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जगदीप धनखड़: प्रखर वक्ता, संवैधानिक विशेषज्ञ और विवादों का चोली-दामन का साथ
सार
जगदीप धनखड़ का सफर एक वकील के रूप में शुरू हुआ। 1979 में राजस्थान बार काउंसिल में नामांकन के बाद, उन्होंने 1990 में राजस्थान उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में अपनी पहचान बनाई। संवैधानिक कानून में उनकी विशेषज्ञता ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट में एक प्रमुख वकील बनाया।
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उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने दिया इस्तीफा।
- फोटो : एएनआई (एएनआई)
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विस्तार
अपनी बेवाक टिप्पणियों से सुर्खियां बटोरने वाले उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ सोमवार को संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन अचानक इस्तीफा देकर देश की राजनीती में भारी भूचाल पैदा कर गए। हालांकि, उनसे पहले भी दो उप राष्ट्रपतियों ने कार्यकाल पूरा होने से पहले ही इस्तीफे थे, लेकिन उनके इस्तीफे राष्ट्रपति चुनाव लड़ने के लिए थे। जगदीप धनखड़ एक प्रखर वक्ता, संवैधानिक विशेषज्ञ और लोकतंत्र के प्रबल समर्थक के रूप में जाने जाते हैं।
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राजस्थान के झुंझुनू जिले के किठाना गांव में 18 मई 1951 को जन्मे धनखड़ ने अपने करियर में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईंए जैसे वकील, सांसद,केन्द्र में मंत्री, राज्यपाल, राज्यसभा सभापति और उपराष्ट्रपति के रूप में। हालांकि, उनके बयानों और निर्णयों ने अक्सर विवादों को जन्म दिया, जिसने उन्हें सुर्खियों में रखा।
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संवैधानिक विशेषज्ञ और प्रखर वक्ता के रूप में धनखड़
जगदीप धनखड़ का सफर एक वकील के रूप में शुरू हुआ। 1979 में राजस्थान बार काउंसिल में नामांकन के बाद, उन्होंने 1990 में राजस्थान उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में अपनी पहचान बनाई। संवैधानिक कानून में उनकी विशेषज्ञता ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट में एक प्रमुख वकील बनाया।
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उन्होंने हरियाणा जैसे राज्यों का सतलुज नदी जल विवाद में प्रतिनिधित्व किया और राजस्थान उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया। राजनीति में प्रवेश के साथ, धनखड़ ने 1989 में झुंझुनू से लोकसभा सांसद के रूप में अपनी शुरुआत की और 1990 में चंद्रशेखर सरकार में संसदीय कार्य राज्य मंत्री रहे। 1993 से 1998 तक वे राजस्थान विधानसभा के सदस्य रहे।
2019 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल और 2022 में भारत के उपराष्ट्रपति बनने तक, उन्होंने विभिन्न संवैधानिक पदों पर अपनी छाप छोड़ी। उनकी वक्तृत्व कला और संवैधानिक ज्ञान ने उन्हें एक प्रभावशाली व्यक्तित्व बनाया। उपराष्ट्रपति के रूप में, उन्होंने संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित किया, संस्कृत के उपयोग को बढ़ावा दिया और आयुर्वेद जैसी प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों का समर्थन किया।
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में टकराव
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल (2019-2022) के रूप में धनखड़ का कार्यकाल विवादों से भरा रहा। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सरकार के साथ उनके मतभेद सुर्खियों में रहे। कानून-व्यवस्था, चुनाव के बाद हिंसा, भ्रष्टाचार और विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्तियों जैसे मुद्दों पर उन्होंने टीएमसी सरकार की खुलकर आलोचना की।
उदाहरण के लिए, 2019 में धनखड़ ने टीएमसी सरकार के खिलाफ ट्विटर पर अपनी आलोचना शुरू की, जिसके जवाब में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें पत्र लिखकर उनकी टिप्पणियों को अनुचित बताया। 2022 में, टीएमसी सरकार ने राज्यपाल को विश्वविद्यालयों के कुलपति पद से हटाकर मुख्यमंत्री को यह जिम्मेदारी सौंप दी, जो एक बड़ा विवाद बना। धनखड़ पर विधायी प्रक्रियाओं में देरी का आरोप भी लगा, जैसे कि महत्वपूर्ण विधेयकों को मंजूरी देने में विलंब।
राज्यसभा सभापति: विपक्ष के साथ तनाव
उपराष्ट्रपति के रूप में, धनखड़ स्वतः राज्यसभा के सभापति बने। इस भूमिका में, उनके और विपक्ष के बीच तनावपूर्ण संबंध कई बार चर्चा में रहे। 2022 के शीतकालीन सत्र में, उन्होंने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को रद्द करने वाले 2015 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ‘‘संसदीय संप्रभुता का गंभीर उल्लंघन’’ बताया, जिसने विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया को जन्म दिया।
2023 में, संसद सुरक्षा उल्लंघन पर गृह मंत्री अमित शाह के बयान की मांग को लेकर 146 सांसदों के निलंबन ने विवाद को और बढ़ाया। विपक्ष ने धनखड़ पर पक्षपात का आरोप लगाया, दावा किया कि वे सत्तारूढ़ दल के पक्ष में कार्य कर रहे थे। 2024 में, विपक्ष ने उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश की, जिसमें उन पर विपक्षी सांसदों को दबाने और सत्तारूढ़ दल को तरजीह देने का आरोप था। हालांकि, यह प्रस्ताव संख्याबल के अभाव में पारित नहीं हुआ।
सुप्रीम कोर्ट पर टिप्पणियां और न्यायिक विवाद
धनखड़ के कुछ सबसे चर्चित विवाद सुप्रीम कोर्ट और न्यायपालिका से जुड़े रहे। अप्रैल 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने के लिए राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए समयसीमा निर्धारित की। धनखड़ ने इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि यह ‘‘न्यायिक अतिक्रमण’’ है और अनुच्छेद 142 (जो सुप्रीम कोर्ट को पूर्ण न्याय के लिए विशेष शक्तियां देता है) को ‘‘लोकतांत्रिक शक्तियों के खिलाफ परमाणु मिसाइल’’ बताया।
उन्होंने तर्क दिया कि संसद सर्वोच्च है और निर्वाचित प्रतिनिधि ही संविधान के अंतिम स्वामी हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या न्यायाधीश, जो जवाबदेही से मुक्त हैं, विधायिका और कार्यपालिका की भूमिका निभा सकते हैं। उनकी इन टिप्पणियों की विपक्ष ने तीखी आलोचना की।
राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने कहा कि ऐसी टिप्पणियां ष्असंवैधानिकष् हैं और राज्यसभा सभापति को तटस्थ रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त, धनखड़ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा के आवास से जली हुई नकदी की बरामदगी के मामले में जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि क्या न्यायाधीश देश के नागरिकों और संविधान के प्रति जवाबदेह नहीं हैं।
सत्तारूढ़ दल का समर्थन?
धनखड़ के कुछ बयानों को सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की विचारधारा का समर्थन करने वाला माना गया। उदाहरण के लिए, जुलाई 2024 में, उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (त्ैै) की ष्निर्विवाद साखष् की प्रशंसा की, जिसे विपक्ष ने पक्षपातपूर्ण माना। 2025 में, उन्होंने कांग्रेस द्वारा गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ लाए गए विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव को खारिज कर दिया, जिससे विपक्ष और भड़क गया।
विपक्ष ने दावा किया कि धनखड़ की टिप्पणियां और निर्णय अक्सर बीजेपी के पक्ष में झुके हुए थे, जिससे उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठे। दूसरी ओर, उनके समर्थकों का कहना है कि उनकी बेबाक टिप्पणियां संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय हित की रक्षा के लिए थीं।
उनकी एक जटिल विरासत
जगदीप धनखड़ का राजनीतिक और संवैधानिक सफर उपलब्धियों और विवादों का मिश्रण रहा है। एक वकील से उपराष्ट्रपति तक, उन्होंने अपनी बौद्धिक क्षमता और प्रखर वक्तृत्व से भारतीय लोकतंत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके द्वारा संस्कृत, आयुर्वेद और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों को बढ़ावा देना उनकी सकारात्मक छवि को दर्शाता है।
हालांकि, उनके बेबाक बयानों और निर्णयों ने उन्हें बार-बार विवादों के केंद्र में ला खड़ा किया। पश्चिम बंगाल में टीएमसी सरकार के साथ टकराव, राज्यसभा में विपक्ष के साथ तनाव और सुप्रीम कोर्ट पर उनकी टिप्पणियों ने उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए। फिर भी, उनके समर्थकों का मानना है कि उनकी आलोचनाएँ संवैधानिक संतुलन और संसदीय संप्रभुता को बनाए रखने के लिए आवश्यक थीं।
2025 में स्वास्थ्य कारणों से उनके इस्तीफे ने उनके कार्यकाल को और चर्चा में ला दिया। धनखड़ की विरासत को लेकर मतभेद बने रहेंगे, लेकिन यह निर्विवाद है कि उन्होंने भारतीय राजनीति में एक अमिट छाप छोड़ी। उनकी बेबाकी, संवैधानिक ज्ञान और लोकतंत्र के प्रति समर्पण उन्हें एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में याद रखा जाएगा, जिसने हमेशा अपने विचारों को बिना किसी डर के व्यक्त किया।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।