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अनुच्छेद 370 पर विचार का समय

Sun, 24 Feb 2019 10:23 AM IST
प्रशांत राय भीम सिंह
भीम सिंह Published by: प्रशांत राय Updated Sun, 24 Feb 2019 10:23 AM IST
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ipc 370 media on jammu kashmir
1957 में भारत के प्रतिनिधि कृष्ण मेनन ने अपने आठ घंटे से अधिक के ऐतिहासिक भाषण के दौरान सुरक्षा परिषद के पटल पर इन प्रस्तावों के संबंध में पाकिस्तान की साजिशों को उजागर किया था।

पूरा विश्व का प्रेस/मीडिया कश्मीर में आग भरी उत्तेजक कहानियां प्रकाशित कर रहा है। यह वास्तविकता है कि 26 अक्तूबर, 1947 को जम्मू-कश्मीर के शासक ने भारत संघ के साथ जम्मू-कश्मीर का विलय किया था। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रसिद्ध लेखकों, न्यायविदों और राजनेताओं ने जम्मू-कश्मीर राज्य की पिछली ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की खोज करने की कोशिश नहीं की। जम्मू-कश्मीर के पाक-अधिकृत क्षेत्र (पीओके) की 4,500 वर्ग मील भूमि पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा चल रहा है। इसके अतिरिक्त पाकिस्तान ने 13 अगस्त, 1948 में संयुक्त राष्ट्र के युद्धविराम प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए और उसके बाद गिलगित-बाल्टिस्तान की लगभग32,000 वर्ग मील भूमि पर आक्रमण करके कब्जा कर लिया। इसके अलावा गिलगित क्षेत्र में लगभग 5,500 वर्ग मील भूमि को 1963 में पाकिस्तान ने चीन को 99 साल के लिए लीज पर दे दी और यह कब्जा गिलगित पर 13 अगस्त, 1948 के संयुक्त राष्ट्र के उस प्रस्ताव का उल्लंघन था, जिस पर पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र के सामने हलफनामा दिया था कि वह उसके आदेश की अवहेलना नहीं करेगा। गिलगित-बाल्टिस्तान आज तक पाकिस्तान के कब्जे में है।

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यहां यह जानना आवश्यक है कि पाकिस्तान ने 1948 में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत पर हमला किया था,जिसकी पूरी दुनिया के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र ने भी भर्त्सना की थी। यह भी जानना जरूरी है कि यह पाकिस्तान ही था, भारत नहीं, जिसने संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों का उल्लंघन करके गैरकानूनी कब्जा किया। संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने के बाद पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान पर हमला करके हथिया लिया, जो जम्मू-कश्मीर का क्षेत्रीय भाग था। 1957 में भारत के प्रतिनिधि कृष्ण मेनन ने अपने आठ घंटे से अधिक के ऐतिहासिक भाषण के दौरान सुरक्षा परिषद के पटल पर इन प्रस्तावों के संबंध में पाकिस्तान की साजिशों को उजागर किया था। यह केवल कृष्णा मेनन के भाषण के कारण हुआ था, जिससे पाकिस्तान की साजिशों का पर्दाफाश हो सका। इसके बाद कुछ वर्षों तक जम्मू-कश्मीर में शांति रही।जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह की कार्रवाई भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत थी, जो अंतररराष्ट्रीय कानून के अनुसार भी थी।

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आज प्रश्न यह है कि भारत को जम्मू-कश्मीर के बारे में क्या कदम उठना चाहिए, जिसे 1947 में वहां के महाराजा ने ब्रिटिश संसद के बनाए हुए कानून के तहत भारत के साथ जोड़ दिया था। यह भी बात साफ है कि संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव जो जम्मू-कश्मीर जनमत संग्रह कराने के हित में था, उसे पाकिस्तान ने खुद खत्म कर दिया है।जम्मू-कश्मीर के भारतीय नागरिकों की रक्षा करने और भारत को उग्रवाद से बचाने का एक ही रास्ता है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 में कम से कम संशोधन करने का संसद को अधिकार मिले। अनुच्छेद 370के तहत संसद को तीन विषयों रक्षा, विदेशी मामले, संचार और संबद्ध मामले पर भी कानून बनाने का अधिकार प्राप्त नहीं है, जो तीन विषय 26 अक्तूबर, 1947 को जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने विलयपत्र पर हस्ताक्षर करके भारत को सौंपे थे। ये अधिकार भारतीय संसद के हैं, जो तुरंत संसद को सौंपने होंगे। भारत के राष्ट्रपति को अनुच्छेद 370 में जो आज तक अस्थायी है, संशोधन या कोई भी संशोधन करने का सांविधानिक अधिकार है। यही एक रास्ता है, जिससे भारत का तिरंगा कन्याकुमारी से कश्मीर तक बिना किसी रुकावट के फहराया जा सकता है। 70 सालों से अनुच्छेद 370 अस्थायी प्रावधान है और इसमें कोई भी संशोधन करने से भारतीय संसद अपने पर स्वयं रोक लगाती है।   

यह खेद की बात है कि जम्मू-कश्मीर के भारतीय नागरिक, जिसमें लेखक भी शामिल है, उन्हें आज तक मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं हो सके हैं। जम्मू-कश्मीर में भारतीय दंड संहिता भी लागू नहीं है, वहां पर रनवीर पीनल कोड लागू होता है। जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों के नियंत्रण के लिए जन सुरक्षा कानून बनाया हुआ है, जिस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को दो वर्ष तक बिना मुकदमा चलाए जेल में रखा जा सकता है। यह लेखक1977 में कांग्रेस का विधायक होने के बावजूद जम्मू-कश्मीर के जनसुरक्षा कानून के तहत तीन साल तक जेलों में रहा है और बिना मुकदमा चलाए आठ साल से ज्यादा जम्मू-कश्मीर की जेलों का मजा चखा है। भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 25 बार इस लेखक को जम्मू-कश्मीर की जेलों से रिहा करने के आदेश दिए।
कश्मीर में आज भी दो हजार छात्र, युवा और मासूम लोग जेलों में बंद हैं। जिसका कारण सिर्फ यह है कि भारत के संविधान में दिए गए मानवाधिकार जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं हैं। जब तक भारतीय संविधान जम्मू-कश्मीर में पूरी तरह लागू नहीं होगा, भारत का झंडा कन्याकुमारी से कश्मीर तक नहीं लहराएगा और हर व्यक्ति को न्याय-अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक जम्मू-कश्मीर में शांति असंभव है।    

लेखक, पैंथर्स पार्टी के अध्यक्ष हैं
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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