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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Jallianwala Bagh massacre A brief history of the Jallianwala Bagh Massacre

जलियांवाला बाग नरसंहार: लहू से लिखी आजादी की दास्तां

Sun, 13 Apr 2025 07:36 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Sun, 13 Apr 2025 07:36 PM IST
सार

आज जलियांवाला बाग एक राष्ट्रीय स्मारक बन चुका है। यहां गोलीबारी के निशानों वाली दीवार और ष्शहीदी कुआंष् संरक्षित हैं। परिसर में एक संग्रहालय और लाइट एंड साउंड शो भी है, जो उस भीषण दिन की कहानी बयां करता है

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Jallianwala Bagh massacre A brief history of the Jallianwala Bagh Massacre
जलियांवाला बाग हत्याकांड - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बैसाखी, पंजाब का एक उल्लासपूर्ण पर्व, नई फसल की खुशी और सामूहिक उत्सव का प्रतीक है। लेकिन 13 अप्रैल 1919 की वह बैसाखी अमृतसर में मौत और मातम की प्रतीक बन गई। जहां आम दिनों में बागों में गीत गूंजते हैं, उस दिन जलियांवाला बाग की हवाओं में सिर्फ चीखें थीं और जमीन पर लहू था। यह दिन भारत के इतिहास में सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि एक स्थायी पीड़ा और चेतना का क्षण बन गया।

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हजारों पुरुष-महिलाएं और बच्चे,  कुछ बैसाखी का पर्व मनाने आए थे, तो कुछ रॉलेट एक्ट के विरोध में एकत्र हुए थे। लेकिन ब्रिटिश जनरल डायर ने इस शांत सभा को दुश्मन समझ लिया और बिना चेतावनी के गोलियां चलवा दीं। यह न केवल नृशंसता की पराकाष्ठा थी, बल्कि भारतीय अस्मिता पर सीधा आघात था।
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इस रक्तरंजित बैसाखी ने ही स्वतंत्रता की लौ को तेज कर दिया। इस लेख में हम उस दिन की पीड़ा, प्रतिरोध और प्रेरणा को समझने का प्रयास करेंगेकृजिसने भारत को आजादी की ओर एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा कर दिया।

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पृष्ठभूमि: असंतोष की चिंगारी

प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारत में कई आपातकालीन दमनकारी कानून लागू किए थे। युद्ध समाप्त होने के बाद भारतीयों को यह उम्मीद थी कि इन प्रतिबंधों को हटाया जाएगा और भारत को अधिक राजनीतिक स्वतंत्रता दी जाएगी। परंतु ब्रिटिश सरकार ने 1919 में 'रॉलेट एक्ट' पारित किया, जिसने उन दमनकारी प्रावधानों को और भी कठोर बना दिया। इस अधिनियम ने बिना मुकदमा और बिना अपील के किसी को भी हिरासत में रखने का अधिकार सरकार को दे दिया था। इसका पूरे देश में जोरदार विरोध हुआ।


महात्मा गांधी ने इस अधिनियम के विरोध में 6 अप्रैल को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। पंजाब, विशेषकर अमृतसर, में विरोध तेज हो गया। जब 10 अप्रैल को दो प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं, डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल  को गिरफ्तार कर शहर से निर्वासित कर दिया गया, तो जनता का गुस्सा फूट पड़ा। विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़क उठी, कुछ यूरोपीय नागरिकों पर हमले हुए और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा।

प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की गई, कई मारे गए। इसके बाद स्थिति बिगड़ गई, सरकारी इमारतों पर हमले हुए और कुछ ब्रिटिश नागरिकों को भी निशाना बनाया गया।इस अस्थिरता से निपटने के लिए ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर को अमृतसर भेजा गया। उसने आते ही सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया और शहर को एक सैनिक छावनी में बदल दिया।

 
हत्याकांड: नृशंसता की पराकाष्ठा

ब्रिटिश सेना के ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर को अमृतसर की कानून-व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उन्होंने 13 अप्रैल को बैसाखी के दिन, जब सैकड़ों ग्रामीण जलियांवाला बाग में एकत्र हुए थे, सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया। जलियांवाला बाग एक संकुचित मैदान था, जो चारों ओर से ऊंची दीवारों से घिरा हुआ था और उसमें केवल एक संकरा प्रवेश-द्वार था।

शाम लगभग 4.30 बजे, डायर अपने 90 सैनिकों के साथ बाग में दाखिल हुआ और बिना किसी चेतावनी के गोलियां चलाने का आदेश दे दिया। सैनिकों ने लगभग 1650 राउंड गोलियां चलाईं। यह गोलीबारी तब तक जारी रही जब तक उनकी गोलियां खत्म नहीं हो गईं। लोग जान बचाने के लिए भाग नहीं सके क्योंकि बाहर निकलने का रास्ता अवरुद्ध था। दर्जनों लोग 'शहीदी कुएं' में कूद गए।

ब्रिटिश सरकारी आंकड़ों के अनुसार 379 लोग मारे गए और 1200 से अधिक घायल हुए, लेकिन वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक मानी जाती है। गोलीबारी समाप्त होते ही बिना मृतकों और घायलों की चिंता किए जनरल डायर अपने सैनिकों के साथ वहां से चला गया। घायल लोग कई घंटे तक तड़पते रहे।

ब्रिटिश सरकार ने स्थिति को काबू में लाने के नाम पर पूरे पंजाब में मार्शल लागू कर दिया। जनता पर सार्वजनिक अपमानों और कोड़े मारने जैसी सजाएं थोपी गईं। एक सड़क पर भारतीयों को घुटनों के बल चलने पर मजबूर किया गया। यह सब जनमानस की चेतना को झकझोरने के लिए पर्याप्त था।

 
प्रतिक्रिया और असर

इस हत्याकांड ने पूरे देश में आक्रोश की लहर दौड़ा दी। रविंद्रनाथ ठाकुर ने विरोध स्वरूप अपनी ‘नाइटहुड’ की उपाधि लौटा दी। महात्मा गांधी, जो अब तक संयमित प्रतिक्रिया दे रहे थे, इस घटना से इतने व्यथित हुए कि उन्होंने 1920 में पूर्ण असहयोग आंदोलन शुरू l करने का निर्णय लिया। यह घटना भारत में ब्रिटिश  सरकार  के प्रति व्यापक अविश्वास और विद्रोह की भावना का प्रतीक बन गई।

यह पहला मौका था जब भारत का सामान्य नागरिक, किसान, व्यापारी, मजदूर, छात्र संगठित होकर एक लक्ष्य की ओर बढ़ा, पूर्ण स्वतंत्रता की ओर ।

जांच और ब्रिटिश प्रतिक्रिया

इस नरसंहार की जांच के लिए ब्रिटिश सरकार ने हंटर आयोग का गठन किया, जिसने 1920 में जनरल डायर की निंदा की और उसे सैन्य सेवा से इस्तीफा देने को मजबूर किया। लेकिन ब्रिटिश समाज दो भागों में बंटा रहा। जहां हाउस ऑफ कॉमन्स में विंस्टन चर्चिल जैसे नेताओं ने डायर की आलोचना की, वहीं हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने उसकी तारीफ की और उसे “रक्षक” कहकर तलवार भेंट की गई।

ब्रिटिश नागरिकों ने उसके लिए लाखों रुपये का चंदा इकट्ठा किया। यह स्पष्ट कर दिया गया कि ब्रिटेन की राजनीति में अभी भी औपनिवेशिक मानसिकता कितनी गहराई तक फैली हुई थी।

स्मारक और आज की यादें

आज जलियांवाला बाग एक राष्ट्रीय स्मारक बन चुका है। यहां गोलीबारी के निशानों वाली दीवार और 'शहीदी कुआं' संरक्षित हैं। परिसर में एक संग्रहालय और लाइट एंड साउंड शो भी है, जो उस भीषण दिन की कहानी बयां करता है। जलियांवाला बाग हत्याकांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह मोड़ था, जिसने एक पूरे राष्ट्र को झकझोर दिया। इसने न केवल ब्रिटिश हुकूमत के असली चेहरे को उजागर किया, बल्कि देश की आजादी की लड़ाई को एक नई दिशा और ऊर्जा प्रदान की।

यह घटना आज भी भारतीय चेतना में जीवित है एक त्रासदी के रूप में, परंतु साथ ही उस जज्बे के रूप में भी जिसने गुलामी की जंजीरों को तोड़ फेंकने का संकल्प लिया।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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