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अंतरराष्ट्रीय: उम्मीदें अब भी कायम हैं; पश्चिम एशिया में युद्ध से भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा असर

Mon, 02 Mar 2026 08:46 AM IST
Pavan सुशांत सरीन
सुशांत सरीन Published by: Pavan Updated Mon, 02 Mar 2026 08:46 AM IST
सार

अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो मुमकिन है कि भारत को ऊर्जा आपूर्ति में कुछ बाधाओं का सामना करना पड़े, पर यदि ईरान में एक प्रगतिशील सरकार सत्ता में आती है, तो पश्चिम एशिया में हमारी परियोजनाएं और तेजी से आगे बढ़ सकेंगी।

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International: Hopes remain high; war in West Asia will also impact the Indian economy
अंतरराष्ट्रीय: उम्मीदें अब भी कायम हैं - फोटो : ANI

विस्तार

भारत के लिए यह बहुत बड़ी चिंता का विषय है कि अमेरिका-इस्राइल और ईरान युद्ध का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। खासकर ऐसे समय में, जब हमने रूस से तेल लेना कम कर दिया है, ऊर्जा आपूर्ति में बाधा का आर्थिक प्रभाव गहरा हो सकता है। हम ज्यादातर तेल आयात खाड़ी देशों से करते हैं। होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से तेल की आपूर्ति बाधित होगी और आशंका है कि कच्चे तेल की कीमत सत्तर डॉलर से बढ़कर 90-100 डॉलर प्रति बैरल तक हो सकती है। अभी लगभग चार करोड़ बैरल रूसी तेल समुद्र में जहाजों पर घूम रहा है। ऐसे में जरूरी है कि तेल बाजार को स्थिर करने के लिए अमेरिका और यूरोप कम से कम कुछ समय के लिए रूस पर से प्रतिबंध हटा ले।
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तेल के अलावा भी खाड़ी देशों के साथ हमारा बहुत-सा व्यापार होता है। ईरान के साथ उतना व्यापार नहीं होता, लेकिन यूएई, सऊदी अरब, कुवैत, कतर इन सारे देशों के साथ व्यापार बहुत होता है। अब उस पर भी असर पड़ेगा, क्योंकि व्यापार मार्ग भी बंद है। यही नहीं, अगर हूती लड़ाकों ने दोबारा से लाल सागर या स्वेज नहर वाले रूट पर मिसाइल दागना शुरू कर दिया, तो फिर मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। वैश्विक बाजार अमेरिकी टैरिफ को लेकर पहले ही उथल-पुथल की स्थिति में है, ऐसे में इस युद्ध से आर्थिक चुनौती और बढ़ेगी ही।
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तीसरी चीज यह है कि हवाई मार्ग भी बंद हो गए हैं। चूंकि ईरान की हवाई सीमा का इस्तेमाल नहीं कर सकते, और पाकिस्तानी हवाई मार्ग पहले से ही बंद है। ऐसे में अन्य मार्ग अपनाने से हवाई मार्ग लंबा होने पर एयरलाइन इंडस्ट्री को बहुत बड़ी चपत लगेगी।
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अब तक तो सिर्फ ईरान में रहने वाले छात्रों और भारतीय नागरिकों की चिंता थी, लेकिन पूरा खाड़ी क्षेत्र जिस तरह से युद्ध से प्रभावित हो रहा है, ऐसे में पूरे खाड़ी क्षेत्र में रहने वाले नागरिकों को निकालना असंभव होगा। बेशक उनकी सुरक्षा की चिंता सरकार को होगी, लेकिन इतने लोगों को निकालकर भारत लाना संभव नहीं है। जब सरकार ने एडवाइजरी जारी कर दी कि आप निकल जाएं, तो फिर लोगों को निकल जाना चाहिए, क्योंकि युद्ध शुरू हो जाने के बाद निकालना मुश्किल होता है। जहां तक कूटनीति की बात है, तो मुझे लगता है कि अब भारत के लिए पेचीदगी कुछ कम होगी, क्योंकि ईरान ने बाकी अरब देशों पर हमला करके उन्हें अमेरिका के पाले में धकेल दिया है। अरब देशों से ईरान के खिलाफ बहुत तीव्र बयान आ रहे हैं।

अगर ईरान में इस्लामी शासन खत्म हो जाता है और एक उदारवादी, प्रगतिशील सरकार सत्ता में आती है, तो भारत के लिए यह बेहतर ही होगा। फिर ईरान के ऊपर जो बहुत से प्रतिबंध लगे थे, वे हट जाएंगे और चाबहार बंदरगाह का काम आगे बढ़ सकता है। इससे हमारी कनेक्टिविटी की परियोजनाएं भी ईरान के माध्यम से आगे बढ़ सकती हैं और हम ईरान का तेल भी ले सकते हैं। मगर ऐसा तब होगा, जब ईरान में दुनिया के साथ चलने वाली नई सरकार सत्ता में आएगी। ऐसे में अमेरिका भी चाहेगा कि भारत जैसा देश, जो वहां निवेश करने को तैयार है, वह ईरान में ज्यादा सक्रिय हो।  

 सामरिक तौर पर भारत के लिए दो बहुत बड़े दुश्मन उभर कर आ रहे हैं। पाकिस्तान तो नासूर बना ही हुआ है, तुर्किये भी एक बड़ी चुनौती बन रहा है। तुर्किये और पाकिस्तान के बीच जो गठजोड़ है, उस पर भी ऐसी स्थिति में लगाम लग सकती है, जो भारत के लिए अच्छा ही होगा। इसलिए ईरान में नई सरकार आने से भारत को कूटनीतिक तौर पर ज्यादा फायदे होंगे।


मगर यदि युद्ध लंबा चला और वहां के हालात बहुत खराब रहे, तो फिर समस्याएं बढ़ सकती हैं। लेकिन अभी जिस तरह के आक्रमण हो रहे हैं और बाकी अरब देश भी ईरान से नाराज हैं, इसकी बहुत संभावना है कि जो कुछ अरब देश अब तक अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने को तैयार नहीं थे, वे शायद इन बदली परिस्थितियों में इस्राइल के साथ आ जाएं। इससे भारत-पश्चिम एशिया-यूरोप गलियारे की समस्या खत्म हो जाएगी। इससे न केवल भारत के व्यापार को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि हमारे लिए ऊर्जा (स्वच्छ हाइड्रोजन) और डिजिटल कनेक्टिविटी भी सुदृढ़ होगी। उम्मीद है कि भारत के लिए आगे अच्छी खबरें ही आएंगी। - लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं।
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