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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Jeevan Dhara Knowing your nature is enough adopt formula of loving work

जीवन धारा: अपने स्वभाव को जानना ही पर्याप्त है, काम से प्रेम करने का सूत्र अपनाएं

Sri Sri Ravi Shankar श्री श्री रविशंकर 
Updated Thu, 28 Aug 2025 08:16 AM IST
सार

जब भी आप तृप्त होते हैं, शांत होते हैं, प्रसन्न होते हैं, आनंदित होते हैं, तभी आप अपने असल स्वभाव में होते हैं। इसी को कहते हैं चेतन मन, सच्चिदानंद।

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Jeevan Dhara Knowing your nature is enough adopt formula of loving work
काम से प्रेम करने का सूत्र अपनाएं - फोटो : अमर उजाला / एएनआई

विस्तार

तुम्हारा स्वरूप और स्वभाव क्या है? बस इतना ही जानना है। छुटपन का चित्र आप देखो, पांच-दस साल पहले के चित्र, वे आप ही तो हो, मगर आप तो बदल गए हैं! अब तो बाल भी थोड़े सफेद होने लगे, चेहरा भी कुछ बदल गया, वजन कुछ बढ़ता है, घटता है, कभी कुछ होता है, कभी कुछ। शरीर में बदलाव होता है। इसी प्रकार मन में भी बहुत बदलाव आते हैं।

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याद करो, इतनी छोटी-छोटी बातों पर आप परेशान रहते थे, अब नहीं होते। कुछ फर्क तो आ गया है न मन में? मन में परिवर्तन आ गया, तो मैं मन भी नहीं हूं। मन में कभी क्रोध आता है, मगर आप हमेशा क्रोधित हो क्या? चिंतित तो रहते हो, मगर हमेशा चिंतित नहीं। मगर कुछ स्वभाव हम में है, जो हमेशा है। वह क्या है, यह जान लेना है।
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आप वही हो, जो दस-पंद्रह साल पहले स्कूल जाया करते थे, वही हो न? कुछ आप में है, जो बदला नहीं। बस, इसको हमें निश्चय कर लेना है। यह खुद को जान लेना है, हमारे स्वभाव को जान लेना। हमारा स्वभाव ही परमात्मा है। परमात्मा कहीं ऊपर नहीं बैठा है, उसकी प्राप्ति कर लेना, यह कार्य नहीं है। परमात्मा तो हमारा स्वभाव है। हमारा स्वभाव यानी हमारा मन नहीं, मन में जो रंगीन-रंगीन अलग-अलग किरणें चढ़ती-उतरती रहती हैं, वो रंग नहीं है।
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भीतर अंत:स्थल में जो है, ऊर्जा कहो, शक्ति कहो, कुछ भी कहो, वही परमात्मा है। तृप्ति है, वही आपका स्वभाव है। जब भी आप तृप्त होते हैं, जब भी आप शांत होते हैं, जब भी आप प्रसन्न होते हैं, आनंदित होते हैं, तब आप अपने स्वभाव में होते हैं। इसी को कहते हैं चेतन मन, सच्चिदानंद। मन की तरंग जब शांत हो जाती है, फिर जो चाहे होवे जग माही, प्रभु प्रताप कछु दुर्लभ नाहीं।

हम प्रसन्न बिना कारण के होते हैं, जब दुखी होते हैं, किसी कारण से दुखी होते हैं। बच्चों को देखिए, बिना कारण प्रसन्न रहते हैं, चित्त जो है, प्रसन्न है। प्रसन्न चित्त जो है न-मान लीजिए कोई हंस रहा है जोर से, मगर यह जरूरी नहीं कि वह प्रसन्न है भीतर से। मान लीजिए, कोई शराब पी रहा है, लग रहा है कि उसको मस्ती चढ़ रही है, मगर वह मस्ती तो नहीं चढ़ रही है!

वह पीकर, उस समय में अपनी सारी बातों को भूलने की कोशिश कर रहा है। प्रसन्नता माने क्या? जिसमें मन शांत हो, खुश हो, मगर ज्वर न हो। जिस खुशी में ज्वर होता है, वही खुशी आदमी को दुखी भी बना देती है। जरा कल्पना करके तो देखो, घर पर सोएंगे, फिर उठेंगे, खाना खाएंगे, कुछ भी करेंगे, जीवन ऐसे ही निकल जाएगा।

यह जगत परिवर्तनशील है, दिमाग में, मन में, अनुभव में जाकर हम देख लें। तब हम इन छोटी-छोटी बातों को लेकर दुखी नहीं होंगे। नहीं तो मन में एक अफसोस बना रहता है कि उसने ऐसा किया, इसने ऐसा क्यों कहा। चाहते हो सभी मेरे जैसे हो जाएं, तो क्या यह संभव है?

असंभावनाओं को लेकर हम बैठे हैं, इसलिए हम दुखी हो जाते हैं। जब विवेक से देखते हैं, तो ये बादल जो छा जाते हैं, मन में, सब छंटकर दूर हो जाएंगे, फिर एकदम जागृति, प्रसन्नता, प्रेम। जीवन ऐसा प्रेम से चमक जाएगा, देखो फिर आनंद ही आनंद है।


सूत्र: काम से प्रेम करें
जीवन में चार वस्तुओं की आवश्यकता है। भक्ति, शक्ति, मुक्ति और युक्ति। भक्ति और मुक्ति से भीतर का जीवन शांत, प्रसन्न और प्रेममय होता है। युक्ति और शक्ति से बाहरी जीवन परिपूर्ण हो जाता है। जीवन में सफल और अच्छा इन्सान बनने के लिए अपने काम से प्रेम करें।

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