जमनालाल बजाज पुरस्कार: नीलेश देसाई को इस वर्ष सम्मान, जल संरक्षण को लेकर किया अथक प्रयास
नीलेश और उनके मित्रों ने नुक्कड़ नाटक, गीत, पोस्टर, बैनर आदि के माध्यम से लोगों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक करके इस दिशा में सराहनीय कार्य किया है।
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मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में सन 1987 से भील और भिलाला समुदाय के उत्थान के लिए काम कर रहे नीलेश देसाई को इस वर्ष के प्रतिष्ठित “जमनालाल बजाज” पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। जमनालाल बजाज प्रतिष्ठान के डाक्टर आर.ए माशेलकर और शेखर बजाज ने कहा कि नीलेश को सन 2022 का पुरस्कार देते हुए प्रतिष्ठान गर्व महसूस कर रहा है क्योंकि निलेश ने सृजनात्मक कार्य के श्रेणी में असाधारण काम तीन से ज्यादा दशकों से किया और देश के अति पिछड़े इलाके में एक मॉडल प्रस्तुत किया है। इस पुरस्कार में दस लाख रुपये के साथ प्रतीक चिन्ह और प्रमाणपत्र दिया जाता है।
झाबुआ कई लोगों कि कर्मभूमी रही है और आज जो अति पिछड़े आदिवासी नए रंग- रूप और स्वरूप में दिखते हैं उसके लिए कई लोगों का अनथक प्रयास रहा है। आजादी के आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले चन्द्रशेखर आजाद का जन्म भी यहीं हुआ था। मामा बालेश्वर दयाल जैसे समाज कर्मियों से लेकर साधना खोचे, हेर्विग स्ट्रीब्यूल और पदमश्री जनक पलटा की भी यह जिला कर्मभूमी रही है।
इंदौर स्कूल ऑफ सोशल वर्क से एमएसडब्ल्यू करने के बाद निलेश देसाई, जो मूलतः गुजरात के रहने वाले है, तिलोनिया (अजमेर) चले गए और वहां पर अरुणा राय की संस्था में समाज विज्ञान का ककहरा सीखा। तीन वर्ष तक सोशल वर्क एंड रिसर्च सेंटर पर अलग-अलग तरह के काम किए और उस दौरान वे कई तरह के समुदाय और संस्थाओं के साथ मिले।
जल संरक्षण को लेकर किया काम
भारत सरकार ने उस समय 10 जिलों को पानी की गंभीर समस्या को देखते हुए चयनित किया था जहां पर स्वैच्छिक संस्थाओं की मदद से कुछ काम करने का इरादा किया था। सातवें वित्त आयोग के अंतर्गत टेक्नोलॉजी मिशन ने यह काम अपने हाथ में लिया था और बंकर रॉय उस समय योजना आयोग में सलाहकार थे।
इन 10 जिलों में काम करने का मुख्य उद्देश्य था कि लोगों की जनभागीदारी से पानी की समस्या का स्थाई हल निकाला जाए और पानी के संरक्षण का काम किया जाए। बरसात की एक भी बूंद कहीं पर बह न जाए यह प्रयास किया जाना था।
मप्र का झाबुआ उनमें से एक जिला था। 1987 में यह काम आरंभ हुआ और झाबुआ की रैंकिंग सूखे प्रभावित जिलों में थी जहां मुख्यरूप से पहाड़ों और डूंगर वाला इलाका था। कई प्रकार की चुनौतियों के साथ पानी बचाने का काम शुरू हुआ। उस दौरान नीलेश ने देखा कि यहां पर भील- भिलाला समुदायों के साथ काम करने का अलग अंदाज भी है और बहुत बड़ी चुनौतियां भी हैं। पूरे इलाके में शोषण भयंकर है, सरकारी- गैर सरकारी स्तर पर तो है ही, साथ ही छोटे-छोटे गांव और कस्बों में व्यापारियों का एक संगठित नेटवर्क है जो इनका शोषण करता है।
भील- भिलाला समुदायों को जोड़ने का प्रयास
राजस्थान में संस्थाओं के काम करने के लिए बहुत अच्छा माहौल है, परंतु मध्यप्रदेश जैसे पिछड़े इलाके में उस समय भी और अभी भी स्वैच्छिक संस्थाओं के लिए माहौल नहीं था। काम की शुरुआत हुई तो लोगों को जोड़ना बहुत मुश्किल था। लोग अक्सर इन लोगों को देखकर जंगलों में भाग जाते थे और बात करने के लिए तैयार नहीं होते थे।
नीलेश और उनके कुछ मित्रों ने देखा कि यहां पर तेजाजी उत्सव बड़े पैमाने पर मनाया जाते हैं और तेजाजी जयंती के दौरान गांव-गांव में मेले लगते हैं। बस उन्होंने इसी आइडिया को पकड़कर अपने काम की शुरुआत की और सभी मेलों में पानी संरक्षण के छोटे-छोटे स्टॉल लगाना शुरू किए। इसका बड़ा फायदा हुआ और लोग जुड़ने लगे, क्योंकि पानी उनके जीवन से भी जुड़ा था।
नीलेश और उनके मित्रों ने नुक्कड़ नाटक, गीत, पोस्टर, बैनर आदि बनाए जो पानी के संरक्षण को लेकर थे और इनका प्रदर्शन बड़े स्तर पर हर जगह किया।
1990 के आते-आते यह काम बड़ा प्रचलित हुआ और इसकी वजह से पानी स्थानीय स्तर पर एक बड़ा मुद्दा बना जिसमें समुदाय के लोगों के साथ- साथ प्रशासन भी जुड़ा। 1990 में संपर्क संस्था का सोसायटी एक्ट में पंजीयन हुआ और इस तरह से संस्था का काम विधिवत आरंभ हुआ। 'गांव का पानी गांव में' जैसा नारा लगाकर जो काम शुरू हुआ था उससे खेती, शिक्षा और स्वास्थ्य के नए आयाम भी जुड़े, सीड बैंक की शुरुआत हुई और 1994 में शिक्षा का पहली बार कोई प्रोजेक्ट मिला।
इसमें ऐसे बच्चे आकर जुड़े जो अपनी पीढी के पहले बच्चे थे जो सीधे-सीधे शिक्षा से जुड़े थे, अभी भी नुक्कड़ नाटक समुदाय को जोड़ने का सशक्त माध्यम था।
संपर्क संस्था का काम फैलने लगा और संपर्क ने रायपुरिया और पेटलावद के बीच में 7 बीघा जमीन खरीदी और यहां पर एक छोटा सा प्रदर्शन क्षेत्र बनाया और अपना ऑफिस शुरू किया। शुरुआत में लोगों को बहुत विरोध का सामना करना पड़ा परंतु धीरे-धीरे लोगों को समझ में आया कि यह उनके लिए ही है और उनके फायदे के लिए ही संस्था काम कर रही है।
संपर्क ने गांव में लोगों के ग्राम कोष बनाए जिससे करीब करीब ₹70,0000 समुदाय के पास अपना था जिससे वे आपस में लेनदेन करते थे और इस तरह से ब्याज बट्टा करने वालों का हस्तक्षेप खत्म हुआ और वे लोग एक तरह से संपर्क से जलन रखने लगे।
संपर्क में मुख्य रूप से दो तरह की बातों पर ध्यान दिया गया था, संपर्क ने संगठन बनाया और संघर्ष के साथ-साथ निर्माण का कार्य भी किया, जिससे उसे झाबुआ के साथ-साथ आसपास के क्षेत्र में भी लोकप्रियता मिली। संस्था को दीर्घकालिक स्वतंत्र और स्थाई बनाए रखने के लिए संपर्क में शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य और आजीविका के क्षेत्र में काम किया और आजीविका के संदर्भ में भी विशेष रूप से खेती और लाइव स्टॉक का काम किया जिसमें पशुधन को बहुत महत्व दिया गया।
आज संपर्क लगभग 500 गांव में काम कर रहा है और एक लाख परिवार इनके साथ सीधे जुड़े हुए हैं। संपर्क में 250 पूर्णकालिक कार्यकर्ता हैं और 500 वॉलिंटियर संपर्क के साथ जुड़े हुए हैं। संपर्क वर्तमान में झाबुआ, खरगोन, खंडवा, बुरहानपुर, रीवा, सतना, अलीराजपुर, रतलाम, धार, में पार्टनर के साथ काम कर रहा है। संपर्क में राज्य स्तर पर और राष्ट्रीय स्तर पर जीएम खेती का खासकर के जीएम कपास और बैंगन का बड़े पैमाने पर विरोध किया और इस काम में महेश भट्ट से लेकर बड़ी-बड़ी हस्तियों को अपने साथ जोड़ा था कि सरकार के साथ बड़े पैमाने पर पैरवी करके अंतरराष्ट्रीय कंपनियों पर रोक लगाई जा सके और स्थानीय परंपरागत खेती को बढ़ावा दिया जा सके।
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