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जीवन धारा: धैर्य ही बुद्धत्व का मूल मंत्र है, बाधाओं को स्वीकारना ही सूत्र

Sri Sri Ravi Shankar श्री श्री रविशंकर 
Updated Fri, 16 May 2025 05:25 AM IST
सार

मानव जीवन, अध्यात्म में रुचि और संत का सान्निध्य बड़ी मुश्किल से मिलता है। यदि ये सब चीजें मिल भी जाएं, तो बुद्धत्व या मोक्ष की प्राप्ति के लिए बिना घबराए प्रेमपूर्वक प्रतीक्षा सबसे आवश्यक अंग है।

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Jeevan Dhara Patience is basic mantra of wisdom accepting obstacles is the key
गौतम बुद्ध के अनमोल विचार - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

जीव को तीन चीजों की उपलब्धि बहुत कठिन है। पहला, मनुष्य जीवन। दूसरा, मनुष्य जीवन मिलने पर अध्यात्म में रुचि और साधना। समाज में कुछ लोगों को ही अध्यात्म और साधना का स्वाद लगता है और यह स्वाद एक प्रसाद है। अधिकतर लोग तो एक मशीन की तरह जी रहे हैं-बस खाना, पीना और सोना। उन्हें जीवन के वास्तविक मूल्यों का कुछ पता नहीं। ऐसे लोगों के जीवन की कोई सार्थकता नहीं। यह उनका दुर्भाग्य है। ऐसे भाग्यहीन लोगों को जीवन की नश्वरता और परिवर्तनशीलता की भनक तक नहीं पड़ती। हालांकि, यही जीवन का सत्य है और इसी से जीवन मूल्यवान है।

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तीसरी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है, किसी संत या सद्गुरु का सान्निध्य, जो बहुत मुश्किल से मिलता है। इसके लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। उचित समय पर यह भी हो जाता है, लेकिन तब तक असीम धैर्य और प्रतीक्षा की जरूरत होती है। एक महात्मा के दो शिष्य थे। उनमें से एक वृद्ध था, उनका बहुत पुराना और पक्का अनुयायी, कड़ी साधना करने वाला। एक दिन उसने गुरु से पूछा, ‘मुझे मोक्ष या बुद्धत्व की प्राप्ति कब तक होगी?’ गुरु बोले, ‘अभी तीन जन्म और लगेंगे। यह सुनते ही शिष्य ने कहा, मैं बीस वर्षों से कड़ी साधना में लगा हूं, मुझे क्या आप अनाड़ी समझते हैं। बीस साल की साधना के बाद भी तीन जन्म और! नहीं, नहीं।’ वह इतना क्रोधित और निराश हो गया कि उसने उसी वक्त अपनी माला तोड़ दी, आसन पटक दिया और चला गया।
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दूसरा अनुयायी एक युवा लड़का था, उसने भी यही प्रश्न किया। गुरु ने उससे कहा, ‘तुम्हें बुद्धत्व प्राप्त करने में इतने जन्म लगेंगे, जितने इस पेड़ के पत्ते हैं।’ यह सुनते ही वह खुशी से नाचने लगा और बोला, ‘वाह, बस इतना ही! और इस पेड़ के पत्ते तो गिने भी जा सकते हैं। वाह, आखिर तो वह दिन आ ही जाएगा। इतनी प्रसन्नता थी उस युवक को, इतना था उसका संतोष, धैर्य और स्वीकृति भाव। बताते हैं कि उस युवक को उसी वक्त बुद्धत्व प्राप्त हो गया। धैर्य ही बुद्धत्व का मूल मंत्र है, अनंत धैर्य और प्रतीक्षा। परंतु प्रेम में प्रतीक्षा बड़ी कठिन होती है।
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ज्यादातर लोग जीवन में प्रतीक्षा निराश होकर ही करते हैं, प्रेम से नहीं कर पाते। प्रतीक्षा भी दो प्रकार की होती है। एक है निराश मन से प्रतीक्षा करना और निराश होते जाना। दूसरी है प्रेम में प्रतीक्षा, जिसका हर क्षण उत्साह और उल्लास से भरा रहता है। ऐसी प्रतीक्षा अपने में ही एक उत्सव है, क्योंकि मिलन होते ही प्राप्ति का सुख समाप्त हो जाता है। प्रतीक्षा प्रेम की क्षमता और हमारा स्वीकृति भाव बढ़ाती है। अपने भीतर की गहराई को मापने का यह एक सुंदर पैमाना है। यह प्रेम-पथ स्वयं में पूर्ण है और जीवन से जुड़ा हुआ है। इस पथ ने प्रेम, ज्ञान, कर्म सेवा सबको अपने भीतर समाहित कर लिया है, ताकि विशुद्ध चेतना का झरना बहता रहे। बुद्धत्व, किसी भी व्याख्या से परे, शिकायत की हदों से पार की अवस्था है-एक अनुभूति है।


सूत्र- बाधाओं को स्वीकारें
जीवन की लय कभी सीधी नहीं होती। कुछ भी करो, दुख और सुख, दोनों जीवन में रहेंगे। बाधाएं आ जाएं, तो इन्हें रास्ते के पत्थर की तरह नहीं, बल्कि प्रगति की सीढ़ी की तरह स्वीकार करना ही उचित है। प्रगति के पथ पर ‘बाधा’ तो एक अवश्यंभावी पड़ाव है। मन में सकारात्मक विचार रखें और सभी बाधाओं को पार कर जाएं।

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