जन्मदिन विशेष: 'रागों की रगों' से दूर जादुई आवाज के साथ आज भी लोगों के दिलों में धड़कते हैं किशोर दा
शास्त्रीय संगीत की ऊंची इमारत पर बैठे गीत जो रागों के रूप में सधे हुए गले से बाहर आते थे, उन्हें किशोर कुमार ने अपने अंदाज में ऐसे गाया कि वह देश की गली-मोहल्लों में दौड़ते नजर आए। उनकी आवाज और गानों ने कुछ ऐसा कमाल किया कि आज हिंदी सिनेमा में संगीत की कल्पना बिना किशोर कुमार के करना बेहद मुश्किल लगता है।
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'शास्त्रीय संगीत में अच्छी पकड़ रखने वालों के लिए किसी भी तरह का गाना, गाना बेहद सरल है।' आपने कई लोगों को ऐसा कहते हुए जरूर सुना होगा। वास्तव में रागों के साथ सधे हुए गले से बाहर आते गीत कानों से होते हुए सीधा दिल तक जाते हैं। लेकिन क्या आप भारतीय सिनेमा की उस नायाब शख्सियत और टैलेंट के उस पावर हाउस को जानते हैं, जिसने बिना रागों को छेड़े ही अपने गानों से लोगों की धड़कनों को एक बार नहीं कई-कई बार छेड़ा।
आए तुम याद मुझे, गाने लगी हर धड़कन...', 'आ चल के तुझे मैं लेके चलूं...', 'ओ साथी रे... तेरे बिना भी क्या जीना...', इन लाइनों से आपको समझ आ ही गया होगा कि यहां भारतीय सिनेमा के उस इकलौते शख्स की बात हो रही है जो गायक होने के साथ-साथ म्यूजिक डायरेक्टर, गीतकार, एक्टर, डायरेक्टर, राइटर और प्रोड्यूसर भी थे।
जी हां वो कोई और नहीं किशोर कुमार ही थे। उन्होंने हिंदी सिनेमा में अपने संगीत से एक अलग ही खुशबू घोली है जिसकी धमक आज भी लोगों के दिलो-दिमाग पर छाई है और आने वाली कई पीढ़ियों तक भी इसकी महक को हटाना नामुमकिन सा लगता है।
पहला गाना
आज किशोर दा होते तो आज 94 साल के होने का जश्न मना रहे होते। 4 अगस्त 1929 को मध्यप्रदेश के एक छोटे से कस्बे खंडवा में किशोर कुमार ने प्रसिद्ध बैरिस्टर कुंजबिहारी लाल गांगुली के घर में आभास कुमार गांगुली के रूप में जन्म लिया। इस बात से तो इंकार नहीं किया जा सकता कि किशोर बचपन से ही संगीत प्रेमी थे।
हालांकि उनका पढ़ाई में ज्यादा मन नहीं लगता था, इसलिए किशोरावस्था में ही किशोर कुमार अपने बड़े भाई कुमुद कुमार गांगुली के पास मुंबई चले आए, जो उस समय तक भारतीय सिनेमा जगत में अशोक कुमार के नाम से खुद को एक अभिनेता के रूप में स्थापित कर चुके थे।
भाई की मदद से कई फिल्मी हस्तियों के साथ परिचय होने के बाद 1946 में म्यूजिक डायरेक्टर सरस्वती देवी ने उन्हें एक फिल्म में पहली बार गाने का मौका दिया। इस फिल्म का नाम था '80 डेज', लेकिन उन्हें इसमें कोरस में गाने को मौका मिला, जो उनके लिए बहुत बड़ी बात थी।
वहीं निर्देशक शाहिद लतीफ ने किशोर को अपनी फिल्म 'जिद्दी' में पहली बार सोलो गाने का मौका दिया, जो जोरदार हिट भी रहा। 1948 में देव आनंद पर फिल्माए गए इस गीत का नाम था 'मरने की दुआएं क्यों मांगूं...' इसके बाद देव आनंद को लगभग सभी गानों में किशोर की आवाज ही सुनने को मिलती।
महान कलाकार का महान व्यक्तित्व
फिल्मी दुनिया में कदम रखते ही उन्हें समझ आ गया था कि शास्त्रीय संगीत की कठिन गलियां उनके सफर को मुश्किल बनाने वाली हैं, लेकिन उन्होंने उन कठिन गलियों को इस कदर बदल दिया कि जिस भी रास्ते में वह जाते उसे अपना बना लेते थे। मुश्किल से मुश्किल गाने को अपने अंदाज में गाकर उन्होंने हर आम इंसान को भी उससे प्यार करने पर मजबूर कर दिया।
किशोर कुमार को उनकी जिद और जुनून ही बाकी गायकों से अलग बनाता है। कमाल की बात तो ये है कि बिना आरोह अवरोह साधे हुए ही उन्होंने संगीत जगत में इतना लंबा सफर तय किया। दरअसल किशोर दा ने अपनी कमजोरी को कभी खुद पर हावी होने नहीं दिया। उन्हें अपनी इस कमजोरी को स्वीकार करने में कभी कोई झिझक नहीं हुई।
देखा जाए तो सफलता के ऊंचे पायदान पर खड़े होने के बाद भी इतनी ईमानदारी दिखा पाना सबके बस की बात नहीं है। किशोर दा अपनी आवाज से लोगों के दिलों तक का सफर जरूर तय करते हैं, लेकिन उन्हें लोगों के दिलों में जगह उनके सीधे और सरल व्यक्तित्व की वजह से मिलती है।
शास्त्रीय संगीत की ऊंची इमारत पर बैठे गीत जो रागों के रूप में सधे हुए गले से बाहर आते थे, उन्हें किशोर कुमार ने अपने अंदाज में ऐसे गाया कि वह देश की गली-मोहल्लों में दौड़ते नजर आए। उनकी आवाज और गानों ने कुछ ऐसा कमाल किया कि आज हिंदी सिनेमा के संगीत की कल्पना बिना किशोर कुमार के करना बेहद मुश्किल लगता है। भले ही उनके सुर थोड़ा भटके क्यों न हों, लेकिन वह हर गले में भरोसा जगाने वाली आवाज थे।
4 नंबर का महत्व
किशोर कुमार के जीवन में 4 अंक का काफी महत्व रहा है। 4 अगस्त को जन्म लेने वाले किशोर दा अपने भाई बहनों में चौथे नंबर पर थे। इनसे बड़े तीन भाई बहन थे, सबसे बड़े कुमुद कुमार गांगुली यानी अशोक कुमार। उसके बाद उनकी बहन सति देवी और फिर भाई अनूप कुमार और चौथे नंबर पर थे अशोक कुमार।
नटखट और रोमांटिक मिजाज के अशोक कुमार ने शादियां भी चार ही की थीं। पहली शादी रूमा देवी से, दूसरी शादी मधुबाला से, तीसरी शादी योगिता बाली से और चौथी और आखिरी शादी लीला चंदावरकर से की। इसके अलावा इस महान हस्ती ने 13 अक्तूबर 1987 को इस दुनिया से विदा ले ली। अगर 13 को 1+3 करें तो ये भी 4 ही बनता है।
बचपन में बेसुरे थे किशोर कुमार
अशोक कुमार ने एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि बचपन में किशोर की आवाज बेहद खराब थी। दरअसल इसके पीछे भी एक वजह है।
हुआ यूं कि बचपन में एक बार किशोर कुमार भागते हुए अपनी मां के पास किचन में आए और दुर्भाग्य से मां के पास रखी दरांती से उनके पैर की उंगली कट गई। उंगली बेहद बुरी तरह घायल हो गई थी। रो-रो कर बालक किशोर का बुरा हाल था। डॉक्टरों ने उनकी उंगली किसी तरह जोड़ तो दी लेकिन उस समय पेन किलर इतने ज्यादा नहीं हुआ करते थे इसलिए दर्द के मारे किशोर सारी-सारी रात रोते रहते थे।
15-20 दिनों तक जोर-जोर से रोने की वजह से किशोर कुमार की वोकल कॉर्ड्स पर असर पड़ गया और उनकी आवाज में अलग सा हस्कीपन आ गया। इसकी वजह से उनकी आवाज बाद में बेहद निखर के आई, जो दुनियाभर पर छा गई।
अशोक कुमार ने क्यों किशोर को बॉम्बे टॉकीज से निकलवाया
1950 के दौरान किशोर एक्टिंग में धीरे-धीरे अपने पैर जमा रहे थे। बॉम्बे टॉकीज में अच्छा खासा काम चल रहा था। इसी दौरान इनकी मुलाकात हुई रुमा गुहा से जो वहां एक फिल्म की शूटिंग कर रही थीं। दोनों के बीच दोस्ती हुई। वह मिलने लगे और धीरे-धीरे ये मुलाकातें प्यार में तब्दील हो गईं, जिसके बाद दोनों ने शादी का फैसला लिया। जब ये बात घर वालों तक गई, खासकर किशोर कुमार के घर तो हंगामा मच गया।
आभास कुमार गांगुली ब्राह्मण थे और रूमा देवी गैर ब्राह्मण थीं। आज से 63 साल पहले ये कोई आम बात नहीं थी। इस बात को लेकर उनके परिवार में मतभेद इतना बढ़ गया कि दादा मुनी भी नाराज हो गए। उन्होंने इस शादी को स्वीकार करने से साफ मना कर दिया। जब किशोर ने विरोध किया तो गुस्से की इम्तेहा में आकर उन्होंने किशोर को बॉम्बे टॉकीज और अपने घर दोनों से बाहर निकाल दिया। वो वक्त इस कपल के लिए सबसे मुश्किल भरा समय रहा।
उनके जीवन से जुड़ा खास नाम 'सचिन देव बर्मन'
अब उनके पास न काम था न घर, ऐसे वक्त में किशोर का साथ दिया उन्हें पहला ब्रेक देने वाले खेमचंद प्रकाश और सचिन देव बर्मन ने। सचिन देव बर्मन एक ऐसा नाम है जिसने किशोर कुमार के जीवन में बहुत बड़ा रोल अदा किया। सचिन किशोर से इतना प्यार करते थे कि उन्हें आउट ऑफ द वे जाकर भी उनकी मदद की। किशोर ने भी उनको हमेशा पिता के समान मान दिया।
स्टार बनने के बाद भी नटखट और शरारती किशोर केवल सचिन देव बर्मन के सामने बिल्कुल सीधे बन जाते थे। न कोई मस्ती न कोई मजाक। ये कहना गलत नहीं होगा कि सचिन देव बर्मन का 'किशोर कुमार-द स्टार' के जीवन में बहुत अहम रोल रहा। इतना ही नहीं किशोर और रुमा ने पहली बार मद्रास की हवाई यात्रा भी सचिन देव बर्मन की मदद से ही की। उन्हें अपने जीवन का पहला फिल्म फेयर अवार्ड भी उनकी मदद से ही मिला।
आठ फिल्मफेयर पुरस्कार के हकदार
संघर्ष और सफलता का दौर 1948 में 'ज़िद्दी' से शुरू हुआ। इस दौर में किशोर ने जो कुछ हासिल किया वह अकल्पनीय था। भारतीय सिनेमा में सहगल और रफी के बाद किशोर ही ऐसे तीसरे गायक थे, जिनके आसपास किसी और गायक को स्थान नहीं मिला। इस बात को आप इस तथ्य से भी काफी बेहतर तरीके से समझ सकते हैं कि किशोर कुमार ही एकमात्र ऐसे पुरुष पार्श्वगायक हैं, जिन्हें आठ बार फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।
1969 में पहली बार 'आराधना' के 'रूप तेरा मस्ताना...' के लिए, 1975 में अमानुष के 'दिल ऐसा किसी ने...' के लिए, 1978 में डॉन के 'खइके पान...' के लिए, 1980 में थोड़ी-सी बेवफाई 'हजार राहें...' के लिए, 1982 में नमकहलाल के 'पग घुंघरू...' के लिए, 1983 में अगर तुम न होते फिल्म के 'अगर तुम न होते...' के लिए, 1984 में शराबी के 'मंजिलें अपनी जगह हैं...' के लिए और 1985 में फिल्म सागर के 'सागर किनारे...' गाने के लिए फिल्म-फेयर पुरस्कार हासिल किया।
आज भले ही भारतीय संगीत जगत में नए नायकों के चेहरे सामने आए हैं जिनमें सोनू निगम और उदित नारायण जैसे नाम शामिल हैं, लेकिन कहीं न कहीं यह एहसास जरूर दिलाती हैं कि 'दूर गगन की छांव में' कुछ खो गया है। किशोर दा लोगों के दिलों में आज भी जिंदा हैं, जहां से आवाज निकलती है 'गाता रहे मेरा दिल...'
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