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अंतर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस 2024: दिव्यांगजन सशक्तिकरण- चुनौतियां और संभावनाएं
सार
वैश्विक स्तर पर दिव्यांगों के लिए समावेशी, समान समाज की स्थापना के लिए भारत सहित सभी देशों की सरकारें वर्षों से प्रयासरत हैं, किंतु क्या ये प्रयास पर्याप्त हैं? विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2023 में हर 6 में से एक व्यक्ति यानी वैश्विक आबादी का लगभग 16 प्रतिशत हिस्सा किसी न किसी विकलांगता से पीड़ित है।
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अंतर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
1992 से हर वर्ष, अंतर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस 3 दिसंबर को संयुक्त राष्ट्र ने दिव्यांगजन व्यक्तियों के अंतरराष्ट्रीय दिवस (आईडीपीडी) के तौर पर मनाने का निर्णय किया है। ‘संयुक्त राष्ट्र महासभा’ के प्रस्ताव 47/3 के अनुरूप, आमजन में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन के हर पहलू में दिव्यांगजनों की स्थिति के बारे में जागरूकता बढ़ाकर इनके अधिकारों और कल्याण को बढ़ावा देने के लिए यह दिवस हर वर्ष दुनियाभर में मनाया जाता है।
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दिव्यांगजनों के अधिकारों के लिए 13 दिसंबर 2006 को संयुक्त राष्ट्र सभा ने यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द राइट्स ऑफ पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज़ (यू.एन.सी.आर.पी.डी.) नाम का कन्वेंशन अंगीकार किया। कन्वेंशन का उद्देश्य सतत विकास हेतु वर्ष 2030 के एजेंडे के कार्यान्वयन के माध्यम से दिव्यांग व्यक्तियों के लिए समान अवसर प्रदान करने की दिशा में काम करना है। भारत समेत सौ से अधिक देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए। 2008 में इसका लागू होना, दिव्यांगजनों के अधिकारों के क्षेत्र में प्रमुख उपलब्धि है। कन्वेंशन का अनुच्छेद 9 सरकारों पर ऐसे सभी आवश्यक कदम उठाने का दायित्व देता है जिससे सामान्य लोगों की तरह दिव्यांगों तक सभी संसाधनों की पहुँच सुनिश्चित करवाई जाए।
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वैश्विक स्तर पर दिव्यांगों के लिए समावेशी, समान समाज की स्थापना के लिए भारत सहित सभी देशों की सरकारें वर्षों से प्रयासरत हैं, किंतु क्या ये प्रयास पर्याप्त हैं? विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2023 में हर 6 में से एक व्यक्ति यानी वैश्विक आबादी का लगभग 16 प्रतिशत हिस्सा किसी न किसी विकलांगता से पीड़ित है।
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संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में औसतन हर दस में से एक बच्चा – यानी करीब 24 करोड़ बच्चे – किसी न किसी तरह की विकलांगता के साथ जीवन जी रहे हैं। 49 प्रतिशत विकलांग बच्चों को कभी भी स्कूल जाने का अवसर नहीं मिलता और अन्य बच्चों के मुकाबले, बचपन में ही स्वास्थ्य देखभाल मिलने की संभावना 25 प्रतिशत कम होती है।
वर्ष 2020 में जारी की गई विकलांगता पर ‘राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय’ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की लगभग 2.2 प्रतिशत आबादी किसी न किसी तरह की शारीरिक या मानसिक अक्षमता से प्रभावित है। शहरी इलाकों से ज्यादा, ग्रामीण क्षेत्रों में इनका घनत्व अधिक है जिससे समाज की रूढ़िवादी सोच के कारण इनकी पीड़ा और बढ़ जाती है। महिलाओं की तुलना में पुरुष अधिक दिव्यांग हैं।
जब इसे ग्रामीण परिवेश में देखा जाए तो ग्रामीण इलाकों में परिवार की आर्थिक और सामाजिक जिम्मेदारियाँ अधिक हो जाती हैं। यहां सुविधाओं का अभाव है, जो शहरी इलाकों में उपलब्ध होती हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन और भी कठिन हो जाता है। दिव्यांगता की पुरानी परिभाषा के आधार पर 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में लगभग 2.68 करोड़ लोग दिव्यांग थे, जो तब की ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या से अधिक और कनाडा की जनसंख्या के
लगभग बराबर थी। इतने बड़े वर्ग के लिए अलग से नीति या सार्वजनिक नीति बनाकर मिशन मोड में काम करना चाहिए। भारत जैसे आर्थिक शक्ति वाले देश में 45 प्रतिशत विकलांग आबादी अशिक्षित है, जो सामान्य अशिक्षितों के प्रतिशत के लगभग दोगुने के बराबर है।
देश में विकलांग व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार संरक्षण एवं पूर्ण भागीदारी) अधिनियम 1995 में पारित हुआ और यह 1 जनवरी 1996 से लागू हो गया। लेकिन शिक्षा और रोजगार के अवसरों की बात करें तो इन सालों में भी दिव्यांगजनों की स्थिति में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ है। सरकार ने वर्ष 2015 में दिव्यांगों के लिए 'एक्सेसिबल इंडिया' अभियान शुरू किया। किंतु ये सभी अभियान तब तक सफल नहीं होंगे, जब तक सामाजिक स्तर पर लोग इस वर्ग के लिए स्वीकार्यता का भाव जागृत नहीं करेंगे।
2011 की जनगणना के अनुसार, 7 प्रतिशत बच्चे जन्मजात या किसी अन्य कारण से विकलांग होते हैं। देश के ग्रामीण हिस्सों में गर्भवती माताओं और बच्चों को सही पोषण और देखभाल के साथ-साथ बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सुविधाओं को विकसित करने की जरूरत है। 0-5 आयु वर्ग के बच्चों में दिव्यांगता की पहचान करना महत्वपूर्ण है। समुचित टीकाकरण और रोग निरोधक कार्यक्रमों को सामंजस्यपूर्ण बनाने की आवश्यकता है। 2016 के कानून में महिलाओं के लिए गर्भावस्था के पहले और प्रसव के बाद ध्यान रखने पर बल दिया गया है।
जन्म से संबंधित विकलांगता में प्रसव के बाद के पहले 1000 दिन महत्वपूर्ण होते हैं। इसके लिए 'अर्ली इंटरवेंशन सेंटर' बनाए गए हैं। ऐसे 14 केंद्र स्थापित किए गए हैं। दुर्घटनाओं के कारण उत्पन्न होने वाली दिव्यांगताओं में कमी लाने के उद्देश्य से सड़क सुरक्षा और कार्यस्थल पर सुरक्षा बढ़ाने की जरूरत है। ट्रक ड्राइवरों की आँखों का चेकअप, स्पीड गवर्नर आदि जैसे उपायों से इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
विशेष सक्षमजनों की अपार क्षमताओं और दिव्यांगता के प्रति समाज की सोच बदलना नितांत आवश्यक था। दिसंबर 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम "मन की बात" के 15वें एपिसोड में देशवासियों से शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्तियों के लिए 'विकलांग' के स्थान पर 'दिव्यांग' शब्द का प्रयोग करने का अनुरोध किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि विकलांगों के लिए 'दिव्यांग' शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, क्योंकि उनके पास एक अतिरिक्त शक्ति होती है। भारत में यह एक गेम चेंजर कदम साबित हुआ।
भारत में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 दिव्यांगों के कल्याण और उन्हें समर्थ एवं सशक्त बनाने की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है। यह कानून समाज में उनके समावेशन को प्रभावी बनाने में प्रमुख भूमिका निभाता है। इस अधिनियम ने विकलांग (समान अवसर, अधिकार संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम 1995 का स्थान लिया। इस कानून को पहले के कानूनों की तुलना में अधिक व्यापक और विस्तृत बनाया गया है। इसके अनुसार दिव्यांगता के प्रकार 7
से बढ़ाकर 21 कर दिए गए हैं। इसमें पहली बार कमजोर दृष्टि, बौद्धिक दिव्यांगता, वाणी संबंधी दिव्यांगता आदि को शामिल किया गया। एसिड अटैक पीड़ितों, थैलेसीमिया और हीमोफीलिया जैसी बीमारियों के रोगियों को भी इसमें स्थान दिया गया, जिन्हें विशेष सहयोग की आवश्यकता होती है। 2016 के अधिनियम से पहले दिव्यांगजनों के साथ दुर्व्यवहार अथवा भेदभाव करने पर दंड का कोई प्रावधान नहीं था।
यह अधिनियम इसलिए भी विशिष्ट बन गया है क्योंकि इसमें दिव्यांगजनों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव किए जाने पर अधिकतम पाँच लाख रुपये का जुर्माना और दो वर्ष की जेल का प्रावधान किया गया है। इस कानून के द्वारा दिव्यांगजनों को रोजगार में आरक्षण एवं शिक्षा और सरकारी योजनाओं में प्राथमिकता की बात कही गई है।
सुगम्य भारत अभियान सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा दिव्यांगजनों को सार्वभौमिक पहुंच प्रदान करने, समान अवसर प्रदान करने, स्वतंत्र जीविका के साधन सुनिश्चित करने और समावेशी समाज के सभी पहलुओं में उनकी भागीदारी में सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू किया गया।
इस अभियान के तीन आधार स्तंभ हैं – निर्माण अधोसंरचना, सार्वजनिक परिवहन और सूचना व संचार तकनीक। इसके उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक निश्चित समय सीमा में सभी महत्वपूर्ण सरकारी इमारतों, रेलवे स्टेशन, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों, सार्वजनिक परिवहन वाहनों, सरकारी वेबसाइटों आदि को दिव्यांगजनों के लिए पूर्णतया सुलभ बनाने का लक्ष्य है।
'स्कीम फॉर इम्प्लीमेंटेशन ऑफ पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज एक्ट' (सीप्डा) के तहत दिव्यांगता पुनर्वास केंद्रों की स्थापना की गई है। साथ ही, 'असिस्टेंस टू डिसेबल्ड पर्सन्स फॉर परचेसिंग/फिटिंग ऑफ एड्स एंड अप्लायंसेज' (एडिप) योजना के तहत दिव्यांगजनों के बीच सहायक यंत्रों का वितरण और इस क्षेत्र में कार्यरत संस्थाओं आदि को वित्तीय सहायता भी प्रदान की जाती है।
दिव्यांग सशक्तीकरण विभाग द्वारा 'यूनिक आइडेंटिफिकेशन प्रोजेक्ट' का उद्देश्य दिव्यांगजनों का राष्ट्रव्यापी डेटाबेस तैयार करना है, जिसकी सहायता से सभी दिव्यांगजनों को दिव्यांगता प्रमाणपत्र और विशिष्ट पहचान पत्र प्रदान किया जा सके। यह कार्ड सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए आवश्यक होगा।
नई तकनीक दिव्यांगजनों के सशक्तीकरण और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में कारगर साबित हो रही है। असिस्टिव और एक्सेसिबल तकनीकों ने ऐसे गैजेट्स और एप्लीकेशन तैयार किए हैं, जो शारीरिक और मानसिक परेशानियों से जूझ रहे लोगों के लिए वरदान हैं।
आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी नई तकनीकों की पहुंच जरूरतमंदों तक हो। असिस्टिव और एक्सेसिबल तकनीक कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल, इंटरनेट आदि डिजिटल उपकरणों को दिव्यांगजनों के लिए अनुकूल बनाते हैं। ये तकनीक दिव्यांगजनों को मुख्यधारा में लाने में प्रमुख भूमिका निभा रही हैं। टेक्स्ट-टू-स्पीच, रीडिंग पेन, डिजिटल रिकॉर्डर आदि उपकरण दिव्यांगजनों को समर्थ बना सकते हैं।
कंप्यूटर या लैपटॉप में असिस्टिव सुविधाओं के अंतर्गत नैरेटर, इज़ ऑफ एक्सेस सेंटर, मैग्निफायर, हाई-कॉन्ट्रास्ट जैसे तकनीकी विकल्प उपलब्ध हैं। डिस्लेक्सिया या ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के लिए इमर्सिव रीडर का विकल्प वरदान साबित हुआ है। माइक्रोसॉफ्ट ने कंप्यूटर के लिए 'आई कंट्रोल' नामक सुविधा का विकास किया है, जो मूक लोगों के लिए सहायक है।
'टर्न प्लस' सिस्टम वाहनों को दिव्यांगजनों के अनुकूल बनाने का एक उपाय है, जिससे कार की सीट को 90 डिग्री के कोण पर घुमाया जा सकता है। इसका निर्माण बेंगलुरु के कारोबारी आनंद कुतरे ने किया है। 'स्मार्ट कैन' दृष्टिबाधितों के लिए आईआईटी दिल्ली द्वारा विकसित यंत्र है, जो अल्ट्रासोनिक तकनीक से तीन मीटर की दूरी तक मौजूद वस्तुओं के बारे में विशेष वाइब्रेशन के जरिए सचेत करता है। ब्रेल रीडर, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी (तिरुवनंतपुरम) के छात्रों द्वारा विकसित उपकरण है, जो छपे हुए शब्दों को ब्रेल लिपि में बदल देता है।
ऐसे कई उपकरण और तकनीक आज उपलब्ध हैं, जो दिव्यांगजनों को सक्षम बनाने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। इन उपकरणों और तकनीकों की पहुंच प्रभावित व्यक्तियों तक सुनिश्चित करना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन के सभी पहलुओं में दिव्यांग व्यक्तियों की स्थिति को सुधारने के लिए समाज की मानसिकता में परिवर्तन अत्यंत आवश्यक है।
स्टीफन हॉकिंग, हेलेन केलर, सुधा चंद्रन, रविंद्र जैन और अरुणिमा सिंह जैसे उदाहरण यह सिद्ध करते हैं कि समान अवसर और अधिकार मिलने पर दिव्यांगजन समर्थ, प्रभावशाली और आत्मनिर्भर जीवन जी सकते हैं तथा भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बन सकते हैं। इसलिए, हमें मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि दिव्यांगजनों को केवल मुख्यधारा में शामिल ही न किया जाए, बल्कि उनके सशक्तिकरण और सम्मानजनक जीवन की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।
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