झारखंड चुनाव : जमीन पर कुछ ऐसी है भाजपा की हालत, आंकड़े कुछ और समीकरण कुछ और
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झारखंड विधानसभा के चुनावी समर में भारतीय जनता पार्टी आंकड़ों में बेहद मजबूत दिख रही है लेकिन बदले हुए राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में सामाजिक समीकरण कुछ और ही संकेत दे रहा है। झारखंड प्रांत के अस्तित्व में आने के बाद राज्य में अबतक तीन चुनाव हुए हैं। इन तीनों चुनावों के आंकड़े बेहद रोचक रहे हैं।
झारखंड विधानसभा चुनाव 2019 का परिणाम क्या होगा यह तो समय बताएगा, लेकिन तमाम आंकड़े फिलहाल भाजपा की तरफ संकेत दे रहे हैं। यदि हम झारखंड विधानसभा आंकड़ों के रुझान को देखें तो 2005 से लेकर अबतक भाजपा के वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई है। झारखंड में भाजपा की मुख्य प्रतिपक्षी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा का वोट प्रतिशत स्थिर है। वहीं कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के वोट प्रतिशत में भयंकर गिरावट दर्ज की गई है।
झारखंड के प्रथम विधानसभा चुनाव वर्ष 2005 में भाजपा ने 63 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। इस विधानसभा चुनाव में भाजपा को 30.19 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि झारखंड मुक्ति मोर्चा को 24.04, कांग्रेस को 22.74 और आरजेडी को 13.14 प्रतिशत वोट मिले।
2009 के विधानसभा चुनाव में वोट प्रतिशत का चित्र बिलकुल बदल गया। इस चुनाव में कांग्रेस और प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा ने संयुक्त रूप से चुनाव लड़ा और दोनों के वोट प्रतिशत में अप्रत्याशित रूप से बढ़ोतरी हुई थी।
चुनाव परिणाम के आंकड़े बताते हैं कि इस चुनाव में जेवीएम को 28.24 प्रतिशत वोट मिले जबकि कांग्रेस को 21.43 प्रतिशत वोट मिले थे। 2009 के विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टी मिलकर 25 सीटें जीती थी। यह नया प्रयोग था और दोनों पार्टियों को इससे फायदा हुआ था।
इस चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा और भाजपा दोनों को घाटा हुआ था। झामुमो को मात्र 15.79 प्रतिशत वोट मिले जबकि भाजपा का वोट घटकर 24.44 प्रतिशत तक आ गया। 2014 के चुनाव में भाजपा ने 72 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए और इस चुनाव में ऑल झारखंड एस्टूडेंट यूनियन के साथ भाजपा का पूर्ण रूपेण गठबंधन था तो भाजपा का प्रदर्शन अभी तक का सबसे बढ़िया रहा।
इस चुनाव में भाजपा को कुल 35.16 प्रतिशत वोट मिले जबकि कांग्रेस का वोट घटकर 13.78 पर आ गया। इस चुनाव में झामुमो ने थोड़ा इज्जत बचाया और उसका वोट बढ़कर 20.93 प्रतिशत पर चला गया। यहां यह भी बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में जेएमएम का वोट घटकर 9 प्रतिशत के आसपास चला गया था। 2014 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी को 12.69 प्रतिशत वोट मिला था।
झारखंड विधानसभा चुनाव 2019 का राजनीतिक समीकरण पूर्ण रूप से बदल चुका है। इस चुनाव में भाजपा अकेले दम पर चुनाव मैदान में है। आजसू के साथ भाजपा का गठबंधन टूट गया है। इस बार झारखंड विकास मोर्चा भी अकेले चुनाव मैदान में है।
गठबंधन के नाम पर झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और आरजेडी ने एक मोर्चा बनाया है। इसके अलावा वाम विचारधारा की चारों पार्टियों ने साफ कर दिया है कि जहां से वाम उम्मीदवार नहीं होंगे वहां वाम दलों के कैडर भाजपा को हराने वाली पार्टी को अपना वोट देंगे।
संयुक्त वाम दलों का दावा है कि पूरे प्रदेश में उनका चार प्रतिशत के करीब वोट है। यह वोट यदि सचमुच भाजपा के विरोध में ध्रूविकृत हो जाता है तो प्रतिपक्षी गठबंधन को इसका लाभ मिलेगा और भाजपा को संकट का सामना करना पड़ सकता है।
इस बार के विधानसभा चुनाव की स्थिति कमोबेश 2009 जैसी दिख रही है। 2009 में भाजपा की पूरी कमान रघुवर दाव के जिम्मे था। चूंकि वे उस समय भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे इसलिए टिकट के बंटवारे में भी उनकी अहम भूमिका थी। इस बार वे प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। चर्चा है कि इस बार भी टिकट के बंटवारे में मुख्यमंत्री रघुवर दास की ही चली है।
सरयू राय के टिकट पर संशय के बाद इस आशंका को और अधिक बल मिला है। यही नहीं निरसा, पांकी, विशुनपुर, हटिया, जरमुंडी, जामतारा, चक्रधरपुर, बहरागोड़ा आदि विधानसभा की सीटों पर मुख्यमंत्री अपने नजदीकियों को टिकट दिलाने में कामयाब रहे हैं। जानकारों की मानें तो 2009 के चुनाव में भी दास ने अपने नजदीकियों को टिकट दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी।
हालांकि उस समय आजसू के साथ संबंध उतना खराब नहीं था, लेकिन इस बार तो ऐन मौके आजसू ने भी भाजपा का साथ छोड़ दिया है बावजूद इसके आंकड़े भाजपा के साथ हैं। कुल मिलाकर राजनीतिक समीकरण के आधार पर देखें तो भाजपा की स्थिति कमजोर दिख रही है लेकिन आंकड़े के विश्लेषण में भाजपा अभी भी प्रदेश के अन्य दलों की तुलना में आगे है।
कुल मिलाकर देखें तो झारखंड में भाजपा का आधार वोट बैंक लगभग 30 प्रतिशत के आसपास है। कांग्रेस का वोट बैंक 20 प्रतिशत के आसपास है और जेएमएम का वोट बैंक लगभग 20 प्रतिशत के आसपास है।
आरजेडी का वोट बैंक 5 से लेकर 10 प्रतिशत के आसपास है। हालांकि काल और परिस्थितियों के आधार पर पार्टियों के ये आधार वोट घटते बढ़ते रहते हैं लेकिन इन वोटों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। यदि लोकसभा चुनाव के प्रतिशतों पर नजर दौराएं तो भाजपा की स्थिति बेहतर रही है।
झारखंड में विगत् दो लोकसभा के चुनाव में भाजपा को अपार सफलता हाथ लगी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को कुल 14 लोकसभा की सीटों में से 12 सीटें मिली थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को उतनी ही सीटें मिली।
हालांकि यहां यह बता देना जरूरी है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा आजसू के साथ चुनाव लड़ी और उसके लिए भाजपा ने लोकसभा की एक सीट आजसू के लिए छोड़ी थी। इस सीट पर आजसू विजय हुई। वैसे भी लोकसभा के चुनावों में
झारखंड वाले क्षेत्र में भाजपा की स्थिति मजबूत रही है। इस मामले में विश्लेषण बताता है कि झारखंड में लोकसभा का चुनाव विशुद्ध रूप से राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़ा जाता है, जिसके कारण भाजपा को यहां से फायदा होता है जबकि विधानसभा का चुनाव विशुद्ध रूप से स्थानीय मुद्दों पर लड़ा जाता है यही करण है कि भाजपा को समय-समय पर परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
2014 के लोकसभा चुनाव में यह साफ देखने को मिला। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 41 प्रतिशत के आसपास वोट मिले थे लेकिन उसी साल हुए विधानसभा के चुनाव में भाजपा का वोट 5 प्रतिशत के करीब घट गया, जबकि लोकसभा चुनाव में जेएमएम को साढे नौ प्रतिशत के करीब में वोट मिले थे लेकिन विधानसभा चुनाव में जेएमएम ने अपना वोट प्रतिशत बढ़ा लिया और उसे 20 प्रतिशत से अधिक वोट मिले।
अभी चुनाव परिणाम की भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी लेकिन जो परिस्थितियां सामने आ रही है उसमें भाजपा को तसल्ली से परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। दूसरी बात यह है कि इस चुनाव में मुद्दे कौन-कौन से हावी होते हैं।
यदि भाजपा के द्वारा फेंके जा रहे मुद्दे, जैसे-स्थाई सरकार, विकास, आतंकवाद और नक्सलवाद का खत्मा, सुरक्षा, कानून का राज आदि विषय पर चुनाव केन्द्रित हुआ तो फिर भाजपा को हराना आसान नहीं होगा, लेकिन क्षेत्रीयता, जातीयता और साम्प्रदायिकता हावी हुआ तो इसका फायदा प्रतिपक्षी गठबंधन को मिलना तय है।
दरअसल, जो परिस्थितियां बनी हैं उसमें प्रतिपक्षी वोटों का ध्रूविकरण होता साफ दिख रहा है, जबकि भाजपा के पक्ष में जो वोट पड़ते रहे हैं उसके बिखराव साफ दिख रहा है। ऐसे में भाजपा के लिए यह चुनाव अहम है।
इस चुनाव में भाजपा के अंदर के अंतरविरोध भी साफ-साफ दिख रहे हैं। यदि भाजपा का प्रदर्शन ठीक नहीं रहा है तो यह मुख्यमंत्री रघुवर दस के लिए भी अच्छा नहीं होगा। सीधे तौर पर देखें तो इस चुनाव में मुख्यमंत्री रघुवर दास की प्रतिष्ठा दाव पर लगी है। मुख्यमंत्री रघुवर दास खुद जमशेदपुर पूर्व से उम्मीदवार हैं।
चक्रधरपुर से प्रदेश भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुवा ने भी ताल ठोक दी है। पहले यह लग रहा था कि प्रदेश के अध्यक्ष गिलुआ इस बार चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन अंत में उन्हें भी टिकट दे दिया गया है। भाजपा की रणनीति के जानकार वरिष्ठ पत्रकार संजीव पांडेय बताते हैं कि भाजपा आलाकमान ने झारखंड चुनाव में मुख्यमंत्री रघुवर दास को पूरी आजादी सौंप दी है। टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव प्रबंधन और प्रचार तक में इसके चिन्ह दिख रहे हैं। ऐसे में रघुवर विरोधी गुटों का अंतरघात का खतरा भी बढ़ गया है।
हालांकि भाजपा के केन्द्रीय नेता इस डैमेज को कंट्रोल करने के लिए राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री सौदान सिंह को रांची भेजा है लेकिन सौदान सिंह के रहते कई पुराने भाजपायी पार्टी छोड़ कर दूसरी पार्टी ज्वाइन कर चुके हैं।
राज्य के चुनाव प्रभारी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के खास माने जाने वाले ओम प्रकाश माथुर लगातार प्रदेश में कैंप कर रहे हैं। परिस्थितियों का निर्माण तो भाजपा कर रही है लेकिन यह परिस्थिति भाजपा को कितना फायदा पहुंचाएगा इसका अनुमान अभी नहीं लगाया जा सकता है।
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