बढ़ गया है। 25 मार्च से घरों में बंद देश की जनता को तीन मई तक घरों में रहकर ही सांस लेना होगा। देश की सड़कें अभी और कुछ दिन पहियों के वजन के नीचे दबने से बचेंगी। रेलवे स्टेशन के पूछताछ केंद्रों पर सन्नाटा कुछ दिन और पसरा रहेगा। पटरियां  कुछ और सप्ताह वीरानी में गुजारेंगी और बेफिक्र होकर चूहे प्लेटफॉर्म पर घूमेंगे।

विज्ञापन

 
कुछ और हफ्ते बनारस और प्रयागराज के रेलवे पूल से नदी में सिक्के नहीं उछाले जाएंगे, क्योंकि सब ठप है। हम आप घरों में बंद है, लेकिन इस देश का एक बड़ा तबका इस महामारी के दौर में भी अपनी भूख को मिटाने के लिए लड़ रहा है। वो देश के महानगरों में है, अपने साथियों के साथ तब वो पैदल इसलिए अपने गांव नहीं लौटा, क्योंकि उसे उम्मीद थी कि 21 दिनों के बाद फिर से सब सामान्य हो जाएगा। वो फिर से किसी के घर की ईंट जोड़ने में लग जाएगा या किसी होटल में फिर से पराठे सेंकने में व्यस्त हो जाएगा।
विज्ञापन


चाय की दुकान पर फिर से केतली गर्म होने लगेगी या फिर वो जिस कारखाने में काम करता था, वह फिर से चल पड़ेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अब वो जिंदगी की सिर्फ एक राह पर खड़ा है और वो रास्ता उसे अपने गांव की ओर ले जाता है। 
विज्ञापन
विज्ञापन


एक बार फिर से वो अपनी उम्मीद को इस शहर की खामोशी में झोंक कर अपने घर निकलने के लिए सड़क पर उतर आया है। 14 अप्रैल मंगलवार की शाम मुंबई के बांद्रा में हजारों की भीड़ इकट्ठी हो गई, सूरत में भी दिहाड़ी मजदूर सड़कों पर उतर आए। अब वो भय में हैं। उनके पास अब इस शहर में रहने की ताकत नहीं बची। जितनी हिम्मत थी उन्होंने तीन सप्ताह डटकर अपने हालात से मुकाबला किया। जो भी जमा पूंजी थी वो सब खर्च हो गई। 

अब वो सड़कों पर हैं और जिस सत्ता के कहने पर अब तक वो सब डटे रहे, वो सत्ता एक एलान कर एक बार फिर अपने घरों में बंद है। बिना इस बात की परवाह किए बगैर की अब इन प्रवासी मजदूरों का क्या होगा। राज्य सरकारें दावा कर रही हैं कि वो अपने यहां मौजूद लोगों की देखभाल कर रही है, लेकिन हालात कुछ और ही कह रहे हैं।  

हम और आप ही तो थे जो कुछ सप्ताह पहले सोशल मीडिया पर इनके लिए भावुकता का सैलाब ले आए थे, जब वो पैदल ही अपने घरों के लिए जा रहे थे। अब एक बार फिर यही शुरू है, लेकिन दो वक्त की रोटी के लिए मीलों दूर आए इन मजदूरों को हमारी किसी संवेदना से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

वो अब फिर से चलने को बेचैन हैं, पेट भूख से पीठ में धंसा जा रहा है, लेकिन वो चलेंगे। उन्हें अब किसी भी सत्ता और नेता से कोई उम्मीद नहीं। उनके बच्चों के होठों पर भूख और प्यास से पड़ती पपड़ी, उन्हें इस शहर से बाहर निकलने वाली सड़क पर दौड़ा देगी। हम और आप बस टीवी और तस्वीरों में देखते रहेंगे। 

सरकारें दावा कर रही हैं कि हमनें सभी के लिए बेहतर प्रबंध किए हैं, कोई भूखे नहीं सोएगा, अगर वाकई उनके द्वारा इन मजदूरों की देखभाल के लिए कदम उठाए गए हैं, तो ऐसा क्यों है कि जहां भी घर लौटने की अफवाह उड़ती है, हजारों की संख्या में ये इकट्ठा हो जाते हैं। इसके तुरंत बाद ये कहा जाने लगता है कि लोगों को साजिश के तहत इकट्ठा किया गया।

इन मजदूरों की दुनिया अस्त-व्यस्त हो चुकी है

Lockdown Coronavirus Migrant laborers on the path of starvation, farmers are also at work
इन मजदूरों की दुनिया अस्त-व्यस्त हो चुकी है। - फोटो : labour

अगर ये साजिश है, तो हम और आप क्यों नहीं इस भीड़ का हिस्सा बनते हैं, वो इसलिए क्योंकि हमारे पेट भरे हुए हैं, हम कई दिनों से भूखे नहीं हैं। भूख में इंसान उम्मीद के हर एक दरवाजे को खटखटाता है और वो सभी लोग यही कर रहे हैं, जो अपने घरों से दूर जिंदगी को बचाने के लिए हर पल हर हालात से लड़ रहे हैं। 

यदि आप मुंबई में जुटी भीड़ को साजिश बता रहे हैं या फिर उनपर किसी भी तरह का सवाल उठा रहे हैं, क्या आपने कभी सत्ता से इस बारे में पूछा कि क्यों ऐसे हालात पैदा हो गए। दरअसल, हमारी फितरत ही रही है कमजोरों को सवालों के घेरे में खड़े रखने की।

ये हालात तो शहरों के हैं, क्या गांवों के बारे कोई खबर सुनी, क्या हालात हैं वहां, सरकारों ने गांव के उन किसानों के लिए क्या प्रबंध किए हैं, जिनकी फसल खेतों में पककर टूटने लगी है। गांवों में लॉकडाउन का मतलब बस दुकानों का बंद रहना है। 

गांव में सब अपने अपने काम में लगे हुए हैं। फसलों की कटाई का समय है। सब जुटे हैं। इससे बेफिक्र कि यह घातक बीमारी जान भी ले सकती है। जैसे मजदूर बेफिक्र होकर अब हर हाल में घर लौटना चाहते हैं, वैसे ही किसान भी हर हाल में खेतों से अपनी फसल को घर लाना चाहता है।

हम और आप अपने घरों में आटा, चावल, दाल और सभी जरूरत के सामान भरकर टीवी के रिमोट का बटन दबा रहे हैं या मोबाइल पर अंगुलियां फिरा रहे हैं, लेकिन क्या मजदूरों और किसानों के बिना ये चीजें आप तक पहुंचतीं। जिस वक्त आप साबुन और सैनेटाइजर से हाथ धोते नहीं थक रहे, उस वक्त गांवों में किसान धूल और धूप के बीच अनाज जमा कर रहा है, सिर्फ अपने लिए नहीं, आपके और हमारे लिए भी ताकि आज जैसे हालात जब भी पैदा हो तो हम अपने घरों में सामान भरकर बैठ जाए। 

हमारी जिंदगी पर बिना किसी कारण के ही लॉकडाउन लग जाएगा

लेकिन जब वही किसान अपनी मांग को लेकर आपके और हमारे शहर की सड़कों पर उतर आता है, तो हम उन्हें जमकर कोसते हैं। क्योंकि, हमारी मीटिंग छूट रही होती है। सड़क पर जमा हुए मजदूरों को देखकर हमें लग रहा है कि इससे और महामारी फैलेगी और यह संभव भी है, लेकिन क्या हम उनके हालात को समझ पा रहे हैं, क्या हमने कभी भी, जब वो हमारे आस-पास से गुजरे हैं, तो उनसे बात की है।

ये मजदूर जब लौट जाएंगे तो सोचिएगा कि आपके बच्चे जिस बस से स्कूल जाते हैं, उसे चलाने वाला इन्हीं में से एक होगा या फिर आपके घर का एसी जिसने ठीक किया था, वो भी इन्हीं में से एक है।

अगली बार जब इनसे सामना हो तो जरा इनकी पथरीली आंखों में पल रही मेहनत को देखिएगा, ना कि उसकी मांगी मजदूरी में से पैसे काटने के बहाने तलाशिएगा। क्योंकि अगर ये ना रहें तो आपकी और हमारी जिंदगी पर बिना किसी कारण के ही लॉकडाउन लग जाएगा।

अगली बार शहर की सड़कों पर किसान अपनी मांगो को लेकर लौटे तो एक दिन घर में गुजार लीजिएगा। अगली बार एसी की मरम्मत के लिए कोई आए तो एक बार मुस्कुराकर हाल चाल पूछ लीजिएगा।

क्योंकि अब उन्हें इस देश की सत्ता से कोई उम्मीद नहीं रही, हम आप साथ खड़े रहेंगे तो, आज जैसी मुसीबत में हमें किसी चीज की कभी भी कोई कमी नहीं होगी, क्योंकि वो तो हालात से लड़कर ही यहां तक आए हैं। हम और आप क्या उनके बिना ऐसे हालात को संभाल पाएंगे, क्या छत पर और गमलों में गेहूं उगा पाएंगे...!


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed