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जीवन धारा: प्रकृति से बड़ा कोई शिक्षक नहीं, सहयोग और विनम्रता ही असली शक्ति

Sat, 04 Jul 2026 07:57 AM IST
Devesh Tripathi ई ओ विल्सन
ई ओ विल्सन Published by: Devesh Tripathi Updated Sat, 04 Jul 2026 07:57 AM IST
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सार
मनुष्य ने अपनी प्रगति की कहानी ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों से लिखी है, लेकिन प्रकृति अपनी कहानी मौन संतुलन से लिखती है। वहां कोई प्रतिस्पर्धा दिखाई नहीं देती, फिर भी तेज गति से विकास होता रहता है।
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जीवन धारा - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

मनुष्य जब अपने जीवन को समझने निकलता है, तो वह अक्सर स्वयं को ही केंद्र में रखकर सोचता है। उसे लगता है कि पृथ्वी का इतिहास उसी से शुरू और उसी पर समाप्त हो जाएगा। उसकी उपलब्धियां, उसके शहर, उसके उद्योग और उसकी तकनीक ही मानो इस संसार की सबसे बड़ी उपलब्धियां हैं। लेकिन, अगर वह कुछ देर के लिए इस सोच से बाहर निकले और किसी जंगल में जाए, किसी पक्षी का घोंसला ध्यान से देखे, चींटियों को मिलकर काम करते हुए देखे या किसी चट्टान के बीच उगते पौधे को देखे, तो उसे एहसास होगा कि जीवन सिर्फ उस तक सीमित नहीं है। पृथ्वी पर जीवन इन्सान के आने से बहुत पहले भी था और उसके बाद भी बना रहेगा। यही समझ हमें विनम्र बनाती है और यह एहसास दिलाती है कि हम प्रकृति का सिर्फ एक छोटा-सा हिस्सा हैं।


प्रकृति का सबसे अद्भुत गुण उसकी विविधता है। कोई भी जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होता। वहां हर पत्ती, हर कीट, हर पक्षी और हर जीव अपने ढंग से उस व्यवस्था का हिस्सा होता है, जो दिखाई भले न दे, पर निरंतर काम करती रहती है। मनुष्य ने अपनी प्रगति की कहानी ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों से लिखी है, लेकिन प्रकृति अपनी कहानी मौन संतुलन से लिखती है। वहां कोई प्रतिस्पर्धा दिखाई नहीं देती, फिर भी तेज गति से विकास होता रहता है। वहां कोई स्वयं को सबसे बड़ा सिद्ध करने में नहीं लगा, फिर भी सबका जीवन आगे बढ़ता रहता है।


जंगल का सबसे विशाल वृक्ष भी उस मिट्टी पर निर्भर है, जिसे असंख्य सूक्ष्म जीव हर दिन जीवित रखते हैं। यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि कोई भी सफलता अकेले संभव नहीं होती। जितना हम दूसरों पर निर्भर हैं, उतना ही वे हम पर। जीवन की वास्तविक शक्ति प्रभुत्व में नहीं, परस्पर सहयोग में छिपी होती है। इस बात को गांठ बांध लें कि जिस समाज में पक्षियों का गीत कम होने लगे, नदियों का जल मटमैला हो जाए व जंगलों की नीरवता समाप्त होने लगे, वहां केवल पर्यावरण नहीं बदलता, मनुष्य का मन भी बदलने लगता है। बाहरी संसार की उजाड़ता धीरे-धीरे भीतर भी उतर आती है।
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