झारखंड सियासी डायरी: तो क्या श्रापित है झारखंड में सीएम की कुर्सी ?
- प्रदेश में अब तक मुख्यमंत्री के छह चेहरे बने हैं।
- शिबू सोरेन से लेकर, अर्जुन मुंडा और बाबूलाल मरांडी जैसे नेता भी पांच साल नहीं बैठ सके कुर्सी पर।
- सिर्फ रघुवर दास ने जैसे-तैसे पांच साल तक पूरा किया कार्यकाल
- अब हेमंत सोरेन के ऊपर मंडरा रहा खतरा।
- एक साल अभी शेष है कार्यकाल पूरा करने में, गिरफ्तारी की लटकी है तलवार।
- तीन बार राष्ट्रपति शासन भी लग चुका है प्रदेश में।
- हेमंत सोरेन 2013-14 में भी नहीं पूरा कर सके थे कार्यकाल।
- 2023 में चार साल का कार्यकाल पूरा कर पहले आदिवासी मुख्यमंत्री बन चुके हैं हेमंत सोरेन।
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विस्तार
साल 2000 में बिहार से कटकर अलग राज्य का दर्जा प्राप्त करने वाले झारखंड में सियासत एक बार फिर करवट लेने को विवश दिख रही है। छोटा सा यह राज्य अपने शैशव काल से ही इस
तरह की विवशता देखने का आदि हो चुका है। इस राज्य में मुख्यमंत्री की कुर्सी के साथ विवशता का विष हमेशा से ही हावी रहा है। विष का असर ऐसा कि कोई भी मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा ही नहीं कर सका।
रघुवर दास ने जब मुख्यमंत्री के तौर पर अपना पांच साल का कार्यकाल 2014 से 2019 तक पूरा किया तब लगा था कि इस कुर्सी से अपशगुन का साया हट गया है। पर एक बार फिर सियासी बयार इसी अपशगुन की तरफ इशारा कर रहे हैं कि झारखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी सही में शापित है।
मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपशगुन का साया इस कदर हावी रहा है कि झारखंड के बड़े नेता माने जाने वाले शिबू सोरेन और अर्जुन मुंडा तीन-तीन बार मुख्यमंत्री बनने के बावजूद कभी पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। मुख्यमंत्री के तौर पर हेमंत सोरेन दूसरी बार झारखंड की कमान संभाल रहे हैं। पर श्राप ऐसा है कि पहली बार की तरह इस बार भी उनका कार्यकाल पूरा होने की संभावना कम दिख रही है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को ईडी का सात बार समन मिल चुका है। हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक हेमंत गुहार लगा चुके हैं। सभी जगह से निराशा हाथ लगने के बाद अब ईडी के संभावित सख्त कदम को देखते हुए हेमंत खुद ही बैकफुट पर नजर आ रहे हैं। जल्द ही वह ईडी के सामने पेश होंगे। यह आशंका बलवति है कि उन्हें देर सबेर गिरफ्तार भी किया जा सकता है। ऐसे में हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री की कुर्सी अपनी पत्नी कल्पना सोरेन को देने का मन बना चुके हैं। प्लॉट भी तैयार हो चुका है। बस इस पर मुहर शेष है।
पहले आदिवासी मुख्यमंत्री जिन्होंने लगातार चार साल कुर्सी संभाली
हेमंत सोरेन ने 29 दिसंबर को अपनी सरकार की चौथी सालगिरह मनाई थी। यह चौथी सालगिरह हालांकि उनके लिए एक तरह से रिकॉर्ड ही बनाकर गई है। वह प्रदेश के पहले आदिवासी मुख्यमंत्री बन चुके हैं जिन्होंने लगातार चार साल मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली है। पर पांचवें सालगिरह का शगुन उन्हें मिल पाता है या नहीं इस पर सभी की नजर बनी हुई है।
हालांकि बुधवार तीन जनवरी को रांची में सत्ताधारी गठबंधन के विधायक दल की बैठक के बाद फिलहाल इस कयास पर विराम लग गया है। इस बैठक में तय हुआ कि नेतृत्व परिवर्तन नहीं होगा। हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री हैं और रहेंगे। उधर, तीन जनवरी को ही प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीम ने मुख्यमंत्री के करीबियों पर शिंकजा कसते हुए छापेमारी करते हुए स्पष्ट संदेश दे दिया है कि आने वाले कुछ दिनों में बहुत कुछ हो सकता है।
इससे पहले साल 2023 के अंतिम दिन पार्टी के वरिष्ठ नेता डॉ. सरफराज अहमद 'पार्टी हित' में अपना इस्तीफा विधानसभा अध्यक्ष को सौंप चुके हैं। उनका इस्तीफा स्वीकार भी हो चुका है। वे गिरिडीह जिले के गांडेय सीट से विधायक थे। कयास लग रहे हैं कि उसी सीट से पार्टी कल्पना सोरेन को उपचुनाव में खड़ा करेगी। चुनाव की संभावना पर भी संकट के बादल हैं क्योंकि एक साल से कम का कार्यकाल बचा हुआ है। विधायक दल की बैठक में भी सरफराज अहमद भी शामिल हुए थे। जब उनसे पूछा गया कि तकनीकि तौर पर आप विधायक तो हैं नहीं फिर इस बैठक में शामिल होने क्या औचित्य था? मुस्कुराहट के साथ उन्हानें पत्रकारों के सवाल का जवाब देते हुए कहा कि उन्हें बुलाया गया था इसीलिए वे शामिल हुए थे। उनकी मुस्कुराहट में बहुत कुछ छिपा था।
बुधवार को ही बैठक के साथ-साथ ईडी ने भी अपने तेवर दिखा दिए हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि क्या झारखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी अपने श्राप से मुक्त हो पाएगी? या एक बार फिर वर्तमान मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा किए बिना रुख्सत हो जाएंगे।
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