जोशीमठ का दर्द: दरकता विकास, सिसकता जन-जीवन
जोशीमठ पहाड़ के ढ़लान पर बसा है, ये जानते हुए भी इस संतुलन को चुनौती देने की कोशिश की गई जिसे प्रकृति ने एक झटके में सहन सीमा से अधिक होने पर नकार दिया। जोशीमठ में दिनों दिन तेजी से दरकते मकान और खिसकते पहाड़ ने जता दिया है कि प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ने के क्या नतीजे हो सकते हैं।
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तो क्या आदिगुरु शंकराचार्य की तपोभूमि जोशीमठ प्रकृति के विरुद्ध विकास की कीमत चुका रहा है? क्या देश के कई भागों में ठंड का ऐतिहासिक प्रकोप भी कुछ इन्हीं कारणों से है? क्यों दिल्ली का तापमान ठण्डे पर्यटन स्थलों से भी इतना नीचे गिरा कि पुराने रिकॉर्ड टूट गए? ये वो अनुत्तरित सवाल हैं जिनके जवाब जानते हुए भी शायद जल्द न मिल पाएं।
यदि ऐसा हुआ तो इसमें कोई शक नहीं कि तथाकथित विकास यात्रा की चुनौती बढ़ती चली जाएगी। वैसे अब यह भी चर्चा यदाकदा वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और जनसामान्य के बीच भले ही दबी जुबान हो, लेकिन चल पड़ी है कि प्रकृति को भला कौन चुनौती दे सकता है? सच भी क्योंकि जिस पृथ्वी की उत्पत्ति 4.537 अरब वर्ष यानी 450 करोड़ वर्ष से भी कहीं ज्यादा है और उस इतनी पुरानी पृथ्वी, आकाश और भूतल के बीच जो संतुलन बना हुआ था वह बिगड़ गया है। बस यही बुरी तरह से पर्यावरण को प्रभावित कर रहा है।
जोशीमठ पहाड़ के ढ़लान पर बसा है, जानते हुए भी इस संतुलन को चुनौती देने की कोशिश की गई जिसे प्रकृति ने एक झटके में सहन सीमा से अधिक होने पर नकार दिया। जोशीमठ में दिनों दिन तेजी से दरकते मकान और खिसकते पहाड़ ने जता दिया है कि प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ने के क्या नतीजे हो सकते हैं। फिर भी हम हैं कि मानते नहीं, सिलसिला लगातार जारी है।
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जोशीमठ के बिगड़ते हालात
पहाड़ों की दरकन के बीच धरती चीरकर तेजी से निकलता पानी, मलवा डरा रहा है। लगातार नम मिट्टी चिकनी होने और बेइंतिहा वजन से पहाड़ खिसकने के डर की जानकारी होकर भी चुप्पी साधना गैर जिम्मेदाराना है।
तमाम ऐतिहासिक स्थल, सड़कें, घरों और खेत-खलिहानों तक दरार या खाई जो भूमिगत कोयला खदानों के धंसने से गोफ जैसी होती हैं, उनमें तब्दील हो रहे हैं। ढ़ाई हजार साल पुराना मठ भी दरार की जद में है। गेटवे ऑफ हिमालय कहलाने वाले शहर में धरती की कोख जहां-तहां फट रही है। इससे जल निकासी और तमाम सीवर सिस्टम ध्वस्त हो गए हैं।
पहले की घटनाओं से नहीं ली गई सीख
1970 में भी जोशीमठ में जमीन धसने की घटनाएं घटी थीं। 1976 में गढ़वाल के तत्कालीन कमिश्नर एमसी मिश्रा के नेतृत्व में 18 सदस्यीय समिति बनी। हैरानी की बात है कि मिश्रा समिति की रिपोर्ट ने तभी बता दिया था कि जोशीमठ बहुत धीरे-धीरे ही सही पर डूब रहा है। धंसने, कटाव व रिसाव वाली जगहों को तत्काल भरकर वहां पर पेड़ लगवाएं जाएं ताकि प्राकृतिक माहौल में क्षतिपूर्ति की जा सके। लेकिन कमिश्नर मिश्रा पर ही सवालिया निशान उठा इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। नतीजा विकराल रूप से सामने है।
वैज्ञानिकों ने भी इस बात को चेताया था कि शहर का कोई ड्रेनेज सिस्टम नहीं है। बसाहट ग्लैशियर के रॉ मैटेरियल पर है। ऐसे तमाम तथ्यों के सामने आने के बाद भी अब तक तमाम सरकारें आईं और गईं, लेकिन संभावित मानव निर्मित ऐसी आपदाओं से बेखबर रहीं। अति का नतीजा अब किस अंत की ओर ले जाएगा यह बहुत डराता है। स्थिति समझकर भी कई प्रोजेक्ट शुरू हुए जिन्हें अब रोक दिया गया है।
अंधाधुंध विकास के नाम पर प्राकृतिक संरचनाओं से छेड़छाड़
दरकती जमीन पर एक जिम्मेदार रिपोर्ट ने पहले ही बता दिया था कि जोशीमठ के ढलान अस्थिर हो चुके हैं। साल 2013 में भी हाइड्रोपॉवर परियोजना से जुड़ी सुरंगों पर उंगलियां उठी थीं तो कुछ समय के लिए परियोजना रोकी गई। वहां की नगरपालिका को दरकते आशियाने देख पहले ही अंदेशा था। उसके हालिया सर्वे में करीब 3 हजार आबादी और साढ़े 500 से ज्यादा मकान असुरक्षित मिले थे। ये सबको पता था।
वहीं जोशीमठ रणनीतिक, धार्मिक और पर्यटन महत्व का अंतिम सीमावर्ती शहर है जो भूकंपीय क्षेत्र-5 की श्रेणी में है। दुर्भाग्यवश कभी बड़ा भूकंप आया तो पूरे इलाके में भारी जन और धन हानि के साथ संपत्ति का जो नुकसान होगा वो किसी के रोके नहीं रुकेगा।
नए साल के दूसरे-तीसरे दिन से ही धरती चीरकर मलवे सहित निकलता पानी और धंसती जमीन बिना भूकंप के बड़ी चेतावनी है। विकास और बेतरतीब बस्तियों को बनाने, बढ़ाने और संवारने का सिलसिला चेतावनियों के बाद भी क्यों नहीं रुका? उत्तराखण्ड पहले ही कई भयावह तबाही देख चुका है। भविष्य में जोशीमठ की क्या स्थिति होगी कोई नहीं जानता?
ये संरक्षित किए जाने वाले इलाकों में अंधाधुंध विकास के नाम पर प्राकृतिक संरचनाओं से छेड़छाड़ का नतीजा है। दुखद पहलू यह है कि क्या देश और क्या दुनिया, सबके सब जानकर भी अनजान रह कर बदस्तूर प्रकृति को ही चुनौती दे अपने विकास की गाथा लिखने में मशगूल रहते हैं।
काफी कुछ हमारे हाथ से निकल गया है लेकिन वक्त है कि इसे सुधारा और संभाला जाए। पूरी ईमानदारी से सोचा जाएगा तभी तो बात बनेगी वरना रस्म अदायगी से कुछ हासिल होने वाला नहीं। चाहे जोशीमठ की दरकन और रिसाव हो या बीती आपदाएं, दिखावे की बैठकें और असल अनदेखी से मुंह चुराने से वह दिन भी आ सकता है जब एक झटके में प्रकृति अपने स्वरूप को खोने की सहनशीलता खो दे और कहीं नए प्रलय को अंजाम न दे दे?
मानवता, भावी पीढ़ी, जीव-जन्तुओं, वनस्पतियों के साथ प्रकृति के हित में ईमानदार कोशिश जरूरी है। हां, जोशीमठ में दरकते आशियाने और सिसकते इंसानों की चीख पुकार ने द्रवित कर दिया है। पहाड़ की नाराजगी दिखने के बावजूद जिम्मेदार चुप बैठे रहे। नतीजा सामने है, काश ऐसी पुनरावृत्ति दोबारा न होती।
लापरवाही से विकास की गाथा और सभ्यता का इतिहास कब प्रलय बन फिर ऊसी धरती में दफन हो जाएगा पता भी नहीं चलेगा। नई दुनिया को दोबारा बनने में कितने करोड़ों वर्ष लगेंगे क्या पता? अच्छा होता कि इस हकीकत को जानकर भी अनजान न बनें और प्रकृति को चुनौती देना छोड़ सामंजस्य बिठाने की दिशा में तेजी से बढ़ें।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।