कनाडा ने संसद में भारत से इस घटना के लिए मांगी थी माफी, जलियांवाला पर ब्रिटेन ने नहीं मांगी माफी
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एक सदी बहुत होती है। माफ़ी मांगने के लिए आख़िर ब्रिटेन को कितनी उमरें चाहिए? एक विराट लोकतंत्र की राष्ट्रीय अस्मिता का अहसास 70 साल बाद भी किसी तथाकथित विकसित और सभ्य मुल्क़ को अगर नहीं होता तो अर्थ साफ़ है। अभी भी रानी की हुक़ूमत में जी रहा यह देश अपने सामंती और अहंकारी मिजाज़ को नहीं त्याग सका है।
प्रधानमंत्री टेरेज़ा जलियांवाला बाग़ के बर्बर नरसंहार पर गोरी संसद में अफ़सोस कर सकती हैं, शर्मनाक दाग़ बता सकती हैं, मगर माफ़ी नहीं मांग सकतीं। आज के हिन्दुस्तान से आपसी सहयोग, सुरक्षा ,समृद्धि और दोस्ती पर वे चाहे जितना गर्व कर लें, यह वक़्त की इबारत पर साफ़-साफ़ लिखा है कि सवा सौ करोड़ की आबादी का एक-एक इंसान ब्रिटेन का कभी भी हार्दिक कृतज्ञ नहीं रहेगा। उनके देश ने भारत को जलियांवाला बाग़ की तरह एक नहीं, सैकड़ों गहरे घाव दिए हैं, जिन्हें भरने में सदियां लग जाएंगीं।
इन ज़ुल्मों के लिए तो ब्रिटेन की हज़ार माफ़ियां भी कम हैं। ब्रिटेन ने दो-ढाई सौ साल में भारत से जो लूटा है, वह इतिहास का एक कलंकित अध्याय है। भारत सरकार ने इस नृशंस और लोमहर्षक हत्याकांड पर एक सिक्का जारी किया है।
ब्रिटेन की तरह कनाडा ने हम पर हुकूमत नहीं की। लेकिन कामागाटामारू की घटना पर सौ बरस बाद उसने खुलकर संसद में माफ़ी मांगी। कनाडा ने इन गोरों के इशारे पर हिन्दुस्तान के कामागाटामारु जहाज़ के क़रीब चार सौ लोगों को 23 मई 1914 को वेंकूवर बंदरगाह पर उतरने नहीं दिया। दो महीने तक जहाज़ पर सवार लोगों को उतरने नहीं दिया।
बुनियादी सुविधाओं के अभाव में कई लोगों ने दम तोड़ दिया। मानवीय आधार पर कुछ बच्चों और बुजुर्गों को सहायता दी। बाक़ी को वापस हिन्दुस्तान भेज दिया। जब 27 सितंबर 1914 को यह जहाज़ कोलकाता के बंदरगाह पर किनारे लगा तो जल्लाद गोरों ने उतरते ही उन निर्दोष -निहत्थे हिन्दुस्तानियों पर धुआंधार फायरिंग शुरू कर दी। अनेक लोग मारे गए। आप कह सकते हैं कि जलियांवाला बाग़ नरसंहार का यह पूर्वाभ्यास था। इस हादसे के सौ बरस बाद कनाडा के प्रधानमंत्री ने बाक़ायदा कनाडा की संसद में हिन्दुस्तान से माफ़ी मांगी।
दुनिया में कहीं भी ऐसा दूसरा उदाहरण नहीं मिलता, जब किसी देश ने सौ बरस पहले कुछ लोगों के ख़िलाफ़ अपने अमानवीय बरताव के लिए इस तरह क्षमा याचना की हो। भारत ने इस शर्मनाक घटना की याद में भी 100 रुपए का सिक्का जारी किया था। दोनों घटनाओं में हिन्दुस्तान ने सौ रुपए का सिक्का जारी किया। ठीक वैसे ही जैसे हम राष्ट्रपिता महात्मागांधी और सरदार भगत सिंह जैसे सपूतों को याद रखने के लिए सम्मान में करते हैं। इतिहास की शर्मनाक - कलंकित घटनाओं को सम्मान सूचक प्रतीकों से याद करके हम अपनी नई पीढ़ी को क्या बताना चाहते हैं? गोरी रानी के मुकुट में जड़े कोहिनूर की वापसी की मांग भी हम झिझकते-शर्माते से करते हैं।
हम आज के नौजवानों को अंग्रेजों के काले कारनामें भी बताने में संकोच करते हैं। गोरी रानी आती है, जलियांवालाबाग जाती है, लेकिन दो लफ़्ज़ प्रायश्चित के नहीं बोलना-लिखना चाहती। इस ज़ुल्मी मानसिकता का मुक़ाबला सिक्के जारी करने से नहीं होता। इस हत्याकांड के जल्लाद गर्वनर ओ ड्वायर को बरसों बाद उसी की मांद में जाकर मारने वाले अमर शहीद सरदार ऊधम सिंह को ही हम आज तक कौन सा मान सम्मान दे पाए हैं ? शहीदों के बलिदान की विस्मयकारी कथाएं और ज़ुल्मों की क्रूर दास्तानें अगर हमारे ख़ून में हरारत पैदा नहीं करतीं तो देशभक्ति के नाम पर गाल बजाने का कोई अर्थ नहीं है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.